गुरु से ‘दिहाड़ी मजदूर’ तक—शिक्षा व्यवस्था का कड़वा सच

From Guru to 'Daily Wage Labourer'—The Bitter Truth of the Education System

सत्य भूषण शर्मा

कभी किसी ने सोचा है… जिसे हम ‘गुरु’ कहते थे, वो आज ‘दिहाड़ी मजदूर’ क्यों बन गया?

यह प्रश्न केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आज की शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करता हुआ आईना है। भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया—“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः…”—परंतु आज वही गुरु अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए संघर्ष करता नजर आता है।

एक समय था जब शिक्षक समाज का निर्माता माना जाता था। उसकी वाणी में विश्वास होता था, उसके ज्ञान में गरिमा होती थी, और उसके व्यक्तित्व में आदर्शों की झलक दिखाई देती थी। परंतु वर्तमान परिदृश्य में स्थिति चिंताजनक है। आज शिक्षक को हर दिन स्वयं को साबित करना पड़ता है—कभी परिणामों के आधार पर, कभी स्कूल प्रशासन एवं प्रबंधन की अपेक्षाओं पर, तो कभी अभिभावकों के सवालों के कटघरे में।

यदि एक निजी विद्यालय के शिक्षक की दिनचर्या पर नजर डालें, तो यह किसी संघर्षशील मजदूर से कम नहीं लगती। सुबह जल्दी उठकर विद्यालय पहुंचना, बच्चों को पूरे समर्पण से पढ़ाना, फिर प्रबंधन के निर्देशों का पालन करना, अभिभावकों की अपेक्षाओं का दबाव सहना—और महीने के अंत में इतनी अल्प वेतन प्राप्त करना कि स्वयं का सम्मान भी जैसे किस्तों में बंट जाए। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक पीड़ा का भी कारण बनती जा रही है।

प्रश्न यह नहीं है कि शिक्षक अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था उसे वह सम्मान और सुरक्षा प्रदान कर पा रही है, जिसका वह हकदार है? आज शिक्षा संस्थान धीरे-धीरे व्यवसाय का रूप ले चुके हैं, जहाँ विद्यार्थी ‘भविष्य’ नहीं, बल्कि ‘फीस’ के रूप में देखे जाने लगे हैं। ऐसे में शिक्षक को एक “स्थापन्न एम्प्लोई” की तरह समझा जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

सबसे अधिक विडंबना यह है कि जो शिक्षक प्रतिदिन सैकड़ों विद्यार्थियों का भविष्य संवारता है, उसका अपना भविष्य अनिश्चितताओं के भंवर में फंसा रहता है। वह दूसरों के सपनों को साकार करता है, पर उसके अपने सपने अक्सर वेतन-पर्ची की सीमाओं में ही दम तोड़ देते हैं।

फिर भी, इस अंधकार में एक आशा की किरण है। सच्चा शिक्षक कभी हार नहीं मानता। वह इस व्यवस्था का शिकार होकर भी अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता। वह जानता है कि यदि उसने भी हार मान ली, तो शिक्षा केवल अंकों की दौड़ बनकर रह जाएगी और विद्यार्थी ‘मानव’ नहीं, ‘मशीन’ बन जाएंगे।

असली शिक्षक वह नहीं जो केवल पाठ्यक्रम समाप्त करे, बल्कि वह है जो इस टूटती व्यवस्था में भी बच्चों को संवेदनशील, जागरूक और जिम्मेदार इंसान बनाना सिखाए। वह अपने ज्ञान के साथ-साथ अपने मूल्यों का भी संचार करता है।

आज आवश्यकता है कि समाज और सरकार दोनों मिलकर इस स्थिति पर गंभीरता से विचार करें। शिक्षक को केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता के रूप में पुनः स्थापित किया जाए। उचित वेतन, सम्मानजनक कार्य वातावरण और सामाजिक प्रतिष्ठा—ये केवल अपेक्षाएं नहीं, बल्कि शिक्षक के अधिकार हैं।

हर शिक्षक के लिए यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है— आप मजदूर नहीं हैं, आप वह शक्ति हैं जो एक पूरी पीढ़ी की सोच को दिशा दे सकती है। भले ही वर्तमान व्यवस्था आपकी कद्र न करे, पर आपके विद्यार्थी आपकी असली पहचान को अवश्य समझेंगे। एक दिन वही विद्यार्थी आपकी मेहनत और समर्पण का सम्मान करेंगे, और तब कोई भी व्यवस्था आपको ‘दिहाड़ी मजदूर’ कहने का साहस नहीं कर पाएगी।