बंगाल विजयः संघ की जमीनी साधना शांति से शक्ति तक

Bengal Vijay: Sangh's grassroots efforts from peace to power

ललित गर्ग

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऐतिहासिक, अद्भुत, अविस्मरणीय एवं करिश्माई जीत के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) की बहुत बड़ी भूमिका रही है। निश्चिततौर पर इस शानदार जीत के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह मुख्य भूमिका में हैं। लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी की मजबूत चुनौती के सामने भाजपा की जीत के लिए संघ लंबे समय से मेहनत कर रही थी और उसकी वह मेहनत ही जीत का सशक्त माध्यम बनी है। पश्चिम बंगाल में लगातार चल रही हिन्दू विरोधी गतिविधियों एवं मुसलमानों के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए संघ ने इस चुनाव के मद्देनजर बहुत पहले से ही कमर कस ली थी, संघ ने पश्चिम बंगाल में 1.75 लाख से अधिक छोटी-बड़ी बैठकें आयोजित कीं। पिछले 15 सालों में संघ ने पश्चिम बंगाल में तेजी से विस्तार किया है और एक मजबूत ‘हिंदू वोट बैंक’ तैयार किया है। पश्चिम बंगाल में पिछले 15 वर्षों में संघ की शाखाओं की संख्या 900 से बढ़कर 5,000 तक पहुंच गई है। संघ के स्वयंसेवकों ने पश्चिम बंगाल में घर-घर जाकर ‘बंग बचाओ’ इस थीम पर ‘मतदाता जागरूकता अभियान’ चलाया। संघ की माइक्रो प्लानिंग ने बंगाल में भाजपा को ऐतिहासिक बढ़त दिलाई और सत्ता परिवर्तन का माध्यम बनी। पश्चिम बंगाल चुनाव भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक ‘मील का पत्थर’ और ऐतिहासिक सफलता साबित हुआ।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राजनीति केवल बड़े मंचों, विशाल रैलियों और जोरदार नारों से तय नहीं होती। कई बार असली लड़ाई उन स्तरों पर लड़ी जाती है, जहां न कैमरे पहुंचते हैं और न ही जमीनी प्रयास सुर्खियां बनती हैं। इस बार के चुनाव में एक ऐसी ही खामोश रणनीति कारगर साबित हुई है। जहां एक ओर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का आक्रामक चुनाव प्रचार केंद्र में रहा, वहीं दूसरी ओर संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं ने अपेक्षाकृत शांत रहकर ‘निःशब्द विप्लव’ या ‘मूक क्रांति’ को अंजाम देते हुए जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने पर ध्यान दिया। बंगाल की अस्मिता, विकास और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को आधार बनाकर जनजागरण अभियान चलाया गया। इस दौरान महिला, युवा, प्रबुद्ध वर्ग, किसान, श्रमिक और अनुसूचित जाति-जनजाति समुदायों तक अलग-अलग तरीकों से पहुंचने की कोशिश की गई।

निश्चिततौर पर पश्चिम बंगाल की राजनीति ने वर्ष 2026 में जो ऐतिहासिक करवट ली, वह केवल सत्ता परिवर्तन की घटना नहीं है, बल्कि एक गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक परिवर्तन का संकेत भी है। लंबे समय तक वामपंथी प्रभाव और उसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा, लेकिन इस बार जनमत ने जिस प्रकार से भाजपा के पक्ष में निर्णायक रूप से झुकाव दिखाया, उसने स्थापित राजनीतिक धारणाओं को चुनौती दी है। इस परिवर्तन के मूल में जो शक्ति को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी रही है तो वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसने एक अदृश्य लेकिन अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभाई है। यह विजय केवल चुनावी रणनीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों से चल रहे संगठनात्मक परिश्रम, वैचारिक विस्तार और समाज के भीतर गहराई तक किए गए संवाद का परिणाम है। पश्चिम बंगाल में संघ का विस्तार किसी तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित नहीं था, बल्कि यह एक दीर्घकालिक सामाजिक दृष्टि का हिस्सा था। पिछले डेढ़ दशक में संघ ने प्रांत में जिस प्रकार अपनी शाखाओं का विस्तार किया और समाज के विभिन्न वर्गों तक अपनी पहुंच बनाई, उसने एक मजबूत वैचारिक आधार तैयार किया। यह कार्य किसी प्रचार की तरह नहीं, बल्कि एक शांत सामाजिक प्रक्रिया एवं क्रांति की तरह हुआ, जिसने धीरे-धीरे जनमानस को प्रभावित किया। यही कारण है कि जब चुनाव का समय आया, तो एक पहले से तैयार मानसिकता भाजपा के पक्ष में खड़ी दिखाई दी।

इस पूरे परिदृश्य में सरसंघचालक मोहन भागवत की रणनीतिक दृष्टि को भी विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए। उन्होंने बंगाल को केवल एक राजनीतिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक भूमि के रूप में देखा, भारत की अस्मिता के रूप में देखा। जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान और परंपराएं हैं। संघ के प्रयासों में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि उसने बंगाल की सांस्कृतिक चेतना को समझने और उससे जुड़ने का प्रयास किया। दुर्गा पूजा, काली पूजा और रामनवमी जैसे पर्वों को सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे एक व्यापक सामाजिक जुड़ाव स्थापित हुआ। इस प्रक्रिया में हिंदुत्व को किसी बाहरी विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा के एक स्वाभाविक विस्तार के रूप में प्रस्तुत किया गया। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि बंगाली अस्मिता और हिंदुत्व परस्पर विरोधी हैं, लेकिन इस चुनाव में यह धारणा काफी हद तक टूटती हुई दिखाई दी। “जय श्री राम” के साथ “जय मां काली” और “जय मां दुर्गा” जैसे नारों का समन्वय केवल राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक संदेश था, जिसने यह स्थापित किया कि क्षेत्रीय पहचान और व्यापक सांस्कृतिक विचारधारा के बीच कोई टकराव नहीं है। इस समन्वय ने मतदाताओं के भीतर एक नई प्रकार की आत्मजागरूकता उत्पन्न की, जहां वे केवल विकास या योजनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी पहचान, सुरक्षा और सांस्कृतिक गौरव के आधार पर भी निर्णय लेने लगे।

चुनाव के दौरान जिस प्रकार से ‘अस्तित्व’ एवं ‘अस्मिता’ का विमर्श उभरा, उसने इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य को एक नई दिशा दी। संघ और भाजपा ने इसे केवल एक चुनावी मुकाबले के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष के रूप में स्थापित किया, जिसमें पहचान और सम्मान के प्रश्न प्रमुख हो गए। ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस पर लगाए गए तुष्टिकरण के आरोपों ने इस विमर्श को और तीव्र किया, जिससे मतदाताओं के बीच एक स्पष्ट ध्रुवीकरण देखने को मिला। इस पूरे प्रक्रिया में संघ ने जमीनी स्तर पर संवाद स्थापित कर इस विचार को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

संगठनात्मक दृष्टि से भी यह चुनाव एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि किस प्रकार मजबूत जमीनी ढांचा चुनावी सफलता का आधार बन सकता है। बूथ स्तर तक सक्रियता, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय, गुटबाजी पर नियंत्रण और नए-पुराने कार्यकर्ताओं का एकीकरण-इन सभी पहलुओं में संघ की भूमिका महत्वपूर्ण रही। यह केवल एक राजनीतिक दल का प्रयास नहीं था, बल्कि एक व्यापक संगठनात्मक सहयोग का परिणाम था, जिसने भाजपा को एक सशक्त चुनावी शक्ति के रूप में स्थापित किया।
इस जीत में नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीतिक क्षमता ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन इन प्रयासों को प्रभावी बनाने के लिए जिस सामाजिक आधार की आवश्यकता थी, वह संघ ने तैयार किया। यही कारण है कि यह जीत केवल शीर्ष नेतृत्व की सफलता नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर किए गए सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। इस चुनाव में बंगाल के मध्यम वर्ग का झुकाव भी एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में सामने आया। यह वर्ग परंपरागत रूप से विचारशील और राजनीतिक रूप से सजग माना जाता है और इसका समर्थन किसी भी राजनीतिक दल के लिए निर्णायक होता है। संघ ने इस वर्ग के बीच संवाद और जागरूकता के माध्यम से एक वैचारिक आधार तैयार किया, जिससे यह वर्ग भाजपा के समर्थन में एक मजबूत स्तंभ के रूप में उभरा। इस पूरे परिवर्तन को जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दृष्टिकोण और उनके सपनों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। उन्होंने जिस राष्ट्रवादी विचारधारा की नींव रखी थी, उसे आज बंगाल की धरती पर एक नए रूप में साकार होते हुए देखा जा रहा है। यह केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक वैचारिक निरंतरता का प्रतीक भी है।

अंततः यह स्पष्ट होता है कि पश्चिम बंगाल 2026 का चुनाव केवल एक चुनावी घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और वैचारिक परिवर्तन का प्रतीक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस प्रकार से वर्षों तक धैर्य और अनुशासन के साथ समाज के भीतर कार्य किया, वह आज परिणाम के रूप में सामने आया है। यह परिवर्तन यह संकेत देता है कि जब संगठनात्मक शक्ति, वैचारिक स्पष्टता और नेतृत्व की दिशा एक साथ मिलती है, तो वे न केवल राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करती हैं, बल्कि समाज की दिशा को भी बदलने की क्षमता रखती हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह परिवर्तन किस प्रकार आगे विकसित होता है और क्या यह केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित रहता है या एक स्थायी सामाजिक पुनर्जागरण का आधार बनता है।