दिलीप कुमार पाठक
विश्व जल दिवस यह कैलेंडर की कोई साधारण तारीख नहीं है, बल्कि हमारे वजूद की सबसे बुनियादी सच्चाई से रूबरू होने का एक गंभीर अवसर है। सुबह की पहली चाय की महक से लेकर रात को सुकून की नींद से पहले पिए गए पानी के उस आखिरी ठंडे घूँट तक, जल हमारे जीवन के हर कतरे और हमारी हर कोशिका में समाया हुआ है। ज़रा ठहरकर सोचिए, उस जल के बिना हमारा क्या वजूद रह जाएगा? वह जल जो प्यासे कंठ को तृप्ति देता है, तपती धरती की सदियों पुरानी प्यास बुझाता है और एक नन्ही सी कोपल को विशाल वृक्ष बनने का हौसला और पोषण देता है। हम अक्सर इसे महज़ एक ‘संसाधन’ कह देते हैं, पर सच तो यह है कि यह एक ‘पवित्र रिश्ता’ है, ‘प्रकृति का हमसे और हमारा उन मासूम पीढ़ियों से, जिन्हें अभी इस दुनिया में कदम रखना है’। बचपन की वे यादें आज भी दिल के किसी कोने में ताज़ा हैं, जब बारिश की पहली बूंद सूखी मिट्टी पर गिरती थी और एक सोंधी सी खुशबू पूरे घर के आँगन और रूह को महका देती थी। वह खुशबू दरअसल जीवन के मुस्कुराने की पहली आहट थी, जो हमें बताती थी कि कुदरत अभी हमसे रूठी नहीं है। लेकिन आज जब हम कंक्रीट के गगनचुंबी जंगलों में कैद होकर विकास का जश्न मना रहे हैं, तो यह कड़वी सच्चाई भूल जाते हैं कि हमने तरक्की की इस अंधी दौड़ में उन मासूम घरों को उजाड़ दिया है जहाँ कभी पानी खिलखिलाता था। ऊँची इमारतों की चकाचौंध और चमकते हुए डामर के रास्तों ने धरती की कोख पर ऐसी चादर बिछा दी है कि बादलों के आँसू अब पाताल के कलेजे तक पहुँच ही नहीं पाते।
वह समय अब एक धुंधला याद बनता जा रहा है जब गांव के कुएं, बावड़ियाँ और शहरों के तालाब समाज की सामूहिक पूंजी हुआ करते थे। हमने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए इन प्राकृतिक बसेरों को पाट दिया और ऊपर कंक्रीट के ढांचे खड़े कर दिए। अगर हम अपना सूक्ष्म मूल्यांकन करें, तो पाएंगे कि हम उस ‘अमृत’ के गुनहगार हैं जिसे हमने प्रदूषण और रसायनों से ज़हरीला बना दिया है। आज हमारी नदियाँ, जो कभी सभ्यताओं की जननी हुआ करती थीं, उद्योगों का कचरा और शहर की गंदगी ढोने वाली बेजान नहरें बनकर रह गई हैं। भू-जल का बेहिसाब दोहन पाताल को खाली कर रहा है और हम बोतलों में बंद पानी खरीदकर खुद को सुरक्षित समझने के भ्रम में जी रहे हैं। यह संकट केवल सूखे हुए हैंडपंपों का नहीं है, बल्कि हमारी मरती हुई मानवीय संवेदनाओं का है। नीति आयोग और दुनिया भर की संस्थाएं बार-बार ‘डे ज़ीरो’ की भयावह चेतावनी दे रही हैं, पर हम अपने घरों के खुलते नलों और वाशिंग मशीनों के शोर में उन चीखों को अनसुना कर रहे हैं। ज़रा सोचिए, क्या हम वास्तव में अपने बच्चों को विरासत में केवल प्यास और सूखी नदियाँ देना चाहते हैं? तकनीक के इस युग में हमें यह समझना होगा कि दुनिया की कोई भी प्रयोगशाला आज तक पानी की एक बूंद भी पैदा नहीं कर सकी है। यह केवल कुदरत का वह जादुई उपहार है जिसे हम मुफ्त समझकर लुटा रहे हैं।
वह किसान जो फटी आँखों से बादलों की ओर टकटकी लगाए बैठा है, वह मां जो कोसों दूर से मटका सिर पर रखकर पानी लाती है, और वह पंछी जो सूखे ताल पर प्यास से छटपटा रहा है, इन सबकी पुकार अब हमारे कानों तक पहुँचनी ही चाहिए। जल संरक्षण अब कोई सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक नागरिक धर्म होना चाहिए। वर्षा जल संचयन को अब शौकिया नहीं, बल्कि अनिवार्य बनाना होगा ताकि हम धरती के उस पुनर्भरण की क्षमता को फिर से जीवित कर सकें जिसे हमने छीन लिया है। एक टपकता हुआ नल केवल पानी की बर्बादी नहीं, बल्कि हमारे भविष्य की चोरी है। हमें अपनी जीवनशैली के उस हर हिस्से को बदलना होगा जहाँ हम पानी को बेशर्मी से बहाते हैं। जल ही वह अंतिम धागा है जिसने पूरी सृष्टि को एक माला में पिरोया हुआ है, और इस धागे को बचाना ही अब हमारा एकमात्र मकसद होना चाहिए। विकास की ऊँची उड़ान भरते हुए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस दिन जल का स्रोत मौन हो जाएगा, उस दिन हमारी तरक्की का सारा संगीत भी हमेशा के लिए थम जाएगा। आइए, आज इस विश्व जल दिवस पर हम दिखावे के संकल्पों से ऊपर उठकर, अपने स्वभाव में पानी का सम्मान करना शुरू करें। यह धरती हमारी नहीं, बल्कि हमारे बच्चों की अमानत है जिसे हमें सुरक्षित लौटाना है। याद रखिए, प्यास का कोई विकल्प नहीं होता और जब धरती की कोख से नमी पूरी तरह खत्म हो जाएगी, तब हमारे पास पछताने के लिए पानी भी नहीं बचेगा। वक्त तेज़ी से फिसल रहा है, और पानी भी—फैसला हमें करना है कि हम बूंदों को बचाएंगे या उन्हें केवल यादों में छोड़ जाएंगे।





