क्या UNSC विश्व व्यवस्था को P5 देशों के पक्ष में करने का औजार बन गई है ?

Has the UNSC become a tool to shape the world order in favor of the P5 countries?

आलोक बाजपेयी

एक बार फिर विश्व का बड़ा हिस्सा युद्ध की विभीषिका झेल रहा है और एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् UNSC कोमा में है. ऐसा पहली बार नहीं है जब सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता प्राप्त पाँच देशों में से किसी देश के युद्ध के समय UNSC पंगु और लाचार नज़र आ रहा हो. पूर्व में भी कई बार ऐसा हुआ है. उदाहरण के लिए ईराक युद्ध बिना UNSC की स्पष्ट अनुमति के लड़ा गया . रूस -यूक्रेन युद्ध के समय रूस के वीटो से कई प्रस्ताव रुक गए तो गाज़ा युद्ध में अमेरिका के वीटो से प्रस्ताव नहीं पास हुए। इन सारे मामलों में UNSC पूरी तरह निष्प्रभावी और निष्क्रिय नज़र आया . वर्तमान में जारी ईरान विरूद्ध अमेरिका – इज़राइल युद्ध में भी सुरक्षा परिषद् से अभी तक कोई कठोर प्रस्ताव तक पास नहीं हुआ है। कारण? क्योंकि स्थायी सदस्य वीटो कर सकते हैं। गैर P5 देशों के उन मामलों में जहाँ ये पाँच वीटो पॉवर प्राप्त देश दखल ना दें, वहीं UNSC कुछ करने की हिम्मत कर पाता है . ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि UNSC का P5 देशों के प्रति घोर पक्षपाती रवैया क्या विश्व व्यवस्था को समानता या संयुक्त राष्ट्र आधारित व्यवस्था से हटाकर पॉवर ब्लॉक आधारित अमेरिका-ब्लॉक, चीन-ब्लॉक आदि नहीं बना रहा है ? द्वितीय विश्व युद्ध यानी कि 1945 की वैश्विक परिस्थितियों पर आधारित UNSC की संरचना आज भी वैसी ही है जबकि भारत, जापान, जर्मनी, ब्राज़ील आदि जैसे आदि देश भी अब महाशक्तियाँ बन चुके हैं और अफ्रीकी संघ का भी कोई प्रतिनिधित्व UNSC में नहीं है. ऐसे में क्या ज़रूरी नहीं कि या तो UNSC की संरचना बदली जाये और वीटो शक्ति सीमित की जाये या फिर P5 देशों के अलावा अन्य देश इसे अपने हितों के विपरीत मानते हुए इसे श्रद्धांजलि देकर विसर्जित कर दें ?

ईरान पर हमले को रोकने में नाकाम UN
ईरान से कूटनीतिक वार्ताएँ लम्बे समय से चल रही थी और अचानक उन्हें विफल बताते हुए कुछ ही घंटों बाद अमेरिका और इज़राइल ने अपनी तरफ से संयुक्त हमला कर दिया। विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा है कि ईरान पर शुरुआती हमला उकसावे के बिना किया गया और युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध युद्ध कहलायेगा. यह भी चिंताजनक है कि युद्ध में अधिकतम घातकता (maximum lethality) पर जोर दिया जा रहा है, जो कि निंदनीय है. ईरान में पहले ही बच्चियों के स्कूल पर हमले में लगभग 170 जानें जा चुकी जिससे इस युद्ध में नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकारों पर प्रश्नचिन्ह है. अपनी अभद्र और अतिरिक्त आक्रामक शैली के लिए कुख्यात अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट ब्रायन हेगसेथ ने एक बार फिर विवादास्पद बयान दिया है कि ईरान युद्ध में “नो क्वार्टर, नो मर्सी” (कोई दया नहीं, कोई रियायत नहीं) की नीति अपनाई जाएगी। विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसा बयान Hague Convention तथा Geneva Conventions के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार “नो क्वार्टर” की घोषणा अपने आप में संभावित युद्ध अपराध मानी जा सकती है। कई मानवाधिकार संगठनों ने कहा कि ऐसे बयान से सेना के भीतर यह संदेश जा सकता है कि नागरिक सुरक्षा के नियमों को नजरअंदाज किया जा सकता है. युद्ध में अधिक आक्रामक और घातक कार्रवाई की जा सकती है. इसे खतरनाक और अमानवीय बयान बताया गया है . ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है संयुक्त राष्ट्र संघ क्या कर रहा है ? यह एक कड़वा फिर उजागर हुआ है कि जब मामला सीधे तौर पर अमेरिका जैसी महाशक्तियों या उनके करीबी सहयोगियों (जैसे इज़राइल) से जुड़ा होता है, तो UN की प्रभावशीलता नगण्य साबित होती है.

विश्व व्यवस्था को P5 देशों के पक्ष में करने का औजार बना UNSC
UNSC अक्सर पाँच स्थायी सदस्यों (P5—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन) के आपसी हितों के कारण पंगु महसूस होती है क्योंकि इन्हें वीटो का कवच मिला हुआ है. संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 27(3) के अनुसार, किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को पारित करने के लिए पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति अनिवार्य है। यदि एक भी सदस्य ‘वीटो’ का उपयोग करता है, तो प्रस्ताव गिर जाता है, भले ही बाकी 14 सदस्य उसके पक्ष में हों। दोहरा वीटो (Double Veto) एक और भेदभावकारी विशेषाधिकार है जिसका दुरुपयोग कर कई बार P5 देश का उपयोग करके किसी मामले को चर्चा के दायरे से ही बाहर कर देते हैं, जिससे उनके खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई असंभव हो जाती है। यूक्रेन युद्ध में रूस और गाजा/ईरान संघर्ष में अमेरिका द्वारा वीटो के बार-बार उपयोग ने परिषद को एक “डेडलॉक” (गतिरोध) की स्थिति में पहुँचा दिया है। एक बार फिर साबित हुआ है कि छोटे-मध्यम देशों के टकराव में, उसमें भी जब किसी महाशक्ति का विरोध न हो, गरजने वाली UNSC P5 देशों के खुद के युद्ध में शामिल होते ही गूँगी गुड़िया बन जाती है. फिर साबित हुआ है कि UNSC सिर्फ तब सक्रिय और प्रभावी होती है जब P5 देशों के हित सीधे टकरा नहीं रहे हों, लेकिन जब किसी स्थायी सदस्य का हित सीधे जुड़ जाता है, तब UNSC लगभग निर्णयहीन दिखती है। यही कारण है कि आलोचक कहते हैं कि UNSC कभी-कभी पॉवर पॉलिटिक्स का मंच बन जाती है। अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इससे वर्ल्ड ऑर्डर P5 के पक्ष में झुकता है? स्पष्ट रूप से – हाँ, क्योंकि संरचना ही ऐसी है। वीटो शक्ति केवल P5 के पास है. वे खुद के खिलाफ कार्रवाई रोक सकते हैं, लेकिन दूसरे देशों के खिलाफ प्रस्ताव पास कर सकते हैं. स्पष्ट रूप से उन्हें ग्रेट पॉवर प्रिविलेज मिला हुआ है . ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है गैर P5 देश क्यों इस अपने हितों के विपरीत भेदभावकारी संरचना को क्यों सहन करें ? क्यों न मांग की जाये कि या तो UNSC की संरचना सुधारी जाये और वीटो शक्ति सीमित की जाये, या फिर इसे भंग कर इसे श्रद्धांजलि अर्पित कर दी जाये ?

इक्यासी साल पुराना अप्रासंगिक हो चुका ढाँचा है UNSC का
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद UNSC का वर्तमान ढाँचा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में बना था, तब महाशक्तियाँ वही थीं जो आज स्थायी सदस्य हैं। आज 81 साल बाद दुनिया बदल चुकी है, पुरानी महाशक्तियों के बराबर व उनसे भी आगे नई महाशक्तियों का उदय हो चुका है, लेकिन UNSC की संरचना लगभग वही की वही है। इसलिए आलोचना बढ़ रही है कि UNSC 21वीं सदी का प्रतिनिधित्व नहीं करता, वह अप्रासंगिक हो चुका है. दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश भारत आर्थिक – सैन्य महाशक्ति के रूप में स्वयं को स्थापित कर चुका है लेकिन महज चीन के विरोध के कारण स्थायी सदस्य नहीं बन पा रहा है. ब्राजील, जर्मनी और जापान भी स्थायी निर्णय प्रक्रिया से बाहर हैं. पूरे दक्षिण अफ्रीका महाद्वीप का कोई प्रतिनिधि है ही नहीं। ऐसे में UNSC अब 1945 की भू-राजनीति का अवशेष मात्र रह गया है. इसमें लोकतंत्र का अभाव है और दुनिया की बड़ी आबादी और उभरती हुई शक्तियाँ, जैसे भारत, स्थायी निर्णय प्रक्रिया से बाहर हैं। P5 सदस्य में जवाबदेही की कमी है. वे वीटो का उपयोग अपने सहयोगियों को अंतरराष्ट्रीय न्याय से बचाने के लिए करते हैं, जिससे परिषद की साख गिरती है। इन पर सुधारों की गति से घोंघा और कछुआ भी शर्मा जाएँ। 2008 से चल रही अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) के बावजूद वीटो पॉवर को सीमित करने या सदस्यता विस्तार पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।

अब या तो सुधार हो या फिर विसर्जन हो UNSC का
स्पष्ट है कि UNSC वर्तमान में अपनी “प्रासंगिकता की लड़ाई” लड़ रहा है। यदि यह खुद को समय के साथ नहीं बदलता, तो यह प्रथम विश्व युद्ध के समय बनाये गए ‘लीग ऑफ नेशंस’ की तरह इतिहास का हिस्सा बन सकता है। ग़ैर P5 देशों के सामने अब कोई चारा नहीं कि वे या तो UNSC की संरचना और शक्ति संतुलन की कमियों को दूर करने की लड़ाई गंभीरता से लड़ें और एक निर्धारित समय सीमा में कोई असर न हो तो किसी “बी प्लान” को लागू करते हुए UNSC को निष्प्रभावी मानते हुए किसी वैकल्पिक व्यवस्था की ओर आगे बढ़ें। अपनी ओर से एक क्षेत्रीय और अन्य संगठनों जैसे नाटो , आसियान, ब्रिक्स, G20, यूरोपियन यूनियन, अफ्रीकन यूनियन, G7 आदि देशों को इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने चाहिए। UNSC की जगह यूनाइटेड नेशंस जनरल असेम्बली को और अधिक शक्तिशाली किया जाना चाहिए। निष्कर्ष यह है कि UNSC का इक्यासी साल पुराना ढाँचा अब न्याय आधारित विश्व व्यवस्था के लिए आउटडेटेड या लगभग निष्प्रभावी हो चुका है . अब या तुरंत कमियाँ दूर की जाएँ और यदि P5 देश ऐसा न होने दें तो UNSC की जगह संयुक्त राष्ट्र महासभा के निर्णयों को ही कानूनी शक्ति देकर UNSC को श्रद्धाजंलि दे दी जाये।