मोबाइल की चकाचौंध में गुम हुआ बचपन

Childhood lost in the glare of mobile phones

दिलीप कुमार पाठक

आज की शाम किसी भी मोहल्ले के पार्क या कॉलोनी के पास से गुज़रिए, एक सन्नाटा मिलेगा, वह शोर-शराबा, बच्चों के चहकने की आवाज़े, और पकड़म-पकड़ाई के खेल अब न के बराबर दिखते हैं। अगर कुछ बच्चे नजर भी आते हैं, तो अक्सर वे किसी बेंच पर एक साथ बैठे, सिर झुकाए मोबाइल की स्क्रीन में खोए रहते हैं। उनके अंगूठे स्क्रीन पर तेज़ी से चल रहे होते हैं, जहाँ उनका डिजिटल खिलाड़ी मैदान पर बहुत तेज़ दौड़ रहा होता है, लेकिन हकीकत में उनके अपने पैर थमे हुए हैं।

यह मंजर आज की उस कड़वी हकीकत को बताता है जहाँ बचपन खेल के मैदानों से कटकर पांच इंच की स्क्रीन में सिमट गया है। 7 मई का दिन पूरी दुनिया में विश्व एथलेटिक्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। तारीखों के हिसाब से देखें तो यह दिन खेलों को बढ़ावा देने का एक मौका हो सकता है, लेकिन समाज के नाते यह दिन हमसे कुछ सवाल पूछता है। सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या हमारे जीवन से मैदान और मिट्टी का रिश्ता टूट रहा है? एथलेटिक्स कोई भारी-भरकम शब्द नहीं है, यह तो हम सबकी बुनियादी फितरत है। दौड़ना, कूदना और अपनी पूरी ताकत से भागना, ये वो चीजें हैं जो एक बच्चा चलना सीखने के साथ ही अपने आप करने लगता है। लेकिन जैसे-जैसे हम आधुनिक सुविधाओं की तरफ बढ़े, हमने बच्चों के भीतर के इस खिलाड़ी को सुरक्षा और पढ़ाई के नाम पर घरों के भीतर कैद कर दिया है । एक दौर था जब गाँव की पगडंडियों पर नंगे पैर दौड़ना या स्कूल के ऊबड़-खाबड़ मैदानों में पसीना बहाना ही दिन की सबसे बड़ी खुशी होती थी। तब न महंगे जूते थे, न कोई खास डाइट और न ही वातानुकूलित जिम। फिर भी शरीर मजबूत रहता था और मन में गजब का उत्साह।

आज तकनीक ने हमें सब कुछ दे दिया है, बस वह पसीना बहाने वाला ज़मीन का रिश्ता कहीं पीछे छूट गया है। आज का बच्चा स्कूल की पढ़ाई, भारी-भरकम ट्यूशन और फिर अंतहीन मुकाबलों की ऐसी अदृश्य रेस में दौड़ रहा है, जहाँ वह मानसिक रूप से तो थक जाता है, उसका शरीर सुस्त पड़ा रहता है । जब भी ओलंपिक जैसे बड़े खेल होते हैं, तो नीरज चोपड़ा या हिमा दास जैसे खिलाड़ियों की सफलता पर पूरा देश गर्व करता है। सोशल मीडिया पर उनकी तारीफों के पुल बांध दिए जाते हैं। लेकिन क्या एक समाज के तौर पर हम अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं? हकीकत यह है कि आज भी मध्यमवर्गीय परिवारों में खेलकूद को पढ़ाई के बाद का काम समझा जाता है। जैसे ही कोई बच्चा हाथ में फुटबॉल या गेंद, बैट उठाता है, माता-पिता को उसके भविष्य की चिंता होने लगती है। हम यह भूल जाते हैं कि मैदान केवल खिलाड़ी नहीं बनाते, बल्कि वे बेहतर इंसान बनाते हैं। एथलेटिक्स या कोई भी खेल हमें वह अनुशासन सिखाता है, मैदान पर जब कोई बच्चा गिरता है और अपनी धूल झाड़कर फिर से दौड़ने लगता है, तो असल में वह जीवन के बड़े संघर्षों का मुकाबला करने की तैयारी कर रहा होता है। खेल उसे हार को हिम्मत के साथ स्वीकार करना और जीत के लिए दोबारा मेहनत करना सिखाते हैं। आज के समय में जब बच्चों में चिड़चिड़ापन, तनाव और मोटापा बढ़ रहा है, तब खेल के मैदान ही सबसे बेहतर दवा साबित हो सकते हैं।

मोबाइल की स्क्रीन उसे पल भर की खुशी तो दे सकती है, लेकिन वह आत्मविश्वास नहीं दे सकती जो उसे असली मैदान पर पसीना बहाने से मिलता है। विश्व एथलेटिक्स दिवस पर यह सोचना ज़रूरी है कि क्या हम अपने बच्चों को केवल डिग्रियों की रेस का हिस्सा बनाना चाहते हैं या उन्हें एक स्वस्थ जीवन भी देना चाहते हैं? सरकारों का स्टेडियम बनाना या नए अभियान चलाना अपनी जगह ठीक है, लेकिन असली बदलाव हमारे घरों की सोच से शुरू होगा। जब तक खेल को टाइम-पास के बजाय व्यक्तित्व निखारने का ज़रूरी हिस्सा नहीं माना जाएगा, तब तक हमारे मैदान ऐसे ही सूने रहेंगे। वक्त आ गया है कि हम अपने बच्चों को वापस मिट्टी से जोड़ें। उन्हें यह समझाना ज़रूरी है कि असली रोमांच फोन के किसी गेम में नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे दोस्तों के साथ दौड़ने में है। मेडल तो शायद कुछ ही लोग जीत पाएंगे, लेकिन खेलों से मिला अनुशासन और जज़्बा हर उस बच्चे के काम आएगा जो जीवन की मुश्किलों से टकराने की हिम्मत रखता है। हम अपने बच्चों का हाथ थामें और उन्हें फिर से खेल के मैदानों की ओर ले जाएं, जहाँ उनका बचपन और उनकी सेहत, दोनों महफूज हैं।