अमित त्यागी’दौझा
धरती माँ की यह पुकार है कि उसे रसायनों से नहीं, बल्कि प्रेम, संवेदना और प्राकृतिक तरीकों से सींचें। यही सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत की पहचान बनेगी।
भारत सदियों से कृषि प्रधान देश रहा है। यहाँ की मिट्टी में केवल अन्न ही नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और जीवन की धड़कन बसती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने धरती को ‘माँ’ कहा, क्योंकि वही हमें पोषित करती है, जीवन देती है और हमारी हर आवश्यकता को पूर्ण करती है। परंतु आधुनिकता की दौड़ और अधिक उत्पादन की अंधी प्रतिस्पर्धा में हमने उसी धरती माँ के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। हरित क्रांति ने जहाँ एक ओर देश को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया, वहीं दूसरी ओर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग की प्रवृत्ति को भी जन्म दिया। यूरिया, डीएपी और विभिन्न प्रकार के जहरीले कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग ने मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरक क्षमता को धीरे-धीरे नष्ट करना शुरू कर दिया। आज स्थिति यह है कि कई क्षेत्रों की भूमि अपनी उत्पादकता खोती जा रही है और बंजर होने की कगार पर पहुँच चुकी है। यह केवल मिट्टी का ही संकट नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है। रासायनिक खेती से उत्पन्न खाद्यान्न न केवल हमारी सेहत को प्रभावित कर रहा है, बल्कि पर्यावरण संतुलन को भी बिगाड़ रहा है। जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं, जैव विविधता घट रही है और किसान बढ़ती लागत के बोझ तले दबता जा रहा है।
ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में जैविक खेती एक नई आशा, एक नई दिशा और एक राष्ट्रीय आवश्यकता बनकर सामने आई है। यह केवल खेती का एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आंदोलन है—धरती माँ को पुनः स्वस्थ बनाने का, किसानों को सशक्त करने का और राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने का।
माननीय प्रधानमंत्री के आह्वान पर आज देशभर में जैविक खेती को बढ़ावा मिल रहा है। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना तभी साकार हो सकता है, जब हमारा किसान मजबूत होगा और हमारी भूमि स्वस्थ होगी। जैविक खेती इस दिशा में एक सशक्त कदम है, जिसमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर खेती की जाती है। इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि गोबर की खाद, वर्मी-कम्पोस्ट, जैविक कीटनाशक और प्राकृतिक संसाधनों का सहारा लिया जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है, जल संरक्षण होता है और पर्यावरण संतुलन सुरक्षित रहता है।
हाल ही में भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा आयोजित ‘सेवा सम्मान समारोह’में सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये सम्मानित किये गये, ऐसे प्रेरणादायक किसानों से मिलने का अवसर मिला, जिन्होंने ऑर्गेनिक, गौ आधारित प्राकृतिक खेती की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है। जिसमे केरलम ,तिरुवल्ला जिला पतनमतिट्टा के श्री ओमन कुमार पी जी जिन्होंने चावल की विभिन किस्में रासायनिक मुक्त खेती करके संरक्षित कि, साथ ही आसपास के राज्यों के किसानो को भी प्रशिक्षण देते हैं , तमिलनाडु में नामकल जिला रासीपुरम तालुका के श्री अमरनाथ जी , आपने ना केवल धान बल्कि अन्य बहु-फसलीय खेती को कीटनाशक मुक्त करके बढ़ाया , बल्कि प्राकृतिक रूप से मिटटी की उर्वरता को बढ़ाने के लिये नए प्रयोग भी करते है, आपने अपने प्रयासो से भूमि में जैविक कार्बन को 2 से 3 प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य भी तय किया हुआ हैं, साथ ही इशा फाउंडेशन के साथ सहयोग करते हुये ऑनलाइन के माध्यम से भी अपने प्रयोगों की जानकारी विभिन किसानों से साझा की है, जिससे वो भी लाभाविंत हुए है, इनके ये प्रयास जिसमें ना केवल स्वयं जैविक खेती अपनाई, बल्कि हजारों किसानों को प्रशिक्षित कर इस आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया, प्रशंसनीय है। उनके प्रयासों का परिणाम यह है कि आज उनके क्षेत्रों में कीटनाशक-मुक्त फसलें उगाई जा रही हैं, जो बाजार में अधिक मूल्य प्राप्त कर रही हैं। इससे किसानों की आय में वृद्धि हुई है, उनकी लागत कम हुई है और उनका जीवन स्तर बेहतर हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज को शुद्ध, पौष्टिक और सुरक्षित भोजन मिल रहा है।
जैविक खेती केवल आर्थिक लाभ का माध्यम नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र सेवा का एक महान कार्य है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ, सुरक्षित और समृद्ध भारत की नींव रखती है। जब किसान समृद्ध होगा, तभी राष्ट्र सशक्त होगा। आज आवश्यकता है कि हम सभी इस दिशा में जागरूक हों और जैविक खेती को एक जनआंदोलन के रूप में अपनाएँ। यह केवल सरकार या किसानों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हम सभी का कर्तव्य है कि हम अपनी धरती माँ की रक्षा करें। आइए, हम संकल्प लें कि हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलेंगे, जैविक उत्पादों को अपनाएँगे और किसानों का समर्थन करेंगे। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है, यही हमारी संस्कृति का सम्मान है और यही एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ने का मार्ग है। धरती माँ की यह पुकार है—उसे रसायनों से नहीं, बल्कि प्रेम, संवेदना और प्राकृतिक तरीकों से सींचें। यही सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत की पहचान बनेगी।





