पर्यावरण का रखें हर पल ध्यान

Take care of the environment at all times

बृजमोहन अग्रवाल,रायपुर सांसद और पूर्व कैबिनेट मंत्री छत्तीसगढ़ भाजपा सरकार

पर्यावरण मतलब हमारे आस-पास का वातावरण यानी मिट्टी, हवा और पानी। स्वच्छ पर्यावरण हम सभी की उम्र में बढ़ोत्तरी करता है, लिहाज़ा हमें पर्यावरण की रक्षा के लिए सदैव संवेदनशील रहते हुए पर्यावरण के प्रति हमेशा एक जिम्मेदार नागरिक बने रहना चाहिए।जब हम सुबह सोकर उठें तो सबसे पहले धरती माता को प्रणाम करें क्योंकि धरती हमारे पर्यावरण का सबसे प्रमुख आधार है। बिना कुछ लिए और बिना कुछ कहे वो हमारा बोझ सहते रहती है। इसके बाद जल को प्रणाम करें। अगर सुबह हम सभी को वरूण देवता न मिलें तो फिर आगे की हमारी समस्त दिनचर्या, सभी धर्म, कर्म धरे के धरे रह जाएंगे।

इसलिए ही जल को भी महत्वपूर्ण मानते हुए हम सभी को अधिक से अधिक पानी बचाना चाहिए। इसके बाद अधिक से अधिक पेड़ लगाना चाहिए ताकि हम धरती के लोगों को हमेशा स्वच्छ हवा मिलती रहे। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में
बिजली बचाने में भी हमें सबसे आगे रहना चाहिए। साथ ही प्लास्टिक का उपयोग बंद करके हम पर्यावरण को हर पल एक नई संजीवनी दे सकते हैं। धरती को हमेशा हरी भरी बनाने के लिए और उसके आवरण, पर्यावरण को स्वच्छ रखते हुए उसे बचाने के लिए हमारे को हमेशा नील नील आसमान चाहिए। इसके लिए हवा को शुद्ध करते हुए पानी को भी बचाते हुए अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए और बच्चों में भी यह जागरूकता पैदा करना चाहिए। बच्चों के जन्मदिवस पर पौधरोपण करने के साथ उसके पेड़ बनने के तक उसका संरक्षण करने के लिए बच्चों को ही उसके पालक बनने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

प्रख्यात तत्व चिंतक हिप्पोक्रेट्स ने कहा था कि “प्रकृति स्वयं ही सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक है” अपने जीवन में कभी न कभी हममें से कई लोग प्रकृति की गोद में घूमने गए हैं और तरोताजा और तनावमुक्त होकर लौटे हैं। प्रकृति यानी आस पास के पर्यावरण के प्राकृतिक चक्र में हम अपने स्वार्थ के लिए किसी तरह की कोई गड़बड़ी करते हैं तो प्रकृति हमको इसका विपरीत ज़वाब दे देती है, जो हमारे जीवन के लिए काफ़ी नुकसानदायक होता है।

इसलिए भी प्रकृति को सर्वोत्तम चिकित्सक कहते हैं क्योंकि वह अपनी सामान्य प्रक्रिया को संतुलित रखने के लिए हमेशा अपने ढंग से अपनी व्यवस्था उचित तरीके से कर लेती है। प्राकृतिक आपदा प्रकृति के संतुलन की ही एक प्रक्रिया है। लिहाज़ा प्रकृति के साथ हमेशा संतुलन बनाकर हमें आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। तभी हम प्राकृतिक आपदा से भी बच सकेंगे।

पर्यावरण की रक्षा करना न केवल हमारा नैतिक दायित्व है, बल्कि हमारे भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए भी यह अति आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, बढ़ते तापमान, पिघलते ग्लेशियर, चरम मौसमी घटनाओं और घटती जैव विविधता के रूप में हम पहले से ही देख रहे हैं कि अगर पर्यावरण के संरक्षण में तत्काल कोई कार्रवाई और प्रयास नहीं किए गए तो जलवायु परिवर्तन के ये कुप्रभाव और भी बदतर हो जाएंगे और मानव समाज और प्राकृतिक जगत दोनों के लिए दूरगामी हानिकारक परिणाम होंगे। पर्यावरण संरक्षण के सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है यथासंभव चीज़ों का कम से कम उपयोग करना, और पुन: उसका उपयोग करना या पुनर्चक्रण करना। पुनर्चक्रण या खाद बनाकर आप पर्यावरण पर अपने प्रभाव को कम कर सकते हैं। अपनी कार चलाने के बजाय सार्वजनिक परिवहन का अधिक से अधिक उपयोग करना कार्बन उत्सर्जन को कम करने का एक शानदार तरीका है। यदि आप सार्वजनिक परिवहन का उपयोग नहीं कर सकते हैं, तो दोस्तों या सहकर्मियों के साथ कारपूलिंग करने पर विचार करें। स्थानीय स्तर पर उत्पादित सामान और उत्पाद खरीदने से आपके कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में मदद मिल सकती है। स्थानीय भोजन को आप तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती, जिसका अर्थ है कम से कम कार्बन उत्सर्जन। कमरे से बाहर निकलते समय लाइट बंद करना चाहिए। ऊर्जा बचाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने का य़ह भी एक आसान तरीका है। साथ ही, उन सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को भी बंद करना सुनिश्चित करें जिनका आप उपयोग नहीं कर रहे हैं।अधिक से अधिक पेड़ लगाना पर्यावरण की मदद करने का एक बेहतरीन तरीका है। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं, जिससे हवा को साफ करने और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद मिलती है। हम पर्यावरण के संरक्षण और पुनर्जनन के लिए प्रतिबद्ध हों, क्योंकि हम जानते हैं कि पर्यावरण की रक्षा करना ही भावी पीढ़ियों के लिए हमारी सर्वोत्तम विरासत हो सकती है। एकीकृत और जैविक उत्पादन भी हमारे लिए इस दिशा में सहयोगी हो सकता है। धारी देवी और उत्तराखंड की आपदा (विशेषकर 2013 की केदारनाथ त्रासदी) के बीच एक गहरा धार्मिक और जन-विश्वास जुड़ा हुआ है। माँ धारी देवी को उत्तराखंड के चार धामों (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री) की रक्षक और क्षेत्रपाल माना जाता है। यह मंदिर पौड़ी गढ़वाल जिले में श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। वर्ष 2013 में श्रीनगर जल विद्युत परियोजना (330 मेगावाट) का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसके कारण धारी देवी का प्राचीन मंदिर जलमग्न हो रहा था।16 जून 2013 की शाम को प्रशासन ने मंदिर की मूल मूर्ति को वहां से हटाकर एक ऊंचे प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया। स्थानीय मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार, मूर्ति को अपने मूल स्थान से हटाने के कुछ ही घंटों बाद केदारनाथ और संपूर्ण उत्तराखंड में भयानक बादल फटने और बाढ़ की त्रासदी (हिमालयी सुनामी) आई। इस आपदा में हजारों लोगों की जान चली गई थी। उत्तराखंड के निवासियों और श्रद्धालुओं का एक बड़ा वर्ग इस विनाशकारी आपदा को ‘माता धारी देवी के क्रोध’ के रूप में देखता है। उनका मानना है कि देवी को उनके मूल स्थान से हटाना इस प्राकृतिक प्रकोप का मुख्य कारण था। ऐसे धार्मिक और समर्पित भावों के इतर अगर हम अपनी विवेक दृष्टि से धीर गंभीर विवेचन करें तो हमें एहसास हो जाएगा कि अगर हम प्रकृति से बिना वैज्ञानिक तथ्य प्रमाण, विश्लेषण,संश्लेषण के छेड़छाड़ करेंगे तो हमें ही प्रकृति की त्रासदी को प्राकृतिक आपदा के रूप में झेलना होगा। हमारी पृथ्वी का लगभग 71% हिस्सा पानी से ढका है, लेकिन इसमें से केवल 1% जल ही पीने और उपयोग करने योग्य है (बाकी 97% महासागरों में है और 2% ग्लेशियरों के रूप में जमा है। केवल टॉयलेट पेपर बनाने के लिए प्रतिदिन लगभग 27,000 पेड़ काट दिए जाते हैं। वायु प्रदूषण हमारे समय के सबसे बड़े खतरों में से एक है, जिसकी वजह से दुनिया भर में हर साल लगभग 70 लाख लोगों की असमय मृत्यु हो जाती है।

महासागरों में इतना प्लास्टिक जमा हो गया है कि प्रशांत महासागर में स्थित ‘ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच’ (Great Pacific Garbage Patch) फ्रांस से लगभग तीन गुना बड़ा हो चुका है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे समुद्र का जल-स्तर लगातार बढ़ रहा है और तटीय क्षेत्रों में रहने वाली लगभग आधी आबादी प्रभावित हो रही है। मिट्टी के सूक्ष्मजीवों से लेकर विशाल वनों तक पारिस्थितिकी तंत्र का स्वास्थ्य जैव विविधता पर ही टिका है। हमारे आसपास का वातावरण कई अद्भुत विशेषताओं और तथ्यों से भरा है जिनके बारे में शायद आप ज्यादा नहीं जानते होंगे। पृथ्वी की सुंदरता को समझने का एक बेहतरीन तरीका यह है कि हम प्रकृति के साथ अपने अंतर्संबंधों के बारे में अधिक से अधिक जानने की कोशिश करें जैसे विश्व में 3.04 ट्रिलियन से अधिक पेड़ हैं। हालांकि, टॉयलेट पेपर बनाने के लिए प्रतिदिन 27,000 पेड़ काटे जाते हैं। इसका मतलब है कि सालाना लगभग 9.8 मिलियन पेड़ काटे जाते हैं। समुद्री स्तनधारियों में से 78% को प्लास्टिक से दम घुटने का खतरा है। प्लास्टिक की थैलियाँ और अन्य प्लास्टिक कचरा जो समुद्र में पहुँच जाते हैं, हर साल 1,000,000 से अधिक समुद्री जीवों की जान ले लेते हैं। ऐसे में हमें अपने जीवन के साथ-साथ अन्य सूक्ष्म जीवों का भी ध्यान रखते हुए हर पल हमेशा पर्यावरण के प्रति एक सम्वेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनने का प्रयास करना चाहिए।