सुनील कुमार महला
आज ग्लोबल वार्मिंग का दौर है और ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम का सामान्य बदलाव नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर आपदा का रूप ले चुकी है। कहना ग़लत नहीं होगा कि लगातार बढ़ता तापमान, हीटवेव और जल संकट लोगों के स्वास्थ्य, कामकाज और दैनिक जीवन पर गहरा असर डाल रहे हैं। खासकर उत्तर भारत इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है, जहां कई राज्यों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश का बांदा देश का सबसे गर्म शहर माना गया, जहां तापमान लगभग 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इसके अलावा महाराष्ट्र का ब्रह्मपुरी क्षेत्र भी अत्यधिक गर्मी के कारण चर्चा में रहा, जहां तापमान 47 डिग्री सेल्सियस से अधिक रिकॉर्ड किया गया। राजस्थान के श्रीगंगानगर और बाड़मेर, हरियाणा के सिरसा और रोहतक, तथा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और झांसी जैसे शहर भी भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं। लगातार बढ़ती गर्मी और हीटवेव का मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग, कम होती हरियाली और बढ़ता प्रदूषण माना जा रहा है। इससे लोगों के स्वास्थ्य, जल संकट और सामान्य जनजीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण दिन के समय सड़कों पर सन्नाटा दिखाई देने लगा है और आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है। मजदूर, किसान, रिक्शा चालक और खुले में काम करने वाले लोग सबसे अधिक परेशान हैं। तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण लोगों में डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, हीट स्ट्रोक और अन्य बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
पाठक जानते होंगे कि भारत इस समय दुनिया के सबसे गर्म देशों में शामिल हो गया है। देश की लगभग 76 प्रतिशत आबादी सामान्य से अधिक गर्मी का सामना कर रही है। हर साल बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम की समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनती जा रही है। अस्पतालों में गर्मी से प्रभावित मरीजों की संख्या बढ़ रही है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए यह स्थिति और अधिक खतरनाक बन गई है। इसी गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट बैठक में सभी मंत्रालयों को हीटवेव से लोगों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ आम नागरिकों से भी मिलकर काम करने की अपील की है, ताकि गर्मी से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
देश के अधिकांश शहर पहले से ही प्रदूषण, कम हरियाली और खराब शहरी योजना जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। महानगरों में तेजी से बढ़ते कंक्रीट के जंगल, वाहनों की अधिकता और बढ़ती आबादी के कारण गर्मी और अधिक महसूस होती है। शहरों में पेड़ों की कटाई और खुले स्थानों की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। गांवों की तुलना में शहरों में तापमान अधिक रिकॉर्ड किया जा रहा है। यही कारण है कि लोग रात के समय भी गर्मी से राहत महसूस नहीं कर पा रहे हैं। ये शहर देश की अर्थव्यवस्था के प्रमुख केंद्र हैं, इसलिए लोगों का बाहर निकलना और काम करना जरूरी होता है, जिसके कारण वे हीटवेव का सबसे ज्यादा प्रभाव झेलते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की गर्मी से होने वाली मौतों में तेजी से वृद्धि हुई है। वास्तव में, गर्मी का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव जल संकट, खेती और बिजली व्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है। कई क्षेत्रों में जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है और लोगों को पीने के पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। नदियां, तालाब और जल स्रोत सूखते जा रहे हैं। किसानों के लिए भी यह समय बेहद कठिन बनता जा रहा है, क्योंकि अत्यधिक गर्मी फसलों की उत्पादकता को प्रभावित कर रही है। दूसरी ओर बढ़ती गर्मी के कारण बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे कई क्षेत्रों में बिजली कटौती की समस्या भी सामने आ रही है।
अब आवश्यकता इस बात की है कि गर्मी को उतनी ही गंभीरता से लिया जाए, जितनी बाढ़, भूकंप या तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं को दी जाती है। हीटवेव को भी राष्ट्रीय आपदा की तरह समझने और उससे निपटने के लिए व्यापक तैयारी करने की जरूरत है। लोगों को दोपहर के समय अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बचना चाहिए, अधिक पानी पीना चाहिए और जरूरतमंद लोगों, पशु-पक्षियों तथा बुजुर्गों की सहायता करनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने भी लोगों से अपील की है कि वे गर्मी से होने वाली समस्याओं को नजरअंदाज न करें और दूसरों की मदद के लिए आगे आएं।
साइमन स्टील के अनुसार, बढ़ती गर्मी की सबसे बड़ी वजह क्लाइमेट चेंज है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में हालात और अधिक कठिन हो सकते हैं। इसलिए सरकारों और समाज को मिलकर दीर्घकालिक तैयारी करनी होगी। शहरों में अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाने, जल संरक्षण को बढ़ावा देने, स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और प्रदूषण कम करने जैसे कदम बेहद जरूरी हैं। साथ ही सस्ती और निरंतर बिजली उपलब्ध कराना भी आवश्यक है, ताकि लोग अत्यधिक गर्मी से राहत पा सकें। स्थानीय प्रशासन को भी गर्मियों के लिए उतनी ही गंभीर तैयारी करनी चाहिए, जितनी बारिश या सर्दियों के दौरान की जाती है।
अंत में, यह स्पष्ट है कि बढ़ती गर्मी अब केवल मौसमी परेशानी नहीं रही, बल्कि मानव जीवन, स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भयावह रूप ले सकता है। इसलिए सरकार, समाज और आम नागरिकों को मिलकर पर्यावरण संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन को रोकने की दिशा में गंभीर और सतत प्रयास करने होंगे। तभी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य दिया जा सकेगा।





