दिलीप कुमार पाठक
आज की तारीख में राजनीति को देखें, तो कांग्रेस और भाजपा के बीच की जंग अब एक नए मोड़ पर है। एक तरफ दक्षिण भारत है, जहाँ राहुल गांधी ने गजब की मैच्योरिटी दिखाई है। तमिलनाडु में जब सुपरस्टार थलापति विजय ने अपनी नई पार्टी टीवीके के साथ मैदान मारा, तो राहुल ने किसी ‘बड़े भाई’ की अकड़ दिखाने के बजाय उन्हें सम्मान दिया। यह राहुल की ही रणनीति थी कि भाजपा को रोकने के लिए वहां एक ऐसी लामबंदी हुई कि पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन तक को कहना पड़ा कि ‘छह महीने तक विजय से कोई सवाल नहीं होगा’। कल जब विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो कांग्रेस वहां एक उदार साथी के रूप में खड़ी थी।
कर्नाटक, तेलंगाना और केरल में अपनी पकड़ मजबूत कर कांग्रेस ने दक्षिण को अपना अभेद्य किला बना लिया है। लेकिन, जैसे ही हम विंध्य पर्वत पार कर उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में आते हैं, कहानी एकदम उलट जाती है। सवाल वही है जो दांव समंदर किनारे फिट है, वह गंगा यमुना के मैदानों में आकर फेल क्यों हो जाता है? उत्तर भारत में कांग्रेस का वोट शेयर आज भी 35 से 45 फीसदी के बीच रहता है। 2024 के चुनाव में मिला 21.2% का राष्ट्रीय वोट शेयर बताता है कि जनता हाथ का साथ देने को तैयार है, लेकिन दिक्कत ‘चेहरों’ की है। भाजपा ने यहाँ बड़ी चालाकी से ‘पीढ़ी परिवर्तन’ कर दिया। उसने मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में अपने पुराने दिग्गजों को किनारे लगा दिया और नए चेहरों को कमान सौंप दी। वहीं कांग्रेस अब भी उन ‘पुराने गार्ड्स’ के मोह से बाहर नहीं निकल पा रही है, जो खुद तो चुनाव जीत नहीं पाते लेकिन किसी नए को उभरने भी नहीं देते। उत्तर भारत में कांग्रेस की जड़ें कोई और नहीं, बल्कि वही बुजुर्ग नेता काट रहे हैं जो दशकों से संगठन पर कुंडली मारकर बैठे हैं। इन नेताओं का अपना कोई जनाधार बचा नहीं है, लेकिन दिल्ली के गलियारों में इनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि सचिन पायलट, दीपेंद्र हुड्डा और जीतू पटवारी जैसे ऊर्जावान चेहरों को आज भी ‘परमिशन’ और ‘प्रोटोकॉल’ के नाम पर उलझाया जाता है।कन्हैया कुमार जैसा उदाहरण हमारे सामने है – जो भाजपा को उसकी भाषा में जवाब दे सकते हैं, लेकिन पार्टी के पुराने नेता उसे अपनी जागीर के लिए खतरा मानते हैं।
जब तक कांग्रेस इन युवाओं को ‘फ्रंट सीट’ पर नहीं बिठाएगी और बुजुर्गों को मार्गदर्शक मंडल में नहीं भेजेगी, वह भाजपा की नई और तेज रफ्तार मशीनरी का मुकाबला नहीं कर पाएगी। दूसरी तरफ, भाजपा के लिए भी अब सब कुछ आसान नहीं है। मार्च 2026 के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि देश में बेरोजगारी दर 5.1% पर है और युवाओं में तो यह 15.2% तक पहुँच गई है।उत्तर भारत का युवा अब खाली नारों से थक चुका है, उसे हाथ में नौकरी चाहिए। ‘अग्निवीर’ को लेकर गुस्सा अभी भी ठंडा नहीं हुआ है और महंगाई 3.4% ने आम आदमी की कमर तोड़ रखी है। भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी उसका यही ‘अति-आत्मविश्वास’ है, जिसने उसे जमीन से थोड़ा काट दिया है।
देखा जाए तो ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा अब एक पुरानी बात लगती है क्योंकि कांग्रेस का वजूद खत्म नहीं हुआ लेकिन वापसी का रास्ता केवल यात्राओं से नहीं, बल्कि उस ‘सांगठनिक सर्जरी’ से खुलेगा जिसे करने से राहुल गांधी अब तक बचते रहे हैं। राहुल को केवल दक्षिण का ‘पावर हाउस’ बनकर खुश नहीं होना चाहिए। दिल्ली की जंग जीतने के लिए कांग्रेस को बड़े फैसले लेने होंगे, उन पुराने चेहरों को विदा करना होगा जो पार्टी के लिए बोझ बन चुके हैं, और युवाओं को भरपूर आज़ादी देनी होगी। भाजपा की आर्थिक मोर्चे पर विफलताओं को प्रभावी नैरेटिव में बदलना होगा। दिल्ली का रास्ता आज भी उत्तर भारत से ही होकर गुजरता है, और यहाँ की जंग सिर्फ नारों से नहीं, बल्कि नए चेहरों और ठोस आर्थिक समाधानों से ही जीती जा सकती है। अब गेंद राहुल गांधी के पाले में है कि वे कब और कैसे इस कठिन मगर अनिवार्य सर्जरी को अंजाम देते हैं।





