परीक्षण पर स्मृति: प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पर कब भरोसा किया जाए, इसका नया विज्ञान

Memory on trial: The new science of when to trust eyewitness testimony

डॉ विजय गर्ग

न्याय व्यवस्था में प्रत्यक्षदर्शी की गवाही को लंबे समय से सबसे प्रभावशाली साक्ष्यों में से एक माना जाता रहा है। जब कोई व्यक्ति अदालत में खड़े होकर यह कहता है कि “मैंने अपनी आंखों से यह घटना देखी है”, तो उसका बयान न्यायाधीशों, वकीलों और जूरी पर गहरा प्रभाव डालता है। किंतु आधुनिक विज्ञान ने यह दिखाया है कि मानव स्मृति उतनी भरोसेमंद नहीं है जितना हम अक्सर मान लेते हैं। पिछले कुछ दशकों में मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान (न्यूरोसाइंस) के क्षेत्र में हुए शोधों ने यह स्पष्ट किया है कि स्मृति एक स्थिर रिकॉर्डिंग नहीं, बल्कि लगातार पुनर्निर्मित होने वाली प्रक्रिया है। यही कारण है कि आज एक नया विज्ञान यह समझने का प्रयास कर रहा है कि प्रत्यक्षदर्शी गवाही पर कब और कितना भरोसा किया जाना चाहिए।

लंबे समय तक यह धारणा रही कि मानव मस्तिष्क किसी वीडियो कैमरे की तरह घटनाओं को रिकॉर्ड करता है और बाद में उन्हें उसी रूप में दोबारा प्रस्तुत कर देता है। लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधानों ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। वास्तव में, हमारा मस्तिष्क स्मृतियों को छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में संग्रहीत करता है और जब हम किसी घटना को याद करते हैं, तो वह उन टुकड़ों को जोड़कर स्मृति का पुनर्निर्माण करता है। इस प्रक्रिया में भूल, भ्रम और बाहरी प्रभावों के लिए पर्याप्त जगह होती है।

अपराध या दुर्घटना जैसी घटनाओं के दौरान लोग अक्सर तनाव, भय और घबराहट की स्थिति में होते हैं। ऐसी परिस्थितियां उनकी देखने, समझने और याद रखने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का ध्यान अपराधी के चेहरे की बजाय हथियार पर केंद्रित हो सकता है। इसी तरह, घटना के बाद मीडिया रिपोर्टों, अन्य लोगों की बातचीत या पुलिस द्वारा पूछे गए सवालों का भी स्मृति पर असर पड़ सकता है।

इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देने वाली वैज्ञानिकों में से एक हैं Elizabeth Loftus। उनके प्रयोगों ने दिखाया कि केवल प्रश्न पूछने के तरीके में बदलाव करके भी लोगों की यादों को प्रभावित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि लोगों के मन में ऐसी झूठी स्मृतियां पैदा की जा सकती हैं जो वास्तव में कभी घटी ही नहीं थीं। इन निष्कर्षों ने न्याय व्यवस्था को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि प्रत्यक्षदर्शी गवाही को किस हद तक विश्वसनीय माना जाए।

गलत प्रत्यक्षदर्शी पहचान के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। दुनिया भर में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जिनमें डीएनए परीक्षणों ने वर्षों बाद यह साबित किया कि दोषी ठहराए गए लोग निर्दोष थे। इन मामलों में से कई में मुख्य आधार प्रत्यक्षदर्शी की गवाही थी। विशेष बात यह थी कि गवाह अपने बयान को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे, फिर भी उनकी पहचान गलत निकली।

नया विज्ञान यह भी बताता है कि आत्मविश्वास और सटीकता हमेशा एक-दूसरे के पर्याय नहीं होते। किसी गवाह का अपने बयान पर पूरा विश्वास होना यह सुनिश्चित नहीं करता कि उसकी स्मृति पूरी तरह सही है। कई बार बार-बार पूछताछ, दूसरों की प्रतिक्रिया या जांच अधिकारियों की अनजानी टिप्पणियां गवाह के आत्मविश्वास को बढ़ा देती हैं, जबकि स्मृति की सटीकता में कोई सुधार नहीं होता।

तंत्रिका विज्ञान के नवीनतम अध्ययनों से पता चला है कि हर बार जब कोई व्यक्ति किसी घटना को याद करता है, तो वह स्मृति थोड़ी-बहुत बदल जाती है। इस प्रक्रिया को “रीकंसॉलिडेशन” कहा जाता है। इसका अर्थ है कि स्मृतियां स्थिर नहीं होतीं; वे समय के साथ परिवर्तित हो सकती हैं। इसलिए वर्षों पुरानी यादें वास्तविक घटनाओं से काफी अलग हो सकती हैं।

इन वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर कई देशों में पुलिस और न्यायिक प्रक्रियाओं में सुधार किए गए हैं। उदाहरण के लिए, “डबल-ब्लाइंड लाइनअप” तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिसमें पहचान परेड कराने वाले अधिकारी को भी यह नहीं पता होता कि संदिग्ध कौन है। इससे गवाह पर किसी प्रकार का अनजाना प्रभाव पड़ने की संभावना कम हो जाती है। इसके अलावा, गवाहों को यह भी बताया जाता है कि अपराधी लाइनअप में मौजूद हो भी सकता है और नहीं भी।

इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्यक्षदर्शी गवाही का कोई महत्व नहीं है। कई मामलों में यह जांच की दिशा तय करने और महत्वपूर्ण सुराग प्रदान करने में बेहद उपयोगी साबित होती है। लेकिन आधुनिक विज्ञान यह सुझाव देता है कि ऐसी गवाही को अन्य साक्ष्यों—जैसे फोरेंसिक जांच, डीएनए विश्लेषण, डिजिटल रिकॉर्ड और भौतिक प्रमाणों—के साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए।

मानव स्मृति एक अद्भुत क्षमता है, जो हमें अपने अनुभवों को संजोने और उनसे सीखने में मदद करती है। लेकिन यह पूर्णतः त्रुटिहीन नहीं है। स्मृति पर आधारित निर्णय लेते समय उसके सीमित और परिवर्तनीय स्वभाव को समझना आवश्यक है। यही समझ न्याय व्यवस्था को अधिक निष्पक्ष और वैज्ञानिक बना सकती है।

भविष्य की अदालतों में प्रश्न केवल यह नहीं होगा कि किसी गवाह को क्या याद है, बल्कि यह भी होगा कि वह स्मृति कैसे बनी, किन परिस्थितियों में संरक्षित हुई और समय के साथ उसमें क्या परिवर्तन आए। स्मृति का यह नया विज्ञान न्याय और सत्य की खोज में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक बनकर उभर रहा है, जो यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि फैसले केवल विश्वास पर नहीं, बल्कि प्रमाण और वैज्ञानिक समझ पर आधारित हों।