एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
वैश्विक स्तरपर अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के जटिल परिदृश्य में समय-समय पर ऐसे मुद्दे सामने आते हैं,जो न केवल दो देशों के संबंधों को प्रभावित करते हैं बल्कि वैश्विक विमर्श का भी हिस्सा बन जाते हैं। यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ओंन इंटरनेशनल रिलिजस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ़) 2026 की वार्षिक रिपोर्ट ने भारत- अमेरिका संबंधों में एक नई बहस को जन्म दिया है। इस रिपोर्ट में भारत के प्रमुख सामाजिक -सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और देश की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है। यह सिफारिश अपने आप में असाधारण है, क्योंकि यह किसी संप्रभु देश की आंतरिक संस्थाओं पर बाहरी संस्था द्वारा की गई टिप्पणी है।इस पूरे घटनाक्रम ने धार्मिक स्वतंत्रता,राष्ट्रीय संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप और राजनीतिक नैरेटिव के बीच जटिल संतुलन परगंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। बता दें यूएससीआईआरएफ़ एक स्वतंत्र अमेरिकी सरकारी निकाय है,जो धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों की निगरानी करता है औरअमेरिकी प्रशासन को नीतिगत सुझाव देता है।हालांकि यह संस्था व्हाइट हाउस को सिफारिशें देती है,लेकिन उसकी रिपोर्ट बाध्यकारी नहीं होती।लेकिन इसके बावजूद,इसकी रिपोर्टों का अंतरराष्ट्रीय स्तरपर प्रभाव पड़ता है,क्योंकि वे वैश्विक मानवाधिकार विमर्श को प्रभावित करती हैं। 2026 की रिपोर्ट में आयोग ने भारत को उन 18 देशों की सूची में शामिल करने की सिफारिश की है, जिन्हें विशेष चिंता वाले देश (कंट्री ऑफ़ पर्टिकुलर कंसर्न ) के रूप में नामित किया जाना चाहिए।इस सूची में अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश भी शामिल हैं, जिससे भारत को उसी श्रेणी में रखने पर स्वाभाविक रूप से विवाद उत्पन्न हुआ है। रिपोर्ट में आयोग द्वारा लगाए गए हैँ क़ि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन हो रहा है और कुछ संगठनों तथा संस्थाओं की भूमिका इस संदर्भ में संदिग्ध है।इसी आधार पर आरएसएस और रॉ पर लक्षित प्रतिबंध जैसे संपत्ति फ्रीज करना और अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगाना इसकी सिफारिश की गई है। इसके साथ ही, भारत को हथियार निर्यात पर रोक लगाने और द्विपक्षीय संबंधों को धार्मिक सुधारों से जोड़ने का सुझाव भी दिया गया है।
साथियों बात अगर हम इस रिपोर्ट पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया:संप्रभुता और साख का प्रश्न इसको समझने की करें तो, भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को सख्ती से खारिज करते हुए इसे पक्षपाती और प्रेरित बताया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह रिपोर्ट संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक पूर्वाग्रहों पर आधारित है, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। भारत का यह रुख केवल एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं,बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा का भी प्रतीक है।भारत का तर्क है कि एक विदेशी संस्था को देश की आंतरिक संस्थाओं और संगठनों पर इस प्रकार की टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है। विशेष रूप से रॉ जैसी संवेदनशील खुफिया एजेंसी पर प्रतिबंध की मांग को भारत ने पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है। भारत का यह भी कहना कि यूएससी आईआरएफ़ पिछले कई वर्षों से भारत के बारे में एकतरफा और नकारात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करता रहा है, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं।
साथियों बात अगर हम रिपोर्ट में दर्शाई गई आरएसएस और रॉ: विवाद के केंद्र में संस्थाएं इनको समझने की करें तो,आरएसएस भारत का एक प्रमुखसांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है, जिसकी स्थापना 1925 में हुई थी और जो देश के सामाजिक- राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहीं रॉ भारत की प्रमुख विदेशी खुफिया एजेंसी है,जो राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए कार्य करती है। इन दोनों संस्थाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस प्रकार के आरोप लगना अपने आप में असामान्य है।रॉ पर पहले भी कुछ अंतरराष्ट्रीय आरोप लगाए गए हैं, विशेष रूप से सिख अलगाव वाद से जुड़े मामलों में। 2025 की रिपोर्ट में भी आयोग ने इसी प्रकार के आरोपों के आधार पर रॉ पर प्रतिबंध की मांग की थी। हालांकि भारत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है और उन्हें बिल्कुल सटीक रूप से निराधार बताया है।
साथियों बात अगर हम अमेरिकी राजनीति और ट्रंप प्रशासन का संदर्भ इसको समझने की करें तो रिपोर्ट में विशेष रूप से ट्रम्प प्रशासन से इन सिफारिशों को लागू करने की अपील की गई है।यह उल्लेखनीय है कि अमेरिकी विदेश नीति में मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दे अक्सर रणनीतिक हितों के साथ जुड़े होते हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका फर्स्ट नीति के साथ-साथ कुछ मामलों में कड़े रुख भी देखने को मिले हैं। हालांकि यह स्पष्ट है कि यूएससीआईआरएफ़ की सिफारिशों को लागू करना पूरी तरह प्रशासन के विवेक पर निर्भर करता है।भारत और अमेरिका के बीच संबंध पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुए हैं, विशेष रूप से रक्षा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में। ऐसे में इस प्रकार की रिपोर्टें द्विपक्षीय संबंधों में तनाव उत्पन्न कर सकती हैं। हालांकि दोनों देशों के बीच मजबूत आर्थिक और सामरिक हितों को देखते हुए यह संभावना कम है कि इस रिपोर्ट के आधार पर कोई कठोर कदम उठाया जाएगा।फिर भी,यह घटना इस बात को रेखांकित करती है कि वैश्विक राजनीति में मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दे किस प्रकार कूटनीतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। भारत को भी इस प्रकार के आरोपों का प्रभावी ढंग से जवाब देने और अपनी स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता है। इस मुद्दे ने भारत की आंतरिक राजनीति में भी हलचल मचा दी है। भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी ने यूएससी आईआरएफ़ की सिफारिशों का समर्थन किया है, जबकि भारत की सत्ताधारी पार्टी ने इसे भारत विरोधी साजिश करार दिया है। उनका का आरोप है कि प्रमुख पक्षी पार्टी इस रिपोर्ट का समर्थन करके देश की छवि को नुकसान पहुंचा रही है।इस राजनीतिक विवाद में पक्ष विपक्ष के प्रमुख वक्ता जैसे नेताओं के बयान भी सामने आए हैं, जिन्होंने इस मुद्दे को और अधिक राजनीतिक बना दिया है। यह स्थिति दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें किस प्रकार घरेलू राजनीति का हिस्सा बन जाती हैं।निष्पक्षता पर सवाल:आयोग की विश्वसनीयता का मुद्दा यूएससीआईआरएफ़ की रिपोर्ट की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए गए हैं। कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि आयोग में ऐसे लोग शामिल हैं, जिनके विचार भारत के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण हैं। विशेष रूप से आयोग के एक सदस्य की पृष्ठभूमि को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया है।यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या ऐसी संस्थाएं वास्तव में निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ तरीके से काम करती हैं, या फिर वे किसी विशेष राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे से प्रभावित होती हैं। यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य देशों ने भी समय-समय पर ऐसी रिपोर्टों की आलोचना की है।
साथियों बात अगर हम धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय संप्रभुता को समझने की करें तो इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच संतुलन का है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दायित्व है कि वह मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करे,वहीं दूसरी ओर प्रत्येक देश को अपनी आंतरिक नीतियों और संस्थाओं पर पूर्ण अधिकार है। वैसे भी भारत जैसे बहु- सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक देश में धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है। भारत का संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, और देश में विभिन्न धर्मों के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं। ऐसे में बाहरी आरोपों को भारत अपनी संप्रभुता में हस्तक्षेप के रूप में देखता है।वैश्विक राजनीति में नैरेटिव की लड़ाईआज के समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सैन्य और आर्थिक शक्ति तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि “नैरेटिव” यानी विचारधारा और छवि की भी एक बड़ी भूमिका है। यूएससीआईआरएफ़ की रिपोर्ट को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है, जहां एक देश की छवि को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है।भारत को इस चुनौती का सामना करने के लिए अपनी कूटनीतिक रणनीति को और मजबूत करना होगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करना, तथ्यों के आधार पर जवाब देना और सकारात्मक छवि को बनाए रखना आज की आवश्यकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि संतुलन और संवाद की आवश्यकता जरूरी है यूएससीआईआरएफ़ की 2026 की रिपोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक स्तरपर धार्मिक स्वतंत्रता औरमानवाधिकार जैसे मुद्दे कितने संवेदनशील और विवादास्पद हैं।आरएस एस और रॉ पर प्रतिबंध की सिफारिश ने भारत-अमेरिका संबंधों में एक नई बहस को जन्म दिया है,जिसमेंकूटनीति राजनीति और वैचारिक संघर्ष सभी शामिल हैं।भारत ने इस रिपोर्ट को सख्ती से खारिज कर अपनी संप्रभुता और संस्थाओं की रक्षा का संदेश दिया है।वहीं, यह भी आवश्यक है कि ऐसे मुद्दों पर संवाद और पारदर्शिता बनी रहे, ताकि गलतफहमियों को दूर किया जा सके।इसलिए यह घटना हमें यह सिखाती है कि वैश्विक राजनीति में संतुलन, समझदारी और कूटनीतिक परिपक्वता कितनी महत्वपूर्ण है।





