सत्ता के शिखर पर सड़ती नैतिकता: एपस्टीन फाइल्स और सफ़ेदपोश दरिंदगी

Decaying Morality at the Heights of Power: The Epstein Files and White-Collar Crime

दिलीप कुमार पाठक

आज जब हम सभ्यता के शिखर पर होने का दंभ भरते हैं, तब ‘जेफरी एपस्टीन’ जैसी फाइलें हमारे सामूहिक विवेक पर एक गहरा घाव दे जाती हैं। एपस्टीन फाइल्स केवल कुछ नामों की सूची नहीं है, बल्कि यह उस सड़ी-गली मानसिकता का कच्चा चिट्ठा है, जो सत्ता, पैसे और रसूख के नशे में अंधे होकर मानवता को शर्मसार करती रही है। यह मामला दिखाता है कि कैसे दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोग—चाहे वे राजनीतिज्ञ हों, व्यवसायी हों या वैज्ञानिक—एक ऐसे घृणित चक्र का हिस्सा थे, जहाँ मासूमियत का व्यापार होता था।

वैश्विक परिदृश्य में देखें तो एपस्टीन का द्वीप ‘लिटिल सेंट जेम्स’ आधुनिक युग के नरक जैसा था। अमेरिका से लेकर यूरोप तक के बड़े-बड़े नाम इस दलदल में फँसे नजर आते हैं। अमेरिकी अदालती दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों के अनुसार, पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू, डोनाल्ड ट्रम्प, वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग और अरबपति बिल गेट्स जैसे रसूखदार व्यक्तियों के नाम इस प्रकरण से जुड़ने से पूरी दुनिया सन्न रह गई। यह कड़वा सच केवल सात समंदर पार तक सीमित नहीं है; जांच की आंच ने भारत के गलियारों को भी छुआ है। विदेशी मीडिया और अदालती फाइलों में कुछ रसूखदार भारतीय नामों का उल्लेख होना इस बात का प्रमाण है कि इस ‘वैश्विक पाप’ के तार हमारे समाज के रसूखदारों से भी जुड़े थे। यह स्वीकार करना पीड़ादायक है कि जिस भारत ने दुनिया को नैतिकता सिखाई, उसके कुछ ‘प्रभावशाली’ चेहरे भी उस घृणित नेटवर्क का हिस्सा होने के संदेह के घेरे में आए हैं।

भारत के परिदृश्य में यदि हम इस घटनाक्रम को देखें, तो यह हमारे लिए एक गंभीर चेतावनी है। भारत, जो अपनी संस्कृति में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ का उद्घोष करता है, आज वहां भी पश्चिमी विकृतियों का प्रभाव बढ़ रहा है। एपस्टीन जैसी फाइलें हमें आईना दिखाती हैं कि ‘एलीट क्लास’ के नाम पर हम किस ओर जा रहे हैं। भारत में भी अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ रसूखदार लोग कानून को ठेंगा दिखाकर जघन्य अपराधों से बच निकलते हैं। एपस्टीन फाइल्स हमें सतर्क करती हैं कि यदि हमने अपनी नैतिक जड़ों को नहीं संभाला, तो धन का अहंकार हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी लील जाएगा। यह संकट केवल कानूनी नहीं, बल्कि गहरे नैतिक पतन का संकेत है। जब समाज का ‘अभिजात वर्ग’ अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए मासूम बच्चों का शिकार करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि हमारी प्रगति का ढांचा खोखला हो चुका है। यह घृणित मानसिकता उस सोच से पैदा होती है जहाँ पैसा इंसान को भगवान और दूसरों को मात्र वस्तु बना देता है। विडंबना यह है कि इनमें से कई लोग दुनिया को नैतिकता और विकास का पाठ पढ़ाते थे, जबकि उनका अपना आचरण अंधकारमय था। क्या हम ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ न्याय केवल गरीबों के लिए है और अमीरों के लिए ‘प्राइवेट आइलैंड’ पर अपराध की खुली छूट? हमें अपनी न्याय व्यवस्था और सामाजिक ढांचे को इतना पारदर्शी बनाना होगा कि कोई भी रसूखदार खुद को कानून से ऊपर न समझे। यदि आज हम इन सफ़ेदपोश अपराधियों के खिलाफ खड़े नहीं हुए, तो आने वाला इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। मासूमों की सुरक्षा और समाज की शुचिता बनाए रखना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।

नैतिकता के आधार पर यह घृणित मानसिकता एक मानसिक बीमारी है। यह उस ‘उपभोगवादी संस्कृति’ का चरम है, जहाँ मनुष्य को वस्तु समझा जाने लगता है। जब कोई व्यक्ति इतना शक्तिशाली हो जाता है कि उसे लगने लगे कि वह कानून से ऊपर है, तब मानवता का पतन निश्चित है। एपस्टीन के द्वीप पर जो हुआ, वह केवल देह का शोषण नहीं था, वह विश्वास, बचपन और आत्मा का सामूहिक कत्ल था। उन मासूम लड़कियों की चीखें उन आलीशान महलों की दीवारों में दफन हो गईं, जिनका निर्माण कथित ‘सभ्य समाज’ के नायकों ने किया था। हमें यह समझना होगा कि अपराध केवल वह नहीं है जो एपस्टीन ने किया, बल्कि अपराध वह भी है जो उन रसूखदारों ने मौन रहकर किया। चुप्पी भी एक अपराध है, विशेषकर तब जब वह चुप्पी किसी मासूम की गरिमा की कीमत पर खरीदी गई हो। आज दुनिया को इन फाइलों के माध्यम से उन चेहरों को पहचानना होगा जो दिन के उजाले में परोपकारी होने का ढोंग करते हैं और रात के अंधेरे में मानवता को नीलाम करते हैं। समय आ गया है कि न्याय केवल फाइलों में बंद न रहे, बल्कि उन सभी लोगों को बेनकाब किया जाए जिन्होंने सत्ता के गलियारों को शोषण का अड्डा बनाया। अंततः, समाज को यह तय करना होगा कि हमारे नायक कौन होंगे?