क्लिक से पहले सोचें : सोशल मीडिया सुरक्षा के मूल मंत्र

Think before you click: The basics of social media safety

सुनील कुमार महला

आज का युग सोशल नेटवर्किंग साइट्स, इंटरनेट,एआइ का युग है और कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। हालांकि, इसके अनेक लाभ हैं, लेकिन इसके बढ़ते दुष्प्रभावों को लेकर दुनिया भर में चिंता भी बढ़ रही है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नई मार्गदर्शिका जारी की है।इस क्रम में बहरहाल,यहां पर पाठकों को बताता चलूं कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने हाल ही में ‘बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सही रखना'( गेटिंग चिल्ड्रेन्स सेफ्टी आनलाइन राइट) नामक एक मार्गदर्शिका (गाइडलाइंस) जारी की है। इसका उद्देश्य सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को बच्चों तथा किशोरों के लिए अधिक सुरक्षित बनाना है। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर यह मार्गदर्शिका क्यों जारी की गई है? तो इस प्रश्न का सीधा सा और सटीक उत्तर यह है कि आज बच्चे और किशोर इंटरनेट पर कई प्रकार के खतरों(जैसा कि संयुक्त राष्ट्र ने कहा है) का सामना कर रहे हैं, जैसे कि साइबर बुलिंग, ऑनलाइन यौन शोषण और उत्पीड़न,गोपनीयता (प्राइवेसी) का उल्लंघन, हिंसक, अश्लील या आत्महत्या को बढ़ावा देने वाली सामग्री, सोशल मीडिया की लत बढ़ाने वाले फीचर (इनफाइनाइट स्क्राल, आटो-प्ले, लगातार नोटिफिकेशन आदि) भ्रामक जानकारी और हेट स्पीच आदि। हाल फिलहाल, यदि हम यहां पर पर इस मार्गदर्शिका की प्रमुख बातों की बात करें तो इसमें ‘सेफ बाइ डिजाइन’ सिद्धांत को अपनाने की बात कही गई है। अर्थात ऐसे प्लेटफॉर्म्स की डिजाइन ही ऐसी हो कि बच्चों की सुरक्षा पहले से सुनिश्चित हो। वास्तव में, केवल बच्चों को सोशल मीडिया से प्रतिबंधित करना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए प्लेटफॉर्म कंपनियों को अपने एल्गोरिद्म और फीचर्स सुरक्षित बनाने होंगे। इतना ही नहीं, बच्चों का डेटा संग्रह और उसका व्यावसायिक उपयोग सीमित करने की आवश्यकता है तथा इसमें यह भी कहा गया है कि उनकी निजता की भी रक्षा की जानी चाहिए।सरल शब्दों में कहें तो आयोग का यह मानना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि बच्चों की सुरक्षा, निजता और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिले।हानिकारक सामग्री, ऑनलाइन शोषण और साइबर बुलिंग को रोकने के लिए मजबूत निगरानी और शिकायत तंत्र विकसित किए जाने की आवश्यकता है। यह भी कहा गया है कि सरकारों को ऐसे कानून और नियम बनाने चाहिए जो बच्चों के डिजिटल अधिकारों और सुरक्षा दोनों को सुनिश्चित करें। संयुक्त राष्ट्र का यह कहना है कि बच्चों को इंटरनेट से दूर करना ही समस्या का समाधान नहीं है। उन्हें शिक्षा, संवाद और जानकारी के लिए डिजिटल दुनिया तक पहुंच भी चाहिए। इसलिए आवश्यक है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए सुरक्षित, जिम्मेदार और अधिकार-आधारित डिजिटल वातावरण तैयार करें। कहना ग़लत नहीं होगा कि वास्तव में यह मार्गदर्शिका सरकारों, टेक कंपनियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के लिए एक दिशा-निर्देश है, ताकि किशोरों को ऑनलाइन दुनिया के खतरों से बचाते हुए उन्हें सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराया जा सके।

यहां पर यह गौरतलब है कि विश्व में कई देशों ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या उसे नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाए हैं।पाठक जानते होंगे कि ऑस्ट्रेलिया ने इस संबंध में कानून भी बना दिया है, जबकि फ्रांस, स्पेन, यूनान, डेनमार्क, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश भी ऐसे उपायों पर काम कर रहे हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध लगाने से बच्चे अधिक जोखिम वाले और अनियंत्रित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की ओर जा सकते हैं, जिससे खतरे और बढ़ सकते हैं। हाल फिलहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि पिछले कुछ सालों में भारत में भी इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सच तो यह है कि देश में स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट की उपलब्धता ने बच्चों को कम उम्र में ही डिजिटल दुनिया से जोड़ दिया है। हाल के एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट(एएसईआर)-2024 सर्वेक्षण के अनुसार 14-16 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 82% बच्चे स्मार्टफोन चलाना जानते हैं, जबकि 76% बच्चे सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। लगभग 90% बच्चों के घरों में स्मार्टफोन उपलब्ध है। भारत में 2024 की शुरुआत तक 75 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता और 46 करोड़ से अधिक सोशल मीडिया उपयोगकर्ता थे, जिससे बच्चों की ऑनलाइन भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है। बढ़ती डिजिटल पहुंच ने बच्चों को शिक्षा, जानकारी और संवाद के नए अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण, गोपनीयता के खतरे, फर्जी जानकारी और डिजिटल लत जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं। इसी कारण बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, डिजिटल साक्षरता और जिम्मेदार सोशल मीडिया उपयोग आज एक महत्वपूर्ण सामाजिक और नीतिगत विषय बन गया है।पाठक जानते हैं कि कोरोना महामारी के बाद ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल गतिविधियों के विस्तार से बच्चों की इंटरनेट पर निर्भरता काफी बढ़ गई है। कई रिपोर्टों के अनुसार लंबे समय तक सोशल मीडिया का उपयोग बच्चों की एकाग्रता, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण, भ्रामक जानकारी और अनुचित सामग्री तक पहुंच जैसी समस्याएं भी गंभीर चिंता का विषय हैं।ऐसी स्थिति में केवल प्रतिबंध लगाना पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों को सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराया जाए। अभिभावकों की निगरानी, डिजिटल साक्षरता, सोशल मीडिया उपयोग की समय-सीमा, ऑटोप्ले और अनंत स्क्रॉलिंग जैसी सुविधाओं पर नियंत्रण तथा बच्चों के लिए सुरक्षित ऑनलाइन प्लेटफॉर्म विकसित करना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। भारत की परंपरा संतुलन और समग्र दृष्टिकोण की रही है, इसलिए यहां भी ऐसा समाधान खोजने की जरूरत है जो बच्चों को इंटरनेट के लाभों से वंचित किए बिना उन्हें सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रख सके।