विक्रमशिला सेतु की शोक सभा

Vikramshila Bridge condolence meeting

विनोद कुमार विक्की

25 वर्षीय दिवंगत युवा पुल की शोकसभा में देशभर के नए-पुराने पुलों की भीड़ उमड़ पड़ी। सौ वर्ष या उससे अधिक आयु पार कर चुके अनुभवी पुलों के चेहरे पर एक अजीब-सी निश्चिंतता थी, जबकि नवोदित और युवा पुलों के चेहरे पर भय और असुरक्षा का भाव साफ झलक रहा था।
बिना पिलर के खड़ा हावड़ा पुल, कहीं का लकड़ी पुल, लोहे के पुल, पीपा पुल, कंक्रीट पुल और यहाँ तक कि निर्माणाधीन पुलों के अधूरे ढाँचे भी अपनी-अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करने पहुँचे थे।
सभा की अध्यक्षता करते हुए बुजुर्ग हावड़ा पुल ने भारी स्वर में कहा—
“मित्रों, हमारा पुल समाज आज गंभीर खतरे में है…”
इतने में पहाड़ी क्षेत्र से आए एक लोहे के पुल ने बीच में टोका—
“लेकिन भैया, हमने तो सुना है कि आजकल धर्म खतरे में है!”
तभी गाँधी सेतु ने झुंझलाकर डाँटा—
“अरे चचा! शोकसभा में भी बकलोली! हावड़ा ब्रिज अंकल को बोलने दीजिए।”
हावड़ा पुल ने खाँसते हुए फिर अपनी बात शुरू की—
“विक्रमशिला बहुत नेक और कर्मठ पुल था। उस पर परिवहन का अत्यधिक दबाव था। दो-दो दिनों तक जाम की स्थिति बनी रहती थी… ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे।”
इतने में हैदराबाद का एक पुराना पुल बोला—
“आख़िर आजकल के पुलों को हो क्या गया है? कोई शैशवावस्था में ही दम तोड़ देता है, तो कोई युवावस्था में ही शहीद हो जाता है। हम तो दशकों से बिना किसी विशेष सहारे के जनता का भार ढो रहे हैं और ये नई पीढ़ी…”
नैनी पुल ने सहमति जताते हुए कहा—
“जाम, अत्यधिक भार और प्राकृतिक आपदाएँ—यही कारण हैं कि हमारे युवा साथी समय से पहले दम तोड़ रहे हैं।”
तभी पंबन ब्रिज ने अपनी दाढ़ी सहलाते हुए कहा—
“नहीं भाई, असली कारण ‘खान-पान’ है! मिलावटी कंक्रीट, घटिया सरिया और कमजोर सीमेंट… पोषण ही नहीं मिलेगा तो सेहत कैसे बनेगी?”
इतने में निर्माणाधीन अगुवानी पुल का अधूरा ढाँचा भी बोल पड़ा—
“छोटा मुँह, बड़ी बात… पंबन चाचा बिल्कुल सही कह रहे हैं। हमारी ‘आया’ यानी निर्माण एजेंसी ही हमें ठीक से पोषण नहीं देती। पिछले मानसून में भ्रष्टाचार और कुपोषण के शिकार हमारे कई युवा साथी ढहकर सामूहिक ‘आत्मदाह’ कर बैठे।”
सभा में सन्नाटा छा गया।
तभी एलिस ब्रिज ने गंभीर स्वर में कहा—
“दरअसल, यह सब ठेकेदारों और माफियाओं के भ्रष्टाचार का परिणाम है। नवोदित पुलों को जन्म से पहले ही मारने की साजिश हो रही है। अगुवानी बेटा,तुम तो भ्रूणहत्या के शिकार हो चुके हो, तुम्हारा ढाँचा तो तीन-तीन बार गिर चुका है!”
थोड़ी देर के मौन के बाद कोइलवर पुल ने मुंगेर के श्री कृष्ण सेतु के कंधे पर हाथ रखकर कहा—
“बेटा, अब विक्रमशिला का अतिरिक्त भार और जाम तुम्हें ही संभालना होगा।”
संवेदना और दहशत के बीच सभी पुलों ने पुष्प अर्पित किए। माहौल ऐसा था मानो शोकसभा कम और भविष्य की अनिश्चितता पर विचार गोष्ठी अधिक हो।
अंत में हावड़ा पुल ने सभा समाप्त करते हुए कहा—
“इस सभा को यहीं समाप्त किया जा रहा है मित्रों… क्या पता विक्रमशिला की तेरहवीं से पहले किसी और युवा पुल की श्रद्धांजलि सभा में शामिल होना पड़ जाए!” और, फिर सभी पुल भारी मन से लौट पड़े।