राजस्थान की स्थापना के 77 वर्षों के बाद भी जल संकट सहित कई समस्याओं से जूझ रहा है देश का विशाल प्रदेश 

Even after 77 years of the establishment of Rajasthan, this vast state of the country is grappling with many problems including water crisis

गोपेन्द्र नाथ भट्ट 

भारतीय नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा (अंग्रेजी तारीख 30 मार्च 1949) को राजपुताना की विभिन्न रियासतों के विलय के बाद राजस्थान की स्थापना हुई थी और तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जयपुर में वृहत राजस्थान का विधिवत उद्घाटन किया था। आज राजस्थान की स्थापना के 77 वर्ष बाद भी यह विशाल और ऐतिहासिक राज्य अनेक संभावनाओं के साथ-साथ कई गंभीर चुनौतियों का सामना भी कर रहा है। प्रदेश की मरुस्थलीय प्रधान भूगोल, सीमित जल संसाधन, सामाजिक विषमताएं और बदलते आर्थिक परिदृश्य के कारण राजस्थान के सर्वांगीण विकास का लक्ष्य चुनौतियों से भरा हुआ है। हालांकि आज राजस्थान विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय प्रगति कर एक प्रगतिशील प्रदेश बनने की ओर अग्रसर है। भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कल्पना के अनुसार @2047 विकसित भारत के लक्ष्य को पूरे करने में राजस्थान भी अपना योगदान देने को तत्पर है। इस दिशा में पहल करते हुए प्रदेश की भजन लाल शर्मा सरकार ने भी राजस्थान को 2047 तक 4.3 ट्रिलियन डॉलर (लगभग ₹350 लाख करोड़ से अधिक) की इकोनॉमी बनाने का लक्ष्य रखा है।

राजस्थान के सामने सर्वांगीण विकास के लक्ष्य पाने के लिए सबसे बड़ी चुनौती जल संकट की विकट समस्या है। राजस्थान का अधिकांश भूभाग शुष्क और अर्ध-शुष्क है। यहां औसत वर्षा कम और अनिश्चित है, जिससे पेयजल और सिंचाई दोनों प्रभावित होते हैं। हालांकि इंदिरा गांधी नहर जैसी परियोजनाओं ने उत्तर पश्चिम राजस्थान के रेगिस्तान प्रधान कतिपय क्षेत्रों के लोगों को भारी राहत दी है, लेकिन राज्य के एक बड़े हिस्से में आज भी पानी के लिए संघर्ष जारी है। विशेष कर गर्मियों में पानी की समस्या से निपटना राज्य सरकार के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होता। राज्य का भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, जो भविष्य के लिए एक गंभीर संकेत है। राजस्थान देश के कुल भू भाग का दसवां हिस्सा है और भौगोलिक दृष्टि से देश का सबसे बड़ा प्रदेश है लेकिन,आज भी राज्य में सतही और भूमिगत जल की उपलब्धता मात्र एक प्रतिशत ही है। प्रदेश के कई ब्लॉक डॉर्क जोन घोषित है। कई इलाकों में पानी की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय है । पश्चिमी राजस्थान में तेल और गैस के साथ ही पानी के भी अथाह भण्डार मिले है। पानी के इन भंडारी का सही तरीके से दोहन करने की योजना बने तो राजस्थान पानी के संकट से हमेशा उबर सकता है।

सौभाग्य से इस वर्ष राज्य में हुई मानसून की अच्छी बरसात के कारण प्रदेश के बांधो, तालाबों, झीलों आदि में पानी का अच्छा संग्रह हुआ है। दूसरी ओर राज्य की भजन लाल सरकार ने पूर्वी राजस्थान की जीवन रेखा मानी जानी पुनर्गठित ईआरसीपी रामसेतु पीकेसी परियोजना और हरियाणा से राजस्थान के शेखावाटी अंचल में यमुना जल लाने की स्वागत योग्य पहल की है,लेकिन आजादी के 80 वर्षों के बाद भी पंजाब राज्य रावी-व्यास के पानी की राजस्थान की शेष हिस्सेदारी का 0.60 एएमएफ पानी प्रदेश को अभी तक नहीं दे रहा है। भाखड़ा व्यास नियंत्रण बोर्ड पर भी उसका प्रभुत्व है तथा उसमें राजस्थान को स्थाई सदस्य सचिव का हक भी नहीं दिया जा रहा।

आजादी के बाद से ही प्रदेश में बनी सभी दलों की सरकारें केन्द्र सरकार के समक्ष राजस्थान की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के मद्दे नजर देश के पहाड़ी और सीमावर्ती प्रदेशों की तरह राजस्थान को भी विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग करते आए है। तदोपरांत राज्य में पानी की कमी का हवाला देते हुए राजस्थान को जल की दृष्टि से पिछड़ा प्रदेश मानते हुए विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग भी रखी गई लेकिन दुर्भाग्य से ये दोनों मांगें अभी तक पूरी नहीं हुई है।

राजस्थान में कृषि क्षेत्र भी कई समस्याओं से जूझ रहा है। राज्य की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन प्रदेश की वर्षा आधारित खेती, भूमि की उर्वरता में कमी और आधुनिक तकनीक की सीमित पहुंच किसानों की आय को प्रभावित करती है। बार-बार आने वाला सूखा,अकाल और जलवायु परिवर्तन की मार ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। पंजाब से इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना के माध्यम से प्रदेश में आने वाले दूषित पानी भी एक गंभीर समस्या बना हुआ है। इससे पश्चिम राजस्थान में भूमि के बंजर होने की समस्या के साथ-साथ मवेशियों और मनुष्यों में हो रही अति गंभीर बीमारियां और अन्न उत्पादन क्षमता पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव अभिशाप बनते जा रहे है।राजस्थान में औद्योगिक विकास के क्षेत्र में भी असंतुलन देखने को मिलता है। जयपुर, उदयपुर, जोधपुर जैसे शहरों में उद्योग और पर्यटन का विकास हुआ है, लेकिन ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में रोजगार के अवसर काफी सीमित हैं। इससे पलायन की समस्या बढ़ती जा रही है। युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों या अन्य राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं। भजन लाल सरकार प्रदेश में अच्छी युवा नीति लाई है लेकिन उसको जमीनी हकीकत और धरातल पर उतारने में सभी का सहयोग जरूरी है। प्रदेश में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सुधार की आवश्यकता बनी हुई है। हालांकि पिछले दशकों में साक्षरता दर में अच्छी वृद्धि हुई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती है। सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी और शिक्षकों की अनुपस्थिति जैसी समस्याएं सामने आती रहती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक है,विशेष कर दूरदराज के इलाकों में जहां अस्पतालों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है।

राजस्थान में सामाजिक स्तर पर भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। बाल विवाह, लैंगिक असमानता और कुपोषण जैसी समस्याएं राज्य के कई हिस्सों में आज भी देखी जाती हैं। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में भागीदारी अपेक्षाकृत कम है, जो समग्र विकास में बाधा उत्पन्न करती है। इसके अलावा, सीमावर्ती राज्य होने के कारण राजस्थान के सामने सुरक्षा और हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी, सामाजिक- सांस्कृतिक प्रदूषण, घुसपैठ जैसी समस्याएं भी समय-समय पर सामने आती हैं। पाकिस्तान से लगी लंबी सीमा राजस्थान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ संवेदनशील भी है।

हालांकि इन चुनौतियों के बीच राजस्थान ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति भी की है। विशेष कर पर्यटन, नवीकरणीय ऊर्जा (खास कर सौर ऊर्जा), और बुनियादी ढांचे के विकास में राज्य ने नई पहचान बनाई है। जयपुर मेट्रो, सड़क नेटवर्क का विस्तार, दिल्ली मुम्बई फ्रेट कॉरिडोर और डिजिटल सेवाओं का प्रसार आदि राजस्थान के लिए सकारात्मक संकेत हैं।

फिर भी रेल कनेक्टिविटी के लिहाज से आदिवासी अंचल बांसवाड़ा जिला सहित प्रदेश के कई जिलों के कई क्षेत्र अभी भी रेल सुविधा से वंचित है।

पर्यटन की अपार संभावनाओं से भरपूर राजस्थान धार्मिक पर्यटन बढ़ने के कारण राज्य में देशी -विदेशी पर्यटकों की बहार रहती है। इसके साथ ही प्रदेश की हेरिटेज संपदाओं के कारण राजस्थान को हेरिटेज स्टेट कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। भारत सरकार राजस्थान को हेरिटेज स्टेट घोषित कर विशेष केन्द्रीय मदद देना शुरू कर दे तो राजस्थान को ही नहीं देश को विदेशी आय का भारी अर्जन हो सकता है।

खान और खनिज संपदाओं से भरपूर राजस्थान को सही अर्थों में देश का अग्रणी राज्य बनाने के लिए आवश्यकता इस बात की है कि विकास का संतुलन कायम किया जाए और क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जाए। जल प्रबंधन, कृषि सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश तथा रोजगार के नए अवसरों का सृजन राज्य के भविष्य को नई दिशा दे सकते हैं। साथ ही, राज्य में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता और सशक्त नीतियों और कानूनों का क्रियान्वयन भी जरूरी है।निष्कर्ष रूप से राजस्थान अपनी ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक समृद्धि के साथ एक संभावनाओं से भरा राज्य है, लेकिन 77 वर्षों बाद भी इसके सामने मौजूद चुनौतियां यह दर्शाती हैं कि विकास की यात्रा अभी अधूरी है। यदि सरकार, समाज और निजी क्षेत्र मिलकर प्रयास करें, तो आने वाले वर्षों में राजस्थान एक संतुलित और समृद्ध राज्य के रूप में उभर सकता है।