पाँच राज्यों की चुनावी बिसात का “पश्चिमी बंगाल” केन्द्रबिन्दु

West Bengal is the focal point of the five-state electoral battleground

जयदेव राठी

भारत में जब भी कई राज्यों में एक साथ चुनाव होते हैं तो राजनीतिक विमर्श केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा का संकेत भी देने लगता है। चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी—में विधानसभा चुनावों की तिथियों की घोषणा के बाद देश की राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इन चुनावों को लेकर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समीकरण बन रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर विशेष रूप से पश्चिम बंगाल पर टिक गई है। इसका कारण यह है कि यहां पिछले लगभग डेढ़ दशक से सत्ता में मौजूद तृणमूल कांग्रेस और उसे चुनौती देने के लिए पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरी भाजपा के बीच सीधा और तीखा मुकाबला देखने को मिल रहा है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है। वर्ष 2011 में वाम मोर्चे के लंबे शासन को समाप्त कर सत्ता में आई ममता बनर्जी ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था। उसके बाद से तृणमूल कांग्रेस लगातार सत्ता में बनी हुई है और इस बार का चुनाव उसके लिए लगभग 15 वर्षों के शासन की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। लोकतांत्रिक राजनीति का एक स्वाभाविक नियम यह है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकारों को एंटी-इन्कम्बेंसी का सामना करना पड़ता है। जनता के एक वर्ग में यह भावना बनने लगती है कि अब बदलाव होना चाहिए। पश्चिम बंगाल में भी विपक्ष इसी मनोविज्ञान को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

भाजपा ने पिछले एक दशक में पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन काफी मजबूत की है। कभी राज्य की राजनीति में सीमित उपस्थिति रखने वाली यह पार्टी आज तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी बन चुकी है। 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राज्य में उल्लेखनीय सफलता मिली थी और 2021 के विधानसभा चुनावों में भी उसने मजबूत प्रदर्शन करते हुए खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित कर लिया। यही कारण है कि इस बार भाजपा पूरे आत्मविश्वास के साथ “परिवर्तन” का नारा दे रही है। पार्टी का मानना है कि राज्य में भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक अक्षमता जैसे मुद्दों के कारण जनता बदलाव चाहती है।

किन्तु भाजपा का यह उत्थान मात्र संगठनात्मक कार्य का परिणाम नहीं है — इसके पीछे घुसपैठ का मुद्दा है, जो इस चुनाव को राष्ट्रीय सुरक्षा के धरातल पर ले जाता है। बांग्लादेश में हिन्दुओं की लगातार हो रही हत्याओं से पश्चिम बंगाल के हिन्दू समुदाय में आक्रोश बढ़ रहा है। इस माहौल में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरुद्ध लोगों की नाराजगी भी तीव्र हुई है। अमित शाह ने आरोप लगाया कि असम, त्रिपुरा, गुजरात, कश्मीर और पंजाब की सीमाओं पर घुसपैठ नहीं होती — केवल बंगाल की सीमा पर क्यों होती है? उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा भूमि न दिए जाने के कारण बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी पूरी नहीं हो पाई। यह आरोप-प्रत्यारोप का खेल केवल शब्द-युद्ध नहीं है — इसके पीछे करोड़ों मतदाताओं की भावनाएँ जुड़ी हैं।
इस चुनाव में एक नया आयाम विशेष सघन पुनरीक्षण — अर्थात् मतदाता सूची के गहन पुनर्निर्माण — का विवाद भी जोड़ता है। यह विवाद ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जैसे बुनियादी मुद्दों को भी पीछे छोड़ते हुए इस वर्ष बंगाल की राजनीति का एक प्रमुख विषय बन गया। इसमें तृणमूल कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच खुला टकराव देखने को मिला। ममता बनर्जी ने इस प्रक्रिया को बंगाली पहचान और मतदाता अधिकारों के लिए सम्भावित खतरा बताया, जबकि भाजपा का कहना है कि यह प्रक्रिया फर्जी नामों को हटाने के लिए जरूरी है जिनमें कथित तौर पर बांग्लादेश से आए घुसपैठिए, रोहिंग्या और अन्य लोग शामिल हैं। यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा और ममता बनर्जी स्वयं अदालत में उपस्थित हुईं। ममता बनर्जी निष्क्रिय नहीं हैं। वे एक अनुभवी राजनीतिक योद्धा हैं जो प्रत्येक प्रहार का उत्तर जानती हैं।

भाजपा का आरोप है कि पड़ोसी देशों से होने वाली अवैध घुसपैठ ने राज्य की जनसांख्यिकी और सुरक्षा दोनों को प्रभावित किया है। भाजपा इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा और पहचान की राजनीति से जोड़कर जनता के सामने रखती रही है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक प्रचार बताती है और कहती है कि भाजपा राज्य की सामाजिक एकता को तोड़ने की कोशिश कर रही है। इस तरह घुसपैठ का मुद्दा केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि चुनावी बहस का बड़ा राजनीतिक विषय बन गया है।

ममता बनर्जी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उनकी जनसंपर्क क्षमता और कल्याणकारी योजनाएं मानी जाती हैं। उनकी सरकार ने महिलाओं, गरीबों और ग्रामीण वर्ग के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिनका लाभ बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचा है। यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि जनता का भरोसा अब भी उसके साथ है। पार्टी यह भी कहती है कि भाजपा बाहरी ताकत के रूप में बंगाल की राजनीति में प्रवेश करना चाहती है, जबकि तृणमूल खुद को बंगाल की संस्कृति और अस्मिता का प्रतिनिधि बताती है।

दरअसल पश्चिम बंगाल की राजनीति में केवल विकास या प्रशासनिक मुद्दे ही निर्णायक नहीं होते, बल्कि सांस्कृतिक पहचान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बंगाल का समाज अपनी भाषा, संस्कृति और बौद्धिक परंपरा को लेकर काफी सजग माना जाता है। ऐसे में चुनावों के दौरान “बंगाली अस्मिता” का प्रश्न अक्सर उभरकर सामने आ जाता है। ममता बनर्जी इसी भावनात्मक मुद्दे को मजबूत करने की कोशिश करती रही हैं, जबकि भाजपा राष्ट्रीय राजनीति के बड़े मुद्दों को सामने रखकर चुनावी मैदान में उतरती है।
हाल के वर्षों में राज्य सरकार पर कई आरोप भी लगे हैं, जिनमें शिक्षक भर्ती घोटाले और राशन वितरण से जुड़े विवाद प्रमुख रहे हैं। इन मामलों को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की है। भाजपा का कहना है कि इन घटनाओं ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं और जनता अब पारदर्शिता और जवाबदेही चाहती है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करती रही है।

यदि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं है। इसके परिणाम का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के प्रमुख चेहरों में गिना जाता है। यदि वे एक बार फिर मजबूत जनादेश प्राप्त करती हैं तो उनकी राजनीतिक स्थिति और मजबूत हो सकती है। वहीं भाजपा के लिए बंगाल में सफलता पूर्वी भारत में अपनी राजनीतिक पकड़ को और विस्तार देने का अवसर होगी।

हालांकि यह भी सच है कि पांच राज्यों के चुनावों में अन्य राज्यों के अपने-अपने राजनीतिक समीकरण हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का पुराना संघर्ष अब भी जारी है, जहां सत्ता के लिए क्षेत्रीय दलों के बीच प्रतिस्पर्धा रहती है। केरल में परंपरागत रूप से वाम मोर्चा और कांग्रेस-नीत गठबंधन के बीच सीधी टक्कर होती है। असम में भाजपा अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए प्रयास करेगी, जबकि पुडुचेरी में गठबंधन राजनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके बावजूद राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों की चर्चा में पश्चिम बंगाल सबसे अधिक प्रमुख बना हुआ है।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो बंगाल का चुनाव कई कारणों से रोचक और महत्वपूर्ण है। एक ओर लंबे समय से सत्ता में मौजूद नेतृत्व की परीक्षा है, तो दूसरी ओर सत्ता परिवर्तन की कोशिश कर रही विपक्षी ताकतों का आक्रामक अभियान। इसके साथ ही पहचान की राजनीति, सामाजिक संतुलन और विकास की बहसें भी इस चुनाव को बहुआयामी बना देती हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि अंतिम फैसला जनता के हाथ में होता है। राजनीतिक दल अपने-अपने तर्क, वादे और आरोपों के साथ मैदान में उतरते हैं, लेकिन मतदाता अपने अनुभव और अपेक्षाओं के आधार पर निर्णय लेते हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास भी यही बताता है कि यहां के मतदाता कई बार अप्रत्याशित फैसले लेकर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका देते हैं।

ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि केवल एंटी-इन्कम्बेंसी, परिवर्तन का नारा या घुसपैठ का मुद्दा ही चुनाव का परिणाम तय कर देगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार का चुनाव पश्चिम बंगाल के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ देश की व्यापक राजनीति को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि पांच राज्यों के चुनावों के बीच भी सबसे ज्यादा निगाहें बंगाल की ओर टिकी हुई हैं, जहां सत्ता, पहचान और राजनीति की बहुस्तरीय लड़ाई एक बार फिर लोकतांत्रिक कसौटी पर परखी जाने वाली है।