एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं
वैश्विक स्तरपर मई के अंतिम सप्ताह 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति और वित्तीय बाजारों के लिए अत्यंत संवेदनशील और उतार-चढ़ाव भरा रहा। इस अवधि में पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव,वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता केंद्रीय बैंकों की नीतियों को लेकर अनिश्चितता, मुद्रास्फीति के बढ़ते संकेत, विदेशी निवेशकों की बिकवाली तथा मानसून संबंधी आशंकाओं ने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों को गहराई से प्रभावित किया। यह सप्ताह इस बात का उदाहरण बन गया कि आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी परस्पर जुड़ी हुई है और कैसे किसी एक क्षेत्र की राजनीतिक घटना विश्वभर के शेयर बाजारों, मुद्राओं, बॉन्ड बाजारों और आम नागरिकों के जीवन को प्रभावित कर सकती है। जबकि 1 जून 2026 से सरकारी तेल कंपनियों ने 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 42 रुपये की बढ़ोतरी की है। इसके साथ ही 5 किलो वाले सिलेंडर के दाम में भी 11 रुपये का इजाफा किया गया है। घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।यह बढ़ोतरी सीधे तौर पर होटल, रेस्तरां और छोटे कारोबारियों को प्रभावित करेगी।शेयर मार्केट में भी 1 जून को गिरावट हुई सेंसेक्स 508 अंक टूटकर 74,267 पर बंद हुआ,जबकि निफ्टी 165 अंक गिरकर 23,383 पर आ गया,सबसे बड़ी चिंता की बात यह रही कि सेंसेक्स के 30 में से 25 शेयर लाल निशान में बंद हुए. यानी गिरावट कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे बाजार में फैली हुई थी. जब राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व शेयर मार्केटिंग का पूरे सप्ताह का विश्लेषण किया तो सप्ताह की शुरुआत 25 मई को अपेक्षाकृत सकारात्मक माहौल में हुई थीं ।अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते तथा युद्धविराम की खबरों ने निवेशकों को राहत दी।इससे वैश्विक बाजारों में “रिस्क-ऑन” भावना विकसित हुई। जापान का निक्केई सूचकांक ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया, दक्षिण कोरिया और हांगकांग के बाजारों में भी तेजी देखी गई। निवेशकों को लगा कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल आपूर्ति सामान्य हो जाती है तो वैश्विक ऊर्जा संकट कम होगा और मुद्रास्फीति पर दबाव घटेगा। परिणामस्वरूप एशियाई और यूरोपीय बाजारों में शुरुआती तेजी देखने को मिली।लेकिन यह आशावाद अधिक समय तक नहीं टिक सका। 26 मई को अमेरिका द्वारा ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों और नए हमलों की खबरों ने बाजारों में पुनः अनिश्चितता पैदा कर दी। निवेशकों को यह समझ आने लगा कि पश्चिम एशिया संकट अभी समाप्त नहीं हुआ है। तेल की कीमतों में फिर से उतार- चढ़ाव शुरू हुआ और सुरक्षित निवेश माने जाने वाले डॉलर तथा सरकारी बॉन्ड की मांग बढ़ने लगी। इस प्रकार वैश्विक बाजारों में एक दिन पहले का उत्साह अचानक सतर्कता में बदल गया।
साथियों, इस पूरे सप्ताह वैश्विक बाजारों पर सबसे बड़ा प्रभाव तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया की स्थिति का रहा। वर्ष 2026 के दौरान चले अमेरिका- ईरान संघर्ष ने पहले ही वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर दिया था। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। जब इसके बंद होने या बाधित होने की आशंका उत्पन्न होती है, तब पूरी दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं। हालांकि 29 मई तक युद्धविराम समझौते की संभावना बढ़ने लगी और तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड अप्रैल के अंत की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत तक नीचे आ गया। इससे निवेशकों को यह संदेश मिला कि भविष्य में ऊर्जा लागत कम हो सकती है और वैश्विक मुद्रास्फीति पर दबाव घट सकता है।
साथियों, दूसरी ओर यूरोप की स्थिति अपेक्षाकृत जटिल रही। यूरोपीय अर्थव्यवस्था एक साथ दो समस्याओं का सामना कर रही है धीमी आर्थिक वृद्धि और बढ़ती मुद्रास्फीति। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे “स्टैगफ्लेशन” कहा जाता है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती यह है कि वह मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाए या कमजोर अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए नरम नीति अपनाए। मई के अंतिम सप्ताह में आए आर्थिक संकेतकों ने इस दुविधा को और गहरा किया।
साथियों, भारत के लिए यह सप्ताह विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा क्योंकि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार के दबाव एक साथ दिखाई दिए। शुरुआत में निवेशकों को उम्मीद थी कि यदि पश्चिम एशिया संकट कम होता है तो भारत को कम तेल कीमतों का लाभ मिलेगा। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में गिरावट सीधे चालू खाता घाटे, मुद्रास्फीति और राजकोषीय संतुलन को प्रभावित करती है।लेकिन सप्ताह के अंत तक भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली। 29 मई को सेंसेक्स लगभग 1092 अंक गिर गया और निफ्टी 359 अंक टूटकर 23550 के नीचे पहुंच गया। यह गिरावट केवल तकनीकी कारणों से नहीं थी बल्कि इसके पीछे कई आर्थिक और राजनीतिक कारण एक साथ काम कर रहे थे।
साथियों, सबसे पहला कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली थी। जब वैश्विक निवेशकों को किसी देश या क्षेत्र में जोखिम बढ़ता हुआ दिखाई देता है, तो वे अपने निवेश को सुरक्षित परिसंपत्तियों में स्थानांतरित करने लगते हैं। भारत में विदेशी निवेशकों की बिक्री ने बैंकिंग, वित्तीय और धातु क्षेत्रों पर विशेष दबाव डाला।
साथियों, दूसरा कारण कमजोर मानसून की आशंका थी। भारत की कृषि अभी भी मानसून पर काफी हद तक निर्भर है। यदि वर्षा सामान्य से कम होती है तो खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है,जिससे खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने की संभावना रहती है। निवेशकों ने इसे एक संभावित आर्थिक जोखिम के रूप में देखा। परिणामस्वरूप कृषि आधारित उद्योगों, उपभोक्ता कंपनियों और ग्रामीण मांग पर निर्भर क्षेत्रों में चिंता बढ़ी। तीसरा कारण वैश्विक अनिश्चितता थी। यद्यपि अमेरिका- ईरान समझौते की खबरें आ रही थीं, लेकिन निवेशकों को विश्वास नहीं था कि संकट पूरी तरह समाप्त हो गया है। किसी भी समय नई सैन्य कार्रवाई या राजनीतिक विवाद तेल बाजारों को पुनः अस्थिर बना सकते थे। इसलिए भारतीय बाजारों में निवेशकों ने लाभ बुक करना सटीक रूप से उचित समझा।
साथियों, इस सप्ताह भारतीय बाजारों में यह भी स्पष्ट हुआ कि घरेलू अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत होने के बावजूद वैश्विक पूंजी प्रवाह का प्रभावअत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारत की विकास दर, उपभोग मांग और कॉर्पोरेट आय मजबूत बनी हुई हैं, लेकिन विदेशी पूंजी की निकासी अल्पकालिक रूप से बाजारों को नीचे खींच सकती है।
साथियों, भारतीय अर्थव्यवस्था के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो वित्त मंत्रालय की मासिक आर्थिक समीक्षा ने स्पष्ट किया कि देश की बुनियादी आर्थिक स्थिति अभी भी मजबूत है। फिर भी कच्चे तेल की कीमतें, मुद्रास्फीति और मानसून सबसे बड़े जोखिम बने हुए हैं। यदि तेल महंगा होता है तो परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण लागत बढ़ेगी। इसका सीधा प्रभाव उपभोक्ता कीमतों पर पड़ेगा। दूसरी ओर यदि मानसून कमजोर रहता है तो खाद्य कीमतों में वृद्धि हो सकती है। इन दोनों कारकों का संयुक्त प्रभाव सटीक रूप से भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर पड़ सकता है।
साथियों, वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों की भूमिका भी बाजारों की दिशा निर्धारित करने वाली रही। निवेशकों की नजर अमेरिका के पीसीई मुद्रास्फीति आंकड़ों, जीडीपी डेटा और रोजगार संकेतकों पर थी। यदि अमेरिकी मुद्रास्फीति ऊंची बनी रहती है तो फेडरल रिजर्व ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रख सकता है। इसका असर विश्वभर के पूंजी बाजारों पर पड़ता है क्योंकि उच्च अमेरिकी ब्याज दरें निवेशकों को उभरते बाजारों से धन निकालकर अमेरिका में निवेश करने के लिए प्रेरित करती हैं।इस अवधि में मुद्रा बाजार भी अत्यधिक संवेदनशील रहे। डॉलर की मजबूती और कमजोरी के बीच लगातार उतार-चढ़ाव दिखाई दिया। जब युद्ध का खतरा बढ़ा तो डॉलर मजबूत हुआ क्योंकि निवेशकों ने उसे सुरक्षित निवेश माना। जब शांति वार्ता की खबरें आईं तो डॉलर पर दबाव आया और जोखिम वालीपरिसंपत्तियों में निवेश बढ़ा। इस प्रकार विदेशी मुद्रा बाजारों ने भू-राजनीतिक घटनाओं की तीव्र प्रतिक्रिया दिखाई।
साथियों, विशेषज्ञों का मानना है कि मई 2026 का अंतिम सप्ताह केवल शेयर बाजार की कहानी नहीं था बल्कि यह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की जटिलताओं का दर्पण था। एक ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी नवाचारों ने निवेशकों को उत्साहित किया, दूसरी ओर युद्ध, ऊर्जा संकट, मुद्रास्फीति और जलवायु संबंधी जोखिमों ने अनिश्चितता को बढ़ाया।विश्व के प्रमुख बैंकरों और निवेशकों ने भी चेतावनी दी कि वर्तमान समय में सबसे बड़ा खतरा केवल आर्थिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक है। अमेरिका- ईरान संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक व्यापारिक तनाव और बढ़ते रक्षा व्यय आने वाले वर्षों में आर्थिक विकास की दिशा तय करेंगे।
साथियों,अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दिया। जापान, दक्षिण कोरिया, हांगकांग और यूरोप के प्रमुख सूचकांकों में तेजी आई। अमेरिकी बाजारों में भी निवेशकों ने राहत की सांस ली क्योंकि ऊर्जा कीमतों में गिरावट का अर्थ है कि फेडरल रिजर्व पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव कम हो सकता है। परिणामस्वरूप तकनीकी और विकास आधारित कंपनियों के शेयरों में खरीदारी बढ़ी।अमेरिकी शेयर बाजारों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियां निवेशकों का मुख्य आकर्षण बनी रहीं। डेल टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियों के शेयरों में भारी उछाल आया। निवेशकों का विश्वास था कि एआई आधारित निवेश भविष्य की आय वृद्धि का प्रमुख स्रोत बनेगा। इससे नैस्डैक और एस एंड पी 500 नए रिकॉर्ड स्तरों की ओर बढ़ते दिखाई दिए। हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी भी दी कि यदि वैश्विक तनाव बढ़ता है या मुद्रास्फीति फिर से ऊपर जाती है तो यह तेजी अस्थिर साबित हो सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि मई 2026 का अंतिम सप्ताह यह दर्शाता है कि आधुनिक विश्व अर्थव्यवस्था में राजनीति, युद्ध, ऊर्जा, जलवायु, तकनीक और वित्तीय बाजार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। पश्चिम एशिया में तनाव और संभावित शांति वार्ताओं ने तेल की कीमतों को प्रभावित किया; तेल ने मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को प्रभावित किया; मुद्रास्फीति ने केंद्रीय बैंकों की नीतियों को प्रभावित किया; और इन नीतियों ने शेयर बाजारों तथा पूंजी प्रवाह की दिशा तय की। भारत में विदेशी निवेशकों की बिकवाली, मानसून की आशंका और वैश्विक अनिश्चितताओं ने बाजारों पर दबाव डाला, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एआई आधारित कंपनियों और शांति की उम्मीदों ने निवेशकों को आशावादी बनाए रखा। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक मुद्रास्फीति, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीति तथा भारत का मानसून किस दिशा में जाते हैं, क्योंकि यही कारक विश्व और भारतीय अर्थव्यवस्था की अगली चाल तय करेंगे।





