तीज त्यौहारां आवणी ले, डूबी गणगौर…

Teej festivals have come, Gangaur has drowned…

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

राजस्थान की लोकभाषा और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में एक बेहद लोकप्रिय कहावत है— “तीज त्यौहारां आवणी ले, डूबी गणगौर”। यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि पूरे साल के उत्सव चक्र का सार है, जिसमें जीवन की लय, मौसम का बदलाव और लोकसंस्कृति का उत्साह समाहित है।

राजस्थान की सांस्कृतिक परंपराएं अपने रंग, उल्लास और लोकजीवन की गहराई के लिए देश-विदेश में विख्यात हैं। इन्हीं परंपराओं में सावन-भादो के मौसम में मनाया जाने वाला तीज से लेकर चैत्र माह में सम्पन्न होने वाला गणगौर तक का उत्सवी क्रम विशेष महत्व रखता है। यह केवल त्योहारों की श्रृंखला नहीं, बल्कि राजस्थान के सामाजिक, पारिवारिक और आध्यात्मिक जीवन का जीवंत उत्सव है।

तीज का पर्व विशेष रूप से महिलाओं का उत्सव माना जाता है। यह सावन की हरियाली, उमंग और प्रेम का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं झूले झूलती हैं, मेहंदी रचाती हैं, लोकगीत गाती हैं और भगवान शिव-पार्वती की पूजा कर वैवाहिक सुख और सौभाग्य की कामना करती हैं। नवविवाहिताओं के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वे अपने मायके जाकर इस उत्सव को हर्षोल्लास से मनाती हैं। जयपुर सहित राजस्थान के विभिन्न शहरों में तीज की भव्य सवारी निकाली जाती है, जिसमें पारंपरिक वेशभूषा, सजे-धजे हाथी-घोड़े और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र होती हैं।

तीज से शुरू हुआ यह उत्सवों का सिलसिला धीरे-धीरे पूरे प्रदेश में सांस्कृतिक रंग भरता हुआ आगे बढ़ता है। इसके बाद विभिन्न स्थानीय पर्व, मेलों और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से लोकजीवन में उत्साह बना रहता है। अंततः यह श्रृंखला चैत्र मास में आने वाले गणगौर पर्व पर जाकर पूर्णता को प्राप्त होती है।

गणगौर राजस्थान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से मनाया जाने वाला त्योहार है। “गण” का अर्थ है भगवान शिव और “गौर” का अर्थ है माता पार्वती। यह पर्व शिव-पार्वती के दांपत्य प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस दौरान विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए तथा अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए व्रत और पूजा करती हैं।

गणगौर का उत्सव कई दिनों तक चलता है, जिसमें महिलाएं प्रतिदिन मिट्टी या लकड़ी से बनी गणगौर की प्रतिमाओं की पूजा करती हैं। वे पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, जिनमें प्रेम, विरह और आस्था के भाव झलकते हैं। इस दौरान गांवों और शहरों में विशेष चहल-पहल देखने को मिलती है। महिलाएं रंग-बिरंगे परिधान पहनकर समूह में पूजा-अर्चना करती हैं, जिससे पूरा वातावरण उल्लासमय हो उठता है।

राजस्थान के विभिन्न शहरों में गणगौर की सवारी विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। उदयपुर और जयपुर में निकाली जाने वाली गणगौर की झांकियां देश-विदेश के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। सजे-धजे हाथी, घोड़े, बैंड-बाजे और लोकनर्तकों के साथ निकलने वाली यह शोभायात्रा राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन करती है।

इस पूरे उत्सवी क्रम का सामाजिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। तीज से लेकर गणगौर तक के त्योहार महिलाओं को सामाजिक रूप से जोड़ते हैं, उन्हें अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर देते हैं और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत बनाते हैं। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, जो राजस्थान की सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।

पर्यटन की दृष्टि से भी यह उत्सव श्रृंखला अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन त्योहारों के दौरान राजस्थान की लोकसंस्कृति, पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत और नृत्य देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। राज्य सरकार भी इन अवसरों पर विशेष आयोजन कर पर्यटन को बढ़ावा देती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।

अंततः कहा जा सकता है कि तीज से प्रारम्भ होकर गणगौर पर सम्पन्न होने वाला यह उत्सवी क्रम राजस्थान की जीवंत सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। यह न केवल धार्मिक आस्था का परिचायक है, बल्कि सामाजिक एकता, पारिवारिक मूल्यों और लोकजीवन की खुशियों का भी उत्सव है। इन पर्वों के माध्यम से राजस्थान अपनी परंपराओं को संजोए हुए आधुनिकता के साथ आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है।

“तीज त्यौहारां आवणी ले, डूबी गणगौर” का भाव यह है कि जीवन में उत्सवों की शुरुआत आनंद और उम्मीद से होती है और उनका समापन भी उतना ही भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होता है। यह कहावत हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में हर शुरुआत का एक सुंदर अंत होता है, और हर अंत के बाद एक नई शुरुआत की संभावना भी रहती है।

इस प्रकार, यह लोक कहावत राजस्थान की जीवंत संस्कृति, उत्सवप्रियता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का सशक्त प्रतीक है।