क्या भारत दो-दलीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है?

Is India moving towards two-party politics?

दिलीप कुमार पाठक

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी बात निकलकर आई है, जिसे समझना जरूरी हो गया है। कभी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा लगाने वाली भाजपा का ये सियासी जुमला लगता था, लेकिन आज की हकीकत देखें तो यह ‘क्षेत्रीय दल मुक्त भारत’ के एक बड़े प्लान की तरह नजर आता है। भाजपा की रणनीति अब स्पष्ट हो चली है, वह पहले बड़े प्यार से किसी क्षेत्रीय दल की ‘बांह’ पकड़ती है, उसके साथ मिलकर सरकार बनाती है, वहाँ का गुणा गणित समझती है, उसके घर के भीतर तक अपनी पैठ बनाती है और फिर धीरे से उसी साथी को किनारे लगाकर अपना झंडा गाड़ देती है।

नीतीश कुमार हों या उद्धव ठाकरे, नवीन पटनायक हों या बादल परिवार… इन सब की कहानियाँ एक ही पैटर्न पर लिखी गई हैं। बिहार को ही देख लीजिए, जहाँ नीतीश कुमार कभी ‘बड़े भाई’ हुआ करते थे और भाजपा उनके पीछे चला करती थी। लेकिन आज पासा पूरी तरह पलट चुका है; भाजपा बिहार की सबसे बड़ी ताकत बन गई है और नीतीश अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराष्ट्र में जिस शिवसेना ने भाजपा को उंगली पकड़कर हिंदुत्व का रास्ता दिखाया, आज वह खुद दो टुकड़ों में बंटकर अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रही है। ओडिशा में नवीन बाबू का 24 साल पुराना अभेद्य किला जिस तरह ढहा, उसने सबको हैरान कर दिया। भाजपा ने वहां पहली बार अपनी सरकार बनाकर साबित कर दिया कि वह किसी की भी विरासत को समेटने का हुनर जानती है। अभी एक दशक पहले बंगाल में भाजपा का अस्तित्व भी न के बराबर था, लेकिन आज वहाँ प्रचंड बहुमत के साथ ही साथ सरकार बन गई है।

अब यह विस्तार की भूख पंजाब और दक्षिण के राज्यों की ओर मुड़ चुकी है। पंजाब में अकालियों से नाता टूटने के बाद भाजपा ने जो ताकत दिखाई है, वह आने वाले समय में केजरीवाल की ‘आप’ के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है। दक्षिण भारत अब भाजपा के लिए एक ऐसी प्रयोगशाला बन गया है जहाँ वह नए-नए प्रयोग कर रही है। तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से दो ही नाम चलते थे—डीएमके और एआईएडीएमके लेकिन भाजपा ने एआईडीएमके के कमजोर पड़ते ही वहां अपने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं। केरल में जहाँ कांग्रेस और वामपंथियों के अलावा किसी तीसरे की जगह नहीं थी, वहाँ भाजपा ने त्रिशूर की सीट जीतकर और अपना वोट शेयर बढ़ाकर सबको चौंका दिया है। कांग्रेस वहां आज भले ही जीत गई हो, लेकिन उसे भी पता है कि भाजपा की नज़रें अब उसकी कुर्सी पर हैं।

बंगाल जीतने के बाद पार्टी मुख्यालय के संबोधन में पीएम मोदी ने कहा कि महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) का विरोध करना अखिलेश यादव को बहुत भारी पड़ेगा, मतलब साफ है अगला नंबर उत्तरप्रदेश का है। भाजपा जिस आत्मविश्वास के साथ अखिलेश यादव को टार्गेट कर रही है, और जैसे परिणाम आ रहे हैं तो लगता है कि भाजपा यूपी को जीतकर समाजवादी पार्टी को भी नफ़ासत के साथ निपटा देगी।

भाजपा अब उन मुद्दों को पीछे धकेल रही है जिन मुद्दों के सहारे क्षेत्रीय दलों की रणनीतिक अस्तित्व टिका हुआ है। वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस का अपना अलग ही तर्क है। कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा की इस आक्रामक विचारधारा का मुकाबला नहीं कर सकतीं। वे कहते हैं कि अंत में मुकाबला बड़ा होगा और देश फिर से ‘कांग्रेस बनाम भाजपा’ वाले दौर में लौटेगा। यानी कांग्रेस भी चाहती है कि क्षेत्रीय दल कमज़ोर हों ताकि वह मुख्य विपक्षी दल बन सके। थलापति विजय जैसे नए चेहरे तमिलनाडु में उम्मीद तो जगाते हैं, लेकिन इसके बाद वहाँ भाजपा जिस स्टाइल में काम कर रही है, उसमें किसी तीसरे के लिए रास्ता बनाना आसान नहीं होगा।

सवाल यह है कि क्या यह सब लोकतंत्र के लिए सही है? भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर कुछ कोस पर भाषा और संस्कृति बदल जाती है। क्षेत्रीय दल इन्हीं स्थानीय भावनाओं की आवाज़ होते हैं। अगर ये दल खत्म हो गए, तो क्या स्थानीय मुद्दे दिल्ली के शोर में दब जाएंगे?

भाजपा अब किसी राज्य में दूसरे या तीसरे नंबर पर रहने से संतुष्ट नहीं होती। वह जहां कदम रखती है, पूरा मैदान अपना करने की कोशिश करती है। आने वाले समय में अगर ये क्षेत्रीय क्षत्रप नहीं संभले, तो देश में सिर्फ दो बड़े ध्रुव ही बचेंगे? ये तो समय बताएगा, हालांकि अब यह जनता को तय करना है कि क्या उन्हें वह ‘एक छत्र राज’ मंज़ूर है या वे अपनी स्थानीय पहचान और आवाज़ को बचाए रखना चाहते हैं।