‘डिजिटल आक्रामकता के जाल में फंसा बचपन’

'Childhood trapped in the web of digital aggression'

दिलीप कुमार पाठक

आजकल घरों में शाम के वक्त एक खामोश नजारा दिखाई देता है। पूरा परिवार एक ही कमरे में, एक ही सोफे पर साथ बैठा होता है, लेकिन आपस में कोई बातचीत नहीं होती। सब के सब चुपचाप अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन में खोए रहते हैं। माता-पिता भी इस बात से बड़े खुश और बेफिक्र रहते हैं कि उनका बच्चा बाहर धूप या धूल-मिट्टी में नहीं घूम रहा है, बल्कि घर के अंदर आराम से सुरक्षित बैठा है। लेकिन क्या कभी हमने ठंडे दिमाग से बैठकर यह सोचने की कोशिश की है कि स्क्रीन में अपनी आंखें गड़ाए बैठा हमारा यह मासूम बच्चा अंदर ही अंदर किस मानसिक दौर से गुजर रहा है? कहीं उसके नन्हें दिमाग पर नकारात्मक असर तो नहीं हो रहा?

हर साल 4 जून को पूरी दुनिया में ‘आक्रामकता के शिकार मासूम बच्चों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ मनाया जाता है। पुराने जमाने में जब इस दिन की चर्चा होती थी, तो बच्चों पर अत्याचार का सीधा सा मतलब लड़ाई-झगड़े, युद्ध, दंगे या फिर फैक्ट्रियों में होने वाली बाल-मजूदरी से लगाया जाता था। लेकिन आज के इस आधुनिक और डिजिटल युग में मासूमों के खिलाफ होने वाली हिंसा का पूरा चेहरा ही बदल चुका है। अब यह आक्रामकता सड़क पर शोर नहीं मचाती। अब यह हिंसा बिना किसी आवाज के, इंटरनेट के महीन रास्तों से रेंगती हुई सीधे हमारे घरों के भीतर और हमारे बच्चों के दिमाग पर सीधा हमला कर रही है। ज़रा रुककर गंभीरता से सोचिए। आपका बच्चा आपके ठीक सामने बैठा हो सकता है, लेकिन मुमकिन है कि ठीक उसी वक्त उसका कोमल मन किसी बहुत गहरे तनाव या डर में डूब रहा हो। ऑनलाइन गेम खेलते समय किसी अनजान शख्स द्वारा दी गई गंदी गालियां, सोशल मीडिया पर दोस्तों द्वारा उड़ाया गया उसका कोई भद्दा मजाक, या फिर इंटरनेट के समंदर में छिपे किसी अपराधी की गंदी नजर। यह डिजिटल आक्रामकता ऐसी होती है जो बाहर से शरीर पर दिखाई नहीं देती, इसलिए इसके ज़ख्म और भी ज्यादा गहरे होते हैं। यह अदृश्य हमला बच्चे के आत्मविश्वास को भीतर ही भीतर खोखला कर देता है। सबसे ज्यादा डरावना तो यह है कि इंटरनेट के इस गंदे खेल में कोई तीसरा देखने वाला गवाह नहीं होता, सिवाय उस एक सहमे हुए और अकेले पड़ चुके बच्चे के।

वैश्विक संस्था यूनिसेफ की एक हालिया रिपोर्ट साफ कहती है कि दुनिया में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला हर तीसरा इंसान असल में एक बच्चा है। और इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से एक बहुत बड़ी आबादी ऑनलाइन किसी न किसी रूप में मानसिक या भावनात्मक प्रताड़ना का शिकार होती है। हम अपनी व्यस्त जिंदगी में बच्चों को रोने से रोकने या उन्हें शांत बैठाने के लिए खिलौने की जगह मोबाइल थमा देते हैं। यह ‘डिजिटल झुनझुना’ शुरू-शुरू में तो हमें बड़ी राहत देता है, लेकिन धीरे-धीरे यही मोबाइल बच्चे और माता-पिता के बीच बातचीत का रास्ता हमेशा के लिए बंद कर देता है। जब बच्चा इंटरनेट की किसी बड़ी मुसीबत या ब्लैकमेलिंग में फंसता है, तो वह लोक-लाज और डर के मारे अपने मम्मी-पापा को कुछ नहीं बता पाता। वह अंदर ही अंदर घुटता रहता है, उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और वह खुद को एक अंधेरे कमरे में बंद कर लेता है। अब वह समय आ गया है जब हमें इस बढ़ते हुए खतरे को गहराई से समझना होगा। यह कोई ऐसी सामाजिक समस्या नहीं है जो केवल पुलिस की मुस्तैदी या सरकार के कड़े कानून बना देने भर से ठीक हो जाएगी। इस बीमारी के इलाज की शुरुआत हमारे अपने घर के भीतर से ही होगी। बच्चों को महंगे स्मार्टफोन या गैजेट्स लाकर देने से कहीं ज्यादा जरूरी है उन्हें अपना कीमती वक्त देना। अपने बच्चों के बदलते हुए बर्ताव पर हमेशा नजर रखिए। अगर आपका हंसता-खेलता बच्चा अचानक गुमसुम रहने लगा है, बात-बात पर गुस्सा कर रहा है या आपसे अपना फोन छिपाने लगा है, तो उसे डांटने या मारने की गलती बिल्कुल मत कीजिए। उसके पास बैठिए, प्यार से हाथ थामिए, उससे खुलकर बातें कीजिए और उसे यह भरोसा दिलाइए कि दुनिया की चाहे जो भी मुसीबत हो, उसके मम्मी-पापा हमेशा उसके साथ खड़े हैं। इस देश के बचपन को सुरक्षित और सुंदर बनाने की जिम्मेदारी हम सबकी है। आइए, इस डिजिटल दौर में अपने बच्चों के सबसे अच्छे और सच्चे दोस्त बनें। उनके हाथ से कुछ देर के लिए फोन छीनकर उन्हें पास के मैदान में खेलने के लिए भेजें, रात को सोने से पहले उनसे गप्पें मारें और उन्हें खुलकर हंसने का असली मौका दें। जब तक हम उनके लिए घर में एक सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल नहीं बनाएंगे, तब तक स्क्रीन के पीछे का यह रोना कभी बंद नहीं होगा। हमारे देश का उज्ज्वल भविष्य मोबाइल की इस छोटी सी स्क्रीन में घुट-घुट कर जीने के लिए नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे खुलकर जिंदगी जीने के लिए है।