आस्था नहीं, अंधविश्वास का कारोबार बन रही हैं सोशल मीडिया रीलें

Social media reels are becoming a business of superstition, not faith.

भारत सरकार को ऐसी रीलों पर तत्काल प्रतिबन्ध लगाना चाहिए

एन जी भट्ट

फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन दिनों धार्मिक भावनाओं से जुड़ी ऐसी रीलों की बाढ़ आई हुई है जिनमें लोगों को डर और लालच के माध्यम से प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित किया जाता है। “अमुक मंत्र लिखो, वरना अनिष्ट होगा”, “अमुक का नाम लिखो, इससे धन वर्षा होगी”, “इस वीडियो को आगे बढ़ाओ, नहीं तो परिवार संकट में पड़ जाएगा” अमुक राशि वाले हो जाओ सावधान !जैसे संदेश करोड़ों लोगों तक पहुंच रहे हैं।इस प्रकार सोशल मीडिया रीलें आस्था नहीं, अंधविश्वास का कारोबार बन रही हैं ।

इस प्रकार की सोशल मीडिया रीलें और पोस्ट आजकल सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में दिखाई देती हैं, जिनमें लिखा होता है— “ॐ नमः शिवाय लिखो, नहीं तो अनिष्ट होगा”, “इस वीडियो को 11 लोगों को भेजो, वरना दुर्भाग्य आएगा”, “माता का नाम लिखो, रातों-रात धन वर्षा होगी”, या “स्क्रोल मत करो, बेटे ! नहीं तो परिवार पर संकट आएगा”। ये संदेश धार्मिक आस्था से अधिक भय, अंधविश्वास और भावनात्मक दबाव पर आधारित होते हैं। सनातन धर्म के किसी भी प्रामाणिक ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता, शिव पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण या वेदों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि किसी मंत्र को सोशल मीडिया पर लिखने या किसी संदेश को आगे भेजने से ही भगवान प्रसन्न होंगे अथवा ऐसा न करने पर अनिष्ट होगा। धर्म में श्रद्धा, भक्ति, सदाचार, सेवा और कर्म को महत्व दिया गया है, नकि डर फैलाकर लोगों से प्रतिक्रिया लेने को। वास्तव में ऐसी रीलों का उद्देश्य अक्सर अधिक व्यूज़, लाइक, कमेंट और शेयर प्राप्त करना होता है। धार्मिक भावनाओं का उपयोग करके लोगों को भयभीत किया जाता है ताकि वे पोस्ट के साथ जुड़ें। कई मनोवैज्ञानिक इसे “डिजिटल चेन मैसेज” या “भय-आधारित एंगेजमेंट” की श्रेणी में रखते हैं।

धार्मिक विद्वानों का कहना है कि यह प्रवृत्ति आस्था का प्रचार नहीं, बल्कि उसका दुरुपयोग है। सनातन परंपरा में भगवान की भक्ति स्वेच्छा, श्रद्धा और आत्मिक विश्वास पर आधारित है। किसी भी देवी-देवता के नाम का उपयोग भय पैदा करने या चमत्कारी लाभ का लालच देने के लिए करना धार्मिक मूल्यों के विपरीत माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार सोशल मीडिया के एल्गोरिदम अधिक टिप्पणियां और शेयर पाने वाली सामग्री को तेजी से फैलाते हैं। इसी कारण कुछ लोग धार्मिक भावनाओं को साधन बनाकर ऐसी रीलें तैयार करते हैं। इन पोस्टों में अक्सर यह दावा किया जाता है कि एक विशेष मंत्र लिखने या पोस्ट साझा करने से धन, सफलता या चमत्कारी लाभ मिलेगा, जबकि ऐसा कोई दावा धार्मिक ग्रंथों में प्रमाणित नहीं है।समाजशास्त्रियों का मानना है कि इससे विशेष रूप से युवा और कम शिक्षित वर्ग अंधविश्वास की ओर आकर्षित हो सकता है। धार्मिक आस्था को विवेक और ज्ञान के साथ जोड़ने के बजाय डर और लालच से जोड़ना समाज के लिए चिंताजनक है।

धर्माचार्यों का कहना है कि भगवान की कृपा सोशल मीडिया पर कमेंट करने से नहीं, बल्कि अच्छे कर्म, सत्य, सेवा, संयम और भक्ति से प्राप्त होती है। इसलिए लोगों को ऐसी रीलों से प्रभावित होने के बजाय विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन धार्मिक भावनाओं का सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। आस्था का आधार विश्वास होना चाहिए, भय नहीं; और भक्ति का मार्ग सद्कर्म होना चाहिए, न कि वायरल रीलों के माध्यम से फैलाया जाने वाला अंधविश्वास।

कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि भारत सरकार को ऐसी रीलों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए क्योंकि ये रीले हिन्दू देवी देवताओ पर अधिक है। साथ ही समाज में अंधविश्वास फैलाने वालो है। अतः ऐसी रीले बना कर सोशल मीडिया पर वायरल करने वाले लोगों के विरुद्ध तत्काल एक्शन लेकर आवश्यक दंडात्मक कार्यवाही करनी चाहिए ।