संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग : आत्मनिर्भर भारत की नई दिशा

Prudent use of resources: The new direction of self-reliant India

सुनील कुमार महला

पश्चिम एशिया में गहराते संकट, अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध जैसे तनावपूर्ण हालात तथा वैश्विक स्तर पर पैदा हुए पेट्रोलियम संकट के बीच हाल ही में हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से कोविड काल जैसे उपाय फिर अपनाने की अपील की है। उन्होंने नागरिकों से पेट्रोल-डीजल का संयमित उपयोग करने, रासायनिक खाद और ईंधन की खपत कम करने, एक वर्ष तक सोने की गैर-जरूरी खरीद से बचने तथा संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने का आग्रह किया है। कहना ग़लत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री की यह अपील केवल एक सामान्य सलाह नहीं, बल्कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में राष्ट्रहित, आर्थिक स्थिरता, पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार नागरिकता का व्यापक संदेश है।पाठक जानते हैं कि आज पूरी दुनिया युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट, महंगाई और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) की समस्याओं से जूझ रही है। पिछले कुछ समय से मीडिया की सुर्खियों में गैस-तेल संकट, खाद्यान्न संकट और लगातार बढ़ती महंगाई की खबरें प्रमुखता से सामने आती रही हैं। भारत में भी अनेक स्थानों पर रसोई गैस के लिए लंबी-लंबी कतारें देखने को मिलीं। ऐसे समय में प्रधानमंत्री द्वारा पेट्रोल-डीजल की बचत तथा कोविड काल के दौरान अपनाए गए उपायों को पुनः व्यवहार में लाने की अपील को दूरदर्शी कदम माना जा रहा है।

बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि प्रधानमंत्री मोदी ने 10 मई 2026, रविवार को हैदराबाद में आयोजित एक जनसभा में कहा कि कोविड महामारी के दौरान देश ने कई महत्वपूर्ण व्यवस्थाएँ विकसित की थीं और अब समय की मांग है कि उन उपायों को फिर से प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, सीमित यात्राएँ और आवश्यकता के अनुसार संसाधनों का उपयोग जैसी आदतें देशहित में फिर अपनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कोविड काल में लोगों ने ‘जरूरत भर उपयोग’ की जीवनशैली को अपनाया था। उस दौरान अनावश्यक यात्राएँ कम हुईं, कार-पूलिंग बढ़ी, ऑनलाइन कार्य संस्कृति विकसित हुई और ईंधन की खपत में उल्लेखनीय कमी आई थी।वास्तव में कोविड काल के दौरान ईंधन की खपत में आई भारी कमी का सकारात्मक प्रभाव पर्यावरण पर भी देखने को मिला था। प्रदूषण स्तर घटा, हवाएँ स्वच्छ हुईं और आसमान साफ दिखाई देने लगे। लोगों ने बेहतर पर्यावरण और स्वच्छ हवा का अनुभव किया। यही कारण है कि प्रधानमंत्री की इस अपील का एक बड़ा पक्ष पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है। यदि लोग छोटी दूरी के लिए पैदल चलना, साइकिल का उपयोग करना, सार्वजनिक परिवहन तथा साझा वाहन यानी कार-पूलिंग जैसी आदतें अपनाएँ, तो कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती से निपटने में मदद मिलेगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दुनिया इस समय कई बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है। कोविड महामारी के दौरान ही यूक्रेन युद्ध शुरू हो गया, जिससे वैश्विक समस्याएँ और अधिक बढ़ गईं। युद्धों के कारण विश्वभर में पेट्रोल, डीजल, गैस और खाद की कीमतें तेजी से बढ़ीं और कई मामलों में सारी सीमाएँ पार कर गईं। उन्होंने कहा कि भारत के पास तेल के बड़े भंडार नहीं हैं और देश को अपनी जरूरत का अधिकांश पेट्रोल, डीजल और गैस विदेशों से आयात करना पड़ता है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल की खपत कम करना केवल व्यक्तिगत बचत का विषय नहीं, बल्कि देश की आर्थिक स्थिरता और विदेशी मुद्रा बचत से भी जुड़ा हुआ है।उन्होंने यह कहा है कि विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हम सभी का दायित्व है कि ईंधन की खपत कम करें। इतना ही नहीं, उन्होंने लोगों से अनावश्यक विदेश यात्राएँ टालने और घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की अपील की। उन्होंने यहां तक कहा है कि घूमने या शादियों के लिए विदेशी स्थानों को चुनने के बजाय भारत के पर्यटन स्थलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने स्वदेशी उत्पादों के उपयोग पर बल देते हुए कहा कि जहाँ तक संभव हो, घरेलू इस्तेमाल की वस्तुएँ जैसे जूते, बैग और अन्य सामान स्वदेशी ही खरीदना चाहिए। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने खाद्य तेल के उपयोग को कम करने की भी सलाह दी है। उनका कहना था कि इससे एक ओर देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी तो दूसरी ओर लोगों का स्वास्थ्य भी बेहतर रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी अस्थिर क्यों न हों, भारत की असली शक्ति उसके 1.4 अरब नागरिकों के छोटे-छोटे प्रयासों में निहित है। उनका स्पष्ट संदेश था कि भारत के विकास का अगला अध्याय केवल सरकारी नीतियों में नहीं, बल्कि पेट्रोल पंप, भोजन की मेज और आभूषण की दुकानों पर लिए जाने वाले निर्णयों में भी लिखा जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने विशेष रूप से यह संकल्प लेने का आह्वान किया कि अगले एक वर्ष तक कोई भी व्यक्ति गैर-जरूरी सोने की खरीद नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। उन्होंने सामान की ढुलाई के लिए रेलवे की मालवाहक सेवाओं के अधिक उपयोग पर बल दिया तथा इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की सलाह दी। इतना ही नहीं, उन्होंने रासायनिक खादों के उपयोग को 50 प्रतिशत तक कम करने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की बात भी कही। वास्तव में, इससे भूमि की उर्वरता बढ़ेगी, जमीन की सेहत सुधरेगी और आयातित उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी। उन्होंने गाँवों में डीजल पंपों के स्थान पर सोलर संचालित पंप लगाने की भी सलाह दी, ताकि डीजल की खपत घटाई जा सके।वास्तव में प्रधानमंत्री की यह अपील ‘संयमित उपभोग’ और ‘जिम्मेदार नागरिकता’ का संदेश देती है। आज जब जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है, तब संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी बन गया है। कोविड काल ने यह सिखाया था कि सीमित संसाधनों में भी जीवन को संतुलित, व्यवस्थित और अनुशासित ढंग से चलाया जा सकता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री का यह संदेश आत्मनिर्भर भारत, ऊर्जा संरक्षण और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) की दिशा में जनभागीदारी बढ़ाने का महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। यदि नागरिक अपनी छोटी-छोटी आदतों में परिवर्तन लाएँ, तो उसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर अत्यंत व्यापक हो सकता है। वास्तव में प्रकृति ने मनुष्य को जल, वन, भूमि, खनिज, ऊर्जा और वायु जैसे अमूल्य संसाधन प्रदान किए हैं। ये संसाधन मानव जीवन, विकास और सभ्यता की आधारशिला हैं। किंतु बढ़ती जनसंख्या, अंधाधुंध उपभोग और भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ ने इन संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाल दिया है। यदि समय रहते इनके संरक्षण और संतुलित उपयोग पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ सकता है।

संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग केवल कम उपयोग करना नहीं, बल्कि आवश्यकता के अनुसार संतुलित, जिम्मेदार और दूरदर्शी उपयोग करना है। जल का अनावश्यक बहाव रोकना, बिजली की बचत करना, कागज का सीमित उपयोग, ईंधन की खपत कम करना तथा पुनर्चक्रण यानी रीसाइक्लिंग को अपनाना इसके सरल उदाहरण हैं। आज अनेक शहरों में जल संकट गहराता जा रहा है, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और जंगल तेजी से कट रहे हैं। यह स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि यदि मानव ने अपनी आदतों में सुधार नहीं किया, तो प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ता जाएगा। दरअसल, संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का सीधा प्रभाव हमारी धरती और पर्यावरण पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, सूखा, बाढ़ और प्रदूषण जैसी समस्याएँ इसी असंतुलित उपयोग का परिणाम हैं। इसलिए आवश्यक है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन, वृक्षारोपण, प्राकृतिक खेती और सतत विकास की नीतियाँ इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकती हैं।यहाँ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का प्रसिद्ध कथन अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है, जिन्होंने यह बात कही थी कि -‘प्रकृति हर व्यक्ति की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक के लालच को नहीं।’ वास्तव में प्राकृतिक संसाधन केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर भी हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह संसाधनों का सोच-समझकर उपयोग करे और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करे।

अंततः यह कहना उचित होगा कि देशभक्ति केवल देश के लिए बलिदान देने तक सीमित नहीं होती, बल्कि संकट के समय जिम्मेदारीपूर्ण जीवन जीना और राष्ट्रहित में छोटे-छोटे त्याग करना भी सच्ची देशभक्ति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह अपील केवल पेट्रोल-डीजल बचाने तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक मजबूती, ऊर्जा सुरक्षा, संयमित उपभोग और जिम्मेदार नागरिकता का व्यापक संदेश है। जब समाज में संरक्षण, संतुलन और जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी, तभी पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, अर्थव्यवस्था मजबूत बनेगी और मानव जीवन सुखद, स्वस्थ तथा संतुलित बन सकेगा।