सत्य भूषण शर्मा
धरती आज मौन होकर भी बहुत कुछ कह रही है। कहीं पिघलते ग्लेशियर उसकी पीड़ा बयां कर रहे हैं, तो कहीं सूखती नदियाँ और झुलसती हवाएँ मानवता को चेतावनी दे रही हैं। आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में इंसान ने प्रकृति से इतना छेड़छाड़ कर लिया है कि अब पर्यावरण संतुलन पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक प्रतीकात्मक दिवस नहीं, बल्कि यह प्रकृति की उस पुकार को सुनने का अवसर है, जिसे मानव लंबे समय से अनदेखा करता आया है।
वर्तमान समय में पर्यावरण संकट केवल किसी एक देश या क्षेत्र की समस्या नहीं रह गया है। यह एक वैश्विक संकट बन चुका है। जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जल संकट, जंगलों की कटाई और बढ़ता तापमान पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसके कारण मौसम चक्र असंतुलित हो चुका है। कभी असमय बारिश, कभी भीषण गर्मी, तो कभी विनाशकारी बाढ़ जैसी घटनाएँ अब सामान्य होती जा रही हैं।
आज शहरों की हवा जहरीली होती जा रही है। नदियाँ प्लास्टिक और रासायनिक कचरे से प्रदूषित हो चुकी हैं। हर वर्ष लाखों पेड़ विकास परियोजनाओं के नाम पर काट दिए जाते हैं। इसका सीधा असर वन्य जीवों और जैव विविधता पर पड़ रहा है। अनेक पशु-पक्षी विलुप्त हो चुके हैं और कई प्रजातियाँ समाप्ति के कगार पर हैं। यह केवल प्रकृति का नुकसान नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा है।
विडंबना यह है कि जिस प्रकृति ने मानव को जीवन दिया, वही आज मानव की लापरवाही के कारण संकट में है। सुविधाओं की चाह में इंसान ने प्राकृतिक संसाधनों का इतना दोहन किया कि धरती का संतुलन बिगड़ने लगा। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में पानी, स्वच्छ हवा और भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि आखिर हम पृथ्वी को बचाने के लिए क्या कर रहे हैं। केवल भाषणों और नारों से पर्यावरण सुरक्षित नहीं होगा। इसके लिए व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा। हमें प्लास्टिक का उपयोग कम करना होगा, अधिक से अधिक पेड़ लगाने होंगे, जल संरक्षण को अपनाना होगा और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना होगा। छोटी-छोटी आदतें ही बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकती हैं।
विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को पर्यावरण जागरूकता के अभियान को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए। बच्चों में प्रकृति प्रेम विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सरकारों को भी पर्यावरण संरक्षण कानूनों का कठोर पालन सुनिश्चित करना होगा तथा हरित विकास की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति को सदैव माता का स्वरूप माना गया है। हमारे पर्व, परंपराएँ और जीवनशैली प्रकृति से जुड़े रहे हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपनी इसी सांस्कृतिक चेतना को पुनर्जीवित करें और पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार बनाएं।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह संदेश देता है कि अभी भी समय है। यदि मानव जाग जाए और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले, तो धरती को फिर से सुरक्षित और सुंदर बनाया जा सकता है। लेकिन यदि हमने चेतावनियों को अनदेखा किया, तो भविष्य की पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।
धरती हमारी जरूरतें पूरी कर सकती है, लेकिन लालच नहीं। इसलिए आइए, इस विश्व पर्यावरण दिवस पर हम संकल्प लें कि प्रकृति की रक्षा को अपना कर्तव्य बनाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, हरित और सुरक्षित पृथ्वी सौंपेंगे।





