साहित्यिक आयोजनों में जुगलबंदी का जाल

A web of jugalbandhi in literary events

अकादमियों और संस्थानों की बंद दुनिया में अपनों का उत्सव

डॉ. प्रियंका सौरभ

भारतीय साहित्यिक परिदृश्य सदैव से विविधता, विचारशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक रहा है। यह वह क्षेत्र है जहाँ शब्द केवल रचना नहीं होते, बल्कि समाज के अनुभव, संघर्ष, संवेदनाएँ और परिवर्तन की आकांक्षाएँ भी अभिव्यक्त करते हैं। परंतु वर्तमान समय में साहित्यिक आयोजनों—विशेषकर सरकारी अकादमियों, संस्थानों, फाउंडेशनों और मंत्रालयों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों—को लेकर एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो रहा है: क्या ये मंच वास्तव में प्रतिभा और सृजनशीलता के आधार पर संचालित हो रहे हैं, या फिर ‘जुगलबंदी’ और ‘नेटवर्किंग’ ही इनके वास्तविक निर्धारक बन चुके हैं?

आज यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि इन आयोजनों में भागीदारी का अवसर उन्हीं लोगों को मिलता है, जिनकी आयोजकों, चयनकर्ताओं या संबंधित पदाधिकारियों से निकटता होती है। यह निकटता कई रूपों में सामने आती है—व्यक्तिगत संबंध, वैचारिक समानता, संस्थागत जुड़ाव या वर्षों से बनी आपसी ‘समझदारी’। परिणामस्वरूप, एक सीमित समूह बार-बार मंचों पर दिखाई देता है, जबकि बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली और समर्पित रचनाकार अवसरों से वंचित रह जाते हैं।

यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक विसंगति नहीं, बल्कि साहित्य के मूल स्वभाव के विपरीत है। साहित्य का उद्देश्य ही है—समाज के विविध अनुभवों को स्थान देना, नए स्वरों को पहचानना और अभिव्यक्ति के नए आयामों को प्रोत्साहित करना। जब मंच सीमित लोगों तक सिमट जाते हैं, तो साहित्य की यह व्यापकता संकुचित होने लगती है। यह एक प्रकार का ‘सांस्कृतिक केंद्रीकरण’ है, जहाँ अवसर और मान्यता कुछ हाथों में केंद्रित हो जाते हैं।

नई पीढ़ी के लेखकों और रचनाकारों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से निराशाजनक है। आज का युवा लेखक अपनी रचनात्मकता के बल पर आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन जब उसे यह महसूस होता है कि मंच तक पहुँचने के लिए ‘सही लोगों’ से संपर्क होना अधिक आवश्यक है, तो उसका उत्साह क्षीण होने लगता है। यह न केवल उसकी व्यक्तिगत यात्रा को प्रभावित करता है, बल्कि साहित्यिक परंपरा की निरंतरता को भी बाधित करता है।

इसके अतिरिक्त, यह प्रवृत्ति साहित्यिक विमर्श की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है। जब एक ही समूह के लोग बार-बार मंचों पर उपस्थित होते हैं, तो विचारों में विविधता घट जाती है। नए दृष्टिकोण, नए अनुभव और नई भाषिक शैलियाँ सामने नहीं आ पातीं। परिणामस्वरूप, साहित्य में एक प्रकार का ठहराव आ जाता है और वह समाज के बदलते स्वरूप को पूर्णतः प्रतिबिंबित नहीं कर पाता।

यह समस्या केवल साहित्य तक सीमित नहीं है; कला, संस्कृति और शिक्षा जैसे अन्य क्षेत्रों में भी ‘नेटवर्किंग’ और ‘जुगलबंदी’ की यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। परंतु साहित्य जैसे संवेदनशील और वैचारिक क्षेत्र में इसका प्रभाव अधिक गहरा होता है, क्योंकि यहाँ केवल अवसर ही नहीं, बल्कि विचारों की दिशा भी प्रभावित होती है।

हालाँकि, यह कहना भी एकतरफा होगा कि सभी संस्थान और आयोजन इसी प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं। कई ऐसे उदाहरण भी हैं, जहाँ आयोजकों ने पारदर्शिता और निष्पक्षता को प्राथमिकता दी है। खुले आमंत्रण (ओपन कॉल), स्पष्ट चयन प्रक्रिया और नए रचनाकारों को मंच देने की पहल—ये सभी सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन ऐसे प्रयास अभी भी व्यापक प्रवृत्ति का रूप नहीं ले सके हैं।

समाधान की दिशा में सबसे पहला और आवश्यक कदम है—पारदर्शिता। आयोजनों में भागीदारी के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक मानदंड निर्धारित किए जाने चाहिए। चयन प्रक्रिया में विविधता सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि किसी एक समूह या विचारधारा का वर्चस्व स्थापित न हो। निर्णायक मंडल में विभिन्न पृष्ठभूमियों के विशेषज्ञों को शामिल करना इस दिशा में एक प्रभावी कदम हो सकता है।

इसके साथ ही, नए और उभरते रचनाकारों के लिए विशेष मंच तैयार किए जाने चाहिए। ‘ओपन कॉल’ के माध्यम से आवेदन आमंत्रित करना, लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन करना और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करना—ये सभी उपाय अवसरों को अधिक समावेशी बना सकते हैं। तकनीक ने भौगोलिक सीमाओं को काफी हद तक समाप्त कर दिया है; अब आवश्यकता है कि इसका उपयोग साहित्यिक लोकतंत्र को सशक्त बनाने में किया जाए।

साहित्यिक समुदाय की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल आयोजकों पर प्रश्न उठाना पर्याप्त नहीं है; रचनाकारों, आलोचकों और पाठकों को भी इस विषय पर सजग और सक्रिय होना होगा। मौन स्वीकृति किसी भी व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाती है, जबकि सजग संवाद परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है।

मीडिया और सामाजिक मंच भी इस संदर्भ में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यदि इन मुद्दों को व्यापक स्तर पर उठाया जाए, तो संस्थानों पर सकारात्मक दबाव बनेगा। साथ ही, निष्पक्ष और पारदर्शी आयोजनों के उदाहरणों को सामने लाना भी आवश्यक है, ताकि एक स्वस्थ और प्रेरणादायक मॉडल विकसित हो सके।

अंततः, यह समझना आवश्यक है कि साहित्य केवल कुछ लोगों का मंच नहीं है; यह समाज की सामूहिक चेतना का दर्पण है। यदि इस दर्पण पर ‘जुगलबंदी’ की परत चढ़ जाएगी, तो प्रतिबिंब भी विकृत दिखाई देगा। साहित्य की आत्मा उसकी स्वतंत्रता, विविधता और निष्पक्षता में निहित है।

समय की माँग है कि हम इस प्रवृत्ति को पहचानें, उस पर खुलकर चर्चा करें और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाएँ। यदि हम आज सजग नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें इस असंतुलन के लिए उत्तरदायी ठहराएँगी।

इसलिए अब आवश्यक है कि साहित्यिक आयोजनों को ‘अपनों के उत्सव’ की सीमाओं से निकालकर ‘सार्वजनिक मंच’ बनाया जाए—जहाँ हर प्रतिभा को समान अवसर मिले, हर स्वर को अभिव्यक्ति का अधिकार हो, और साहित्य अपनी वास्तविक गरिमा के साथ समाज का मार्गदर्शन कर सके।

(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)