वैभव राम, ग्लोबल एचआर हेड, गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड
भारत में अब सुबह की शिफ्ट में फैक्ट्री के शॉप फ्लोर पर काम करती महिलाओं को देखना या भीड़भाड़ वाले बाज़ारों में दुकानदारों से शेल्फ स्पेस के लिए मोलभाव करती महिलाओं का दिखाई देना अब एक सामान्य और बदलते भारत की तस्वीर बन चुकी हैं। यह बदलाव केवल उपस्थिति का नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि देश में काम और भूमिकाओं की परिभाषा किस तरह बदल रही है। वर्ष 2026 तक आते-आते जिन क्षेत्रों को कभी महिलाओं के लिए ‘गैर-पारंपरिक’ माना जाता था – जैसे मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशंस और फ्रंटलाइन सेल्स- वे अब इस बात के ठोस उदाहरण बनते जा रहे हैं कि जब संगठन काम को केवल प्रदर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि व्यापक भागीदारी के नजरिए से तैयार करते हैं, तो कार्यस्थल और परिणाम दोनों बदलने लगते हैं।
हालांकि चुनौती कभी योग्यता की नहीं थी, बल्कि पहुंच की थी। भारत में, ढांचागत व संरचनागत बाधाओं ने ऐतिहासिक रूप से भागीदारी को प्रभावित किया है: फील्ड भूमिकाओं में सुरक्षा की चिंताएं, परिवहन और सार्वजनिक सुविधाओं में बुनियादी ढांचे की कमी, और सामाजिक धारणाएं जिन्होंने राजस्व प्रबंधन और औद्योगिक कार्यों को पुरुषों का क्षेत्र माना। एफएमसीजी सेक्टर में, जहां व्यापार का एक बड़ा हिस्सा आज भी जनरल ट्रेड नेटवर्क और व्यापक फील्ड गतिविधियों के माध्यम से होता है, ये बाधाएं और भी स्पष्ट रही हैं। जब गतिशीलता अनिश्चित हो और बुनियादी ढांचा असमान हो, तो करियर में निरंतरता बनाए रखना कठिन हो जाता है। ऐसा इसलिए नहीं कि महिलाएं काम छोड़ देती हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि सिस्टम उनके लिए नहीं बनाए गए थे।
वर्षों से, भारत में सेल्स को केवल लेनदेन के अंतिम क्षण तक सीमित कर दिया गया है। लेकिन जो कोई भी इस क्षेत्र में रहा है, वह जानता है कि राजस्व केवल एक बहुत बड़ी क्षमता प्रणाली का दृश्य परिणाम है: उत्पाद के मूल्य को समझना, ग्राहक के व्यवहार को पढ़ना, संबंधों को प्रबंधित करना, स्थानीय बाजार की गतिशीलता को समझना और समय के साथ विश्वास बनाए रखना।
जब सेल्स को इस व्यापक नज़रिए से देखा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि महिलाएं न केवल इन भूमिकाओं में भाग ले रही हैं, बल्कि उन्हें मजबूत भी कर रही हैं। संबंधों की गहराई, दीर्घकालिक नेटवर्क बनाना और संदर्भ के अनुसार निर्णय लेना ‘सॉफ्ट स्किल्स’ नहीं हैं- ये व्यावसायिक संपत्तियां हैं।
यही बदलाव विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र में भी हो रहा है। वे शॉप फ्लोर, जिन्हें कभी शारीरिक या सांस्कृतिक रूप से महिलाओं के लिए वर्जित माना जाता था, अब ऐसे वातावरण में बदल रहे हैं जहां सटीकता, प्रक्रिया अनुशासन, सुरक्षा संस्कृति और निरंतर सुधार उन पुरानी धारणाओं से अधिक महत्वपूर्ण हैं कि वहां काम करने के योग्य कौन है। जैसे-जैसे ऑटोमेशन बढ़ रहा है और परिचालन उत्कृष्टता (ऑपरेशनल एक्सीलेंस) ज्ञान-आधारित होती जा रही है, परंपरा नहीं बल्कि क्षमता प्रदर्शन तय करती है।
यहीं पर केवल मंशा (इंटेंट) के बजाय संगठनात्मक डिजाइन की अहमियत बढ़ जाती है। जो कंपनियां बदलाव ला रही हैं, वे समावेश (इंक्लूजन) को केवल प्रतिनिधित्व के लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि एक परिचालन रणनीति के रूप में देख रही हैं।
संगठन अब अपरंपरागत भूमिकाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सुनियोजित और संरचित रास्ते तैयार कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स जैसे संस्थान फ्रंटलाइन सेल्स के क्षेत्र में प्रतिभा का दायरा बढ़ाने के लिए खेल पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं को जोड़ रहे हैं। उन्हें एफएमसीजी के फील्ड इकोसिस्टम में सफल बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण, व्यावहारिक अनुभव और मार्गदर्शन (मेंटोरशिप) उपलब्ध कराया जा रहा है।
वहीं विनिर्माण इकाइयों में भी महिलाओं को काम के अनुकूल वातावरण देने के लिए कई व्यावहारिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इनमें कार्यस्थल पर चाइल्डकेयर सेंटर, सुरक्षित परिवहन व्यवस्था और मातृत्व के बाद काम पर लौटने वाली महिलाओं के लिए कैब सुविधा जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इन पहलों का उद्देश्य केवल सुविधा प्रदान करना नहीं, बल्कि महिलाओं के करियर की निरंतरता, पेशेवर प्रगति और दीर्घकालिक विकास को मजबूत आधार देना है।
भारत के प्रतिस्पर्धी परिदृश्य में, जेंडर विविधता केवल अनुपालन (कंप्लायंस) का लक्ष्य नहीं, बल्कि विकास का वाहक (ग्रोथ ड्राइवर) साबित हो रही है।
जब अधिक महिलाएं सेल्स में आती हैं, तो उद्योग को उन दृष्टिकोणों का लाभ मिलता है जो उस उपभोक्ता आधार का प्रतिबिंब हैं, जहां महिलाएं खरीदारी के निर्णयों में एक महत्वपूर्ण हिस्से को प्रभावित या संचालित करती हैं। जब अधिक महिलाएं विनिर्माण प्रणालियों में काम करती हैं, तो संगठनों को प्रक्रिया अनुशासन, जोखिम संवेदनशीलता और सहयोगात्मक समस्या-समाधान का लाभ मिलता है, जो परिचालन मजबूती (ऑपरेशनल रेसिलियंस) को बढ़ाता है। व्यवहार में, समावेश से काम करने के तरीके में सुधार होता है।
इस बदलाव का प्रभाव केवल कार्यस्थलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका व्यापक आर्थिक असर भी दिखाई देता है। जैसे-जैसे अधिक महिलाएं सेल्स प्रोफेशनल, प्लांट ऑपरेटर, रिटेलर और डिस्ट्रीब्यूटर के रूप में पूरी मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) का हिस्सा बनती हैं, वैसे-वैसे उनकी भागीदारी अपवाद नहीं बल्कि आर्थिक गतिविधियों की स्वाभाविक और स्वीकार्य हकीकत बनती चली जाती है।
स्थानीय सामाजिक-आर्थिक तंत्र धीरे-धीरे आर्थिक भूमिकाओं को लैंगिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर देखने लगते हैं। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के साथ ही वित्तीय स्वतंत्रता मजबूत होती है और इससे उनके निर्णय लेने की क्षमता भी व्यापक होती जाती है। परिणामस्वरूप बाजार भी अधिक संतुलित और प्रतिनिधिक बनने लगते हैं- वे सचमुच उन लोगों की जरूरतों और अनुभवों को प्रतिबिंबित करने लगते हैं जिनकी वे सेवा करते हैं।
ऐसे में वास्तविक उन्नति का अर्थ यह नहीं है कि महिलाएं पुरानी और जड़ संरचनाओं के अनुरूप खुद को ढालें। असली बदलाव तब आता है, जब संगठन स्वयं काम की संरचना को इस तरह पुनर्गठित करें कि प्रतिभा और क्षमता बिना किसी रुकावट के सामने आ सके। उन्नति की शुरुआत वहीं से होती है, जहां सुरक्षा को बुनियादी ढांचे का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाता है, लचीलेपन को उत्पादकता का सहायक माना जाता है, और प्रतिनिधित्व को एक निरंतर विकसित होने वाली प्रतिभा-धारा के रूप में पोषित किया जाता है।
आज भारत में विनिर्माण और सेल्स में महिलाओं की कहानी केवल प्रवेश की नहीं है, बल्कि यह स्थायित्व और प्रभाव की कहानी है। भारत की कंपनियों के लिए अब सवाल यह नहीं है कि क्या महिलाएं इन भूमिकाओं में सफल हो सकती हैं, बल्कि सवाल यह है कि क्या कार्यस्थलों को उन्हें सक्षम बनाने के लिए डिजाइन किया गया है।





