असम विधानसभा चुनाव 2026: विकास, ध्रुवीकरण और नेतृत्व की लड़ाई के बीच निर्णायक मुकाबला

Assam Assembly Elections 2026: A decisive contest between development, polarisation and leadership battle

अजेश कुमार

पूर्वोत्तर भारत की राजनीति में असम हमेशा से एक केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है। 2026 के विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही राज्य में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। गांव-कस्बों से लेकर शहरों तक चुनावी पोस्टर, झंडे, जनसभाएं और यात्राएं चुनावी माहौल को और गर्म बना रही हैं। 126 सदस्यीय विधानसभा के लिए 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होगा और 4 मई को परिणाम घोषित किए जाएंगे। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 20 मई 2026 को समाप्त हो रहा है, इसलिए यह चुनाव राज्य की सत्ता के भविष्य को तय करने वाला महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव बन गया है।

पिछले एक दशक में असम की राजनीति में जो सबसे बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है, वह भारतीय जनता पार्टी का उदय है। 2016 में पहली बार भाजपा ने राज्य की सत्ता पर कब्जा किया था और 2021 में उसने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर सत्ता बरकरार रखी। 2021 के चुनाव में भाजपा ने 93 सीटों पर चुनाव लड़ा और 60 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि उसके नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए को कुल 75 सीटें मिली थीं। हालांकि 2016 के मुकाबले एनडीए की सीटों में कुछ कमी आई थी, लेकिन सत्ता उसके हाथ में ही रही।

दूसरी ओर, लंबे समय तक असम की राजनीति पर शासन करने वाली कांग्रेस पिछले एक दशक से विपक्ष में बैठी है। 2021 में कांग्रेस ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा था और केवल 29 सीटों पर जीत हासिल कर सकी थी। हालांकि उसके नेतृत्व वाले महाजोट गठबंधन को कुल 50 सीटें मिली थीं, जो 2016 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन था। इस पृष्ठभूमि में 2026 का चुनाव कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी का अवसर है, जबकि भाजपा के लिए अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत करने की परीक्षा।

इस बार का चुनाव गठबंधन की नई संरचनाओं के कारण और भी दिलचस्प हो गया है। पिछले चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन में रही ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट इस बार उसके साथ नहीं है। कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह एआईयूडीएफ के साथ कोई चुनावी समझौता नहीं करेगी। इसके बजाय उसने ‘असम सोनमिलितो मोर्चा’ नाम से एक नया विपक्षी गठबंधन बनाया है, जिसमें क्षेत्रीय दल असम जातीय परिषद समेत कई अन्य पार्टियां शामिल हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार कांग्रेस का यह कदम एक रणनीतिक बदलाव का संकेत है। पिछले चुनाव में एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन से कांग्रेस को मुस्लिम वोटों का समर्थन तो मिला था, लेकिन इससे हिंदू मतदाताओं के बीच भाजपा को ध्रुवीकरण का मौका भी मिला था। इस बार कांग्रेस संभवतः उस छवि से दूरी बनाकर व्यापक सामाजिक समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है।

भाजपा की ओर से भी गठबंधन का गणित बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। पार्टी अपने पुराने सहयोगी असम गण परिषद के साथ सीटों के बंटवारे पर बातचीत कर रही है। पिछले चुनाव में भाजपा ने एजीपी के लिए 22 सीटें छोड़ी थीं, लेकिन एजीपी केवल नौ सीटें ही जीत पाई थी। इस बार सीटों के बंटवारे में भाजपा अधिक सावधानी बरतना चाहती है। असम की राजनीति में बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (बीटीआर) की 15 सीटें हमेशा से निर्णायक रही हैं। इस क्षेत्र में जातीय और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति का गहरा प्रभाव है। इस बार भाजपा ने बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। समझौते के अनुसार बीपीएफ 11 सीटों पर और भाजपा चार सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

दिलचस्प बात यह है कि पिछले चुनाव में बीपीएफ कांग्रेस के साथ गठबंधन में था, जबकि भाजपा ने यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल के साथ चुनाव लड़ा था। लेकिन पिछले वर्ष हुए बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल चुनावों में बीपीएफ ने फिर से सत्ता हासिल कर ली, जिसके बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए। क्षेत्रीय सत्ता संतुलन को देखते हुए भाजपा ने बीपीएफ के साथ हाथ मिलाने का निर्णय लिया है। विशेषज्ञों के अनुसार बोडो बहुल इलाकों की ये सीटें भाजपा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि, इन क्षेत्रों में पार्टी को नुकसान होता है तो सत्ता की राह मुश्किल हो सकती है।

इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह दो नेताओं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और कांग्रेस नेता गौरव गोगोई के बीच सीधे मुकाबले का रूप लेता दिख रहा है। भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा लगभग तय माना जा रहा है, जबकि कांग्रेस ने औपचारिक घोषणा भले न की हो, लेकिन गौरव गोगोई को प्रमुख नेता के रूप में सामने ला दिया है।

कांग्रेस ने अपनी पहली उम्मीदवार सूची में गौरव गोगोई को जोरहाट विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाकर यह संकेत दिया है कि वह उन्हें राज्य स्तर पर नेतृत्व की भूमिका में आगे बढ़ाना चाहती है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री सरमा ने संकेत दिया है कि वे अपनी पारंपरिक सीट जालुकबाड़ी से ही चुनाव लड़ेंगे, जहां से वे 2001 से लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह चुनाव केवल पार्टियों के बीच नहीं बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक शैलियों के बीच भी संघर्ष है। एक तरफ हिमंत बिस्वा सरमा की आक्रामक और निर्णायक राजनीति है, जबकि दूसरी ओर गौरव गोगोई अपेक्षाकृत संयमित और संस्थागत राजनीति की छवि पेश करते हैं।

असम सरकार की अरुणोदय योजना इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन गई है। सरकार ने चुनाव से ठीक पहले अरुणोदय-3 योजना के तहत लगभग 40 लाख महिलाओं के खातों में सीधे 9 हजार रुपये ट्रांसफर किए हैं, जिसकी कुल लागत करीब 3600 करोड़ रुपये बताई जा रही है। यह कदम महिला मतदाताओं को साधने की रणनीति का हिस्सा है। असम में महिला मतदाताओं की संख्या लगभग पुरुषों के बराबर है, और कई क्षेत्रों में उनकी मतदान भागीदारी अधिक भी देखी गई है।

ऐसे में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण जैसी योजनाएं चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। कांग्रेस और विपक्षी दल भाजपा सरकार को भ्रष्टाचार और कथित ‘सिंडिकेट राज’ के मुद्दे पर घेरने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि राज्य में ठेकेदारी और संसाधनों के वितरण में एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा है, जिससे आम लोगों और छोटे व्यवसायियों को नुकसान हो रहा है।

कांग्रेस की ओर से जारी ‘पीपुल्स चार्जशीट’ में सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनमें भूमि को कॉरपोरेट घरानों को देने, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग जैसी बातें शामिल हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार विपक्ष इन मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में लाने की कोशिश करेगा, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ये आरोप मतदाताओं को प्रभावित कर पाते हैं या नहीं।

इस चुनाव में एक अप्रत्याशित मुद्दा राज्य के प्रसिद्ध गायक जुबिन गर्ग की मौत भी बन गया है। खासकर युवाओं के बीच इस मामले को लेकर काफी भावनात्मक प्रतिक्रिया देखी जा रही है। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है और कई जगहों पर न्याय की मांग उठाई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह मुद्दा चुनावी बहस में लगातार बना रहता है तो यह युवाओं के मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।

असम की राजनीति में पहचान का प्रश्न हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। ‘मियां मुसलमानों’ को लेकर मुख्यमंत्री के बयान और अवैध कब्जों के खिलाफ की गई कार्रवाई ने राज्य में एक खास तरह का राजनीतिक विमर्श पैदा किया है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह की राजनीति से एक तरफ भाजपा को हिंदू मतदाताओं का समर्थन मिल सकता है, जबकि दूसरी ओर विपक्ष इसे सामाजिक विभाजन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इसके अलावा छह स्थानीय समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग भी चुनावी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। भाजपा ने पिछले चुनाव में यह वादा किया था और अब विपक्ष सवाल उठा रहा है कि यह वादा अभी तक पूरा क्यों नहीं हुआ।

भाजपा सरकार अपने कार्यकाल के दौरान किए गए विकास कार्यों को चुनावी मुद्दा बना रही है। सरकार का दावा है कि उसने अवैध कब्जों से हजारों एकड़ सरकारी जमीन मुक्त करवाई, बाल विवाह के खिलाफ सख्त कार्रवाई की और बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए कानून लागू किया। इन कदमों से भाजपा को एक मजबूत प्रशासनिक छवि बनाने में मदद मिली है, लेकिन साथ ही बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक असंतोष जैसे मुद्दे भी मौजूद हैं, जिन्हें विपक्ष उठाने की कोशिश कर रहा है।

इस बार असम में कुल 2 करोड़ 49 लाख से अधिक मतदाता हैं। इनमें लगभग 1 करोड़ 24 लाख पुरुष और लगभग उतनी ही संख्या में महिला मतदाता हैं। इसके अलावा 343 थर्ड जेंडर मतदाता भी इस चुनाव में भाग लेंगे। इतने बड़े मतदाता आधार में महिलाओं, युवाओं और चाय बागान क्षेत्रों के श्रमिकों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

कुल मिलाकर, असम विधानसभा चुनाव 2026 केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बनाए रखने का चुनाव नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने वाला चुनाव भी है। एक तरफ भाजपा विकास, कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत नेतृत्व के आधार पर सत्ता बरकरार रखने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस गठबंधन की नई रणनीति और नेतृत्व परिवर्तन के जरिए वापसी का प्रयास कर रही है। इन सबके बीच पहचान की राजनीति, क्षेत्रीय आकांक्षाएं, सांस्कृतिक मुद्दे और आर्थिक चुनौतियां भी चुनावी विमर्श को प्रभावित कर रही हैं। यही कारण है कि यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के लिए ही नहीं, बल्कि असम के भविष्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।

अंततः यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता किसे प्राथमिकता देते हैं, स्थिरता और विकास के दावों को या परिवर्तन और नए नेतृत्व की उम्मीद को। 4 मई को आने वाले परिणाम न केवल असम की राजनीति बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र की राजनीतिक दिशा पर भी प्रभाव डाल सकते हैं।