सुनील कुमार महला
गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को बंगाल के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और समृद्ध परिवार में महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर के घर हुआ था। बचपन से ही असाधारण और बेहद संवेदनशील प्रतिभा के धनी टैगोर ने मात्र 8 वर्ष की आयु में अपनी पहली कविता लिख दी थी और बहुत कम लोग जानते होंगे कि शुरुआत में वे ‘भानुसिंह’ उपनाम से लिखते थे। उन्हें चारदीवारी वाली पारंपरिक स्कूली शिक्षा बिल्कुल पसंद नहीं थी, इसलिए उनकी अधिकांश शिक्षा घर पर ही स्वाध्याय और निजी शिक्षकों के माध्यम से हुई। इसी स्वाध्याय के बल पर उन्होंने संस्कृत, भारतीय दर्शन और नक्षत्र-विज्ञान का गहन अध्ययन किया। वर्ष 1877 में कानून की पढ़ाई के लिए उन्हें इंग्लैंड भेजा गया, परंतु वहां के शैक्षणिक माहौल से संतुष्ट न होने के कारण, वे बिना कोई डिग्री लिए भारत लौट आए। टैगोर एक ऐसे बहुमुखी रचनाकार थे, जिन्होंने कविता, संगीत, नाटक, कहानी और चित्रकला-हर क्षेत्र पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने 2000 से अधिक गीतों की शानदार व दमदार रचना की, जिन्हें आज ‘रवींद्र संगीत’ के नाम से जाना जाता है, जो बंगाली संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा हैं।
पाठक जानते होंगे कि उनकी कालजयी साहित्यिक कृति ‘गीतांजलि’ (गीतों का उपहार) मूल रूप से बंगाली में लिखी गई थी तथा यह 14 अगस्त 1910 को प्रकाशित हुई थी। जब टैगोर ने स्वयं इसका अंग्रेजी अनुवाद किया, तब महान आयरिश कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स(अंग्रेज़ी साहित्यकार) इसके अनुवाद से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने इस पुस्तक की ऐतिहासिक प्रस्तावना लिखी। इसी कृति के लिए टैगोर को वर्ष 1913 में साहित्य के क्षेत्र में विश्व का सर्वोच्च ‘नोबेल पुरस्कार’ प्राप्त हुआ और वे यह सम्मान पाने वाले पहले गैर-यूरोपीय बने। इसी वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उन्हें ‘डी-लिट्’ की उपाधि से भी सम्मानित किया। वर्ष 1915 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘नाइटहुड’ (सर) की मानद उपाधि दी, जिसे उन्होंने 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में अत्यंत क्षोभ के साथ वापस लौटा दिया।
टैगोर दुनिया के एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं-भारत का ‘जन-गण-मन’ और बांग्लादेश का ‘आमार सोनार बांग्ला’। इसके अलावा, श्रीलंका के राष्ट्रगान ‘श्रीलंका माथा’ के रचयिता आनंद समराकून भी शांतिनिकेतन में टैगोर के ही शिष्य थे, जिन्होंने गुरुदेव की संगीत शैली से प्रेरित होकर इसकी रचना की थी। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि भारत के राष्ट्रगान को लेकर कुछ समय यह विवाद भी उठा कि यह ब्रिटिश राजा की प्रशंसा में लिखा गया है, परंतु बाद में यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया कि यह मूल रूप से भारत की अंतरात्मा और उसके गौरव को समर्पित है।
बहरहाल, यहां पाठकों को यह भी जानकारी देता चलूं कि रवींद्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी के बीच का आत्मीय संबंध भी ऐतिहासिक है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि मोहनदास करमचंद गांधी को सबसे पहले ‘महात्मा’ की उपाधि टैगोर ने ही दी थी, जबकि गांधीजी ने उन्हें आदरपूर्वक ‘गुरुदेव’ कहकर पुकारा था। पाठक शायद यह बात नहीं जानते होंगे कि टैगोर ने अपनी पत्नी और बच्चों की असामयिक मृत्यु के गहरे आघात को झेला, जिसने उनके लेखन में संवेदनशीलता और आध्यात्मिक गहराई को और अधिक बढ़ा दिया। उन्होंने महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ विज्ञान और दर्शन के गूढ़ विषयों पर प्रसिद्ध संवाद किए। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में, 60 वर्ष की आयु में उन्होंने चित्रकला की शुरुआत की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे ‘रेड-ग्रीन कलर ब्लाइंडनेस’ (लाल और हरे रंग को ठीक से न पहचान पाने की शारीरिक सीमा) से ग्रसित थे, लेकिन इस बाधा को पार करते हुए उन्होंने लगभग 3,000 पेंटिंग्स बनाईं। रंगों की इस सीमा के कारण ही उन्होंने चमकीले रंगों के बजाय डार्क शेड्स और म्यूट टोन का उपयोग किया, जिसने उनकी कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई। सामाजिक मोर्चे पर, वे अंधविश्वासों के घोर विरोधी थे और उन्होंने बंगाल के पुनर्जागरण में अग्रणी भूमिका निभाते हुए बाल विवाह, छुआछूत और सती प्रथा जैसी सामाजिक बुराइयों का कड़ा विरोध किया। अपनी कहानियों ‘काबुलीवाला’ और ‘चोखेर बाली’, जो बहुत पठनीय व प्रसिद्ध रहीं हैं, के जरिए उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और मानवीय संवेदनाओं को स्वर दिया। इतना ही नहीं, यह भी जानकारी मिलती है कि वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के समय उन्होंने हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए ‘राखी’ को एकता के एक बड़े सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में स्थापित किया। बहुत कम लोग यह बात जानते होंगे कि स्वतंत्रता के बाद, वर्ष 1948 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया, जिससे वे भारतीय डाक टिकट पर स्थान पाने वाले पहले गैर-राजनीतिक व्यक्तित्व बने। इसके अतिरिक्त, टैगोर का यह मानना था कि ‘मानवता’ राष्ट्रवाद से कहीं ऊपर है और वे अंध राष्ट्रवाद के कड़े आलोचक थे। इसी वैश्विक दृष्टिकोण और विश्वबंधुत्व की भावना के साथ उन्होंने यूरोप, अमेरिका, चीन और जापान जैसे देशों की यात्राएं कीं। वे बंगाल के प्रसिद्ध सूफी संत और बाउल गायक लालन फकीर के मानवतावादी व सांप्रदायिक सौहार्द के संदेशों से गहरे प्रभावित थे, जिसकी झलक उनके आध्यात्मिक चिंतन में मिलती है।
उनका शिक्षा दर्शन प्रकृति की गोद में, चारदीवारी से मुक्त सहज विकास पर आधारित था। इसी उद्देश्य से उन्होंने 22 सितंबर 1921 को ‘विश्वभारती’ नामक शैक्षिक संस्थान (शांतिनिकेतन) की स्थापना की, जिसके विकास के लिए उन्होंने लगातार 20 वर्षों तक अथक प्रयास किया और नोबेल पुरस्कार से मिली पूरी राशि इसमें लगा दी। वे पश्चिम के विज्ञान, तकनीक व तर्कशीलता को पूर्व के अध्यात्म, शांति व मानवीय मूल्यों के साथ जोड़ना चाहते थे। इसी तालमेल को दर्शाने के लिए उन्होंने विश्वभारती का ध्येय वाक्य ‘यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्’ (जहाँ पूरा विश्व एक घोंसला बन जाता है) रखा था। वास्तव में, उनका शिक्षा दर्शन बाल-केंद्रित था और वे चाहते थे कि बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा केवल उनकी मातृभाषा में ही हो। उन्होंने सीखने के लिए ‘लर्निंग बाइ डूइंग’ (करके सीखना) और ‘भ्रमण विधि’ को सर्वश्रेष्ठ माना। उनके पाठ्यक्रम में केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि खेलकूद, बागवानी, ड्राइंग, गायन, नृत्य, प्रयोगशाला कार्य और छात्र-स्वशासन जैसी गतिविधियां शामिल थीं। सच तो यह है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर का शिक्षा दर्शन अत्यंत व्यापक, मानवतावादी और प्रकृति-केन्द्रित था। वे मानते थे कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य व्यक्ति के समग्र विकास (शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक) को सुनिश्चित करना है। टैगोर ने शिक्षा को स्वतंत्रता, रचनात्मकता और आनंद से जोड़ते हुए कहा कि बच्चों को खुले वातावरण-प्रकृति के बीच-सीखने का अवसर मिलना चाहिए, जिससे उनकी कल्पनाशक्ति और जिज्ञासा विकसित हो सके।उन्होंने शिक्षा में कला, संगीत, साहित्य और नाटक को महत्वपूर्ण स्थान दिया, ताकि विद्यार्थी केवल ज्ञान ही नहीं बल्कि संवेदनशील और सृजनशील इंसान बन सकें। टैगोर का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि मानवता, नैतिकता और विश्व बंधुत्व की भावना विकसित करना है। इसी विचार को साकार करने के लिए, जैसा कि ऊपर इस आलेख में पहले भी चर्चा कर चुका हूं कि, उन्होंने विश्व-भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की, जहाँ भारतीय और पाश्चात्य शिक्षा का समन्वय किया गया। वास्तव में,वे बच्चों के नैतिक, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए हस्तकला (क्राफ्ट) के प्रशिक्षण को भी जरूरी मानते थे। शिक्षक के संदर्भ में उनका विचार था कि ‘मनुष्य केवल मनुष्य से ही सीख सकता है’, इसलिए शिक्षक को हमेशा पूर्वाग्रह-मुक्त, स्नेही, ज्ञानी और समर्पित होना चाहिए, जो बालक को अपने निजी अनुभवों से स्वयं सीखने का वातावरण दे। 75 वर्ष की आयु पार करने के बाद भी वे निरंतर लिखते रहे और उनकी अंतिम कविताएं भी उतनी ही गहन थीं, जितना की शुरूआती दौर में। आधुनिक भारत में शैक्षिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के सबसे महान पैगंबर, समाज सुधारक और दार्शनिक रवींद्रनाथ टैगोर का निधन 7 अगस्त 1941 को उनके पैतृक आवास ‘जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी’ में हुआ था, जो कोलकाता में स्थित है, यही उनका जन्मस्थान भी था।
हाल फिलहाल, यदि हम यहां पर संक्षिप्त रूप में कहें तो यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उनका शिक्षा दर्शन और मानवतावादी विचार आज भी पूरी दुनिया का मार्गदर्शन कर रहे हैं।सच तो यह है टैगोर का शिक्षा दर्शन स्वतंत्रता, प्रकृति, सृजनात्मकता और मानवता पर आधारित था, जो आज भी आधुनिक शिक्षा के लिए प्रेरणास्रोत है।





