दिलीप कुमार पाठक
अयोध्या के राम मंदिर में चोरी हो गई है! जी हां, इस बार चोरों ने भगवान का सोने का मुकुट या गर्भगृह के आभूषण नहीं छुए, बल्कि सीधे श्रद्धालुओं के उस ‘चढ़ावे’ और ‘दान’ पर हाथ साफ कर दिया जिसे देश-दुनिया के लोगों ने अपनी अगाध श्रद्धा से अर्पित किया था। मंदिर के दानपात्रों से करोड़ों रुपये गायब होने की इस सनसनीखेज खबर ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर आनन-फानन में एसआईटी का गठन कर दिया गया है। लखनऊ के कमिश्नर की अगुवाई में जांच टीम अयोध्या के कोने-कोने को खंगाल रही है, संदिग्धों से पूछताछ हो रही है और सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगाले जा रहे हैं। लेकिन आइए, पुलिसिया कार्रवाई से हटकर जरा इस सच्चाई को देखना ज़रूरी हो गया है।
यह चोरी सिर्फ नोटों की गड्डियों की नहीं है, यह असल में हम इंसानों के भरोसे और हमारी ‘भक्ति’ की चोरी है। हम अक्सर बड़े चाव से गाते और सुनते हैं कि ‘राम जी की मर्जी के बिना इस दुनिया में एक पत्ता भी नहीं हिलता, लेकिन हैरानी की बात है कि मंदिर के भीतर तीसरी आंख यानी सीसीटीवी कैमरों के कड़े पहरे में, भारी सुरक्षा तंत्र के बीच, करोड़ों रुपये हिल गए, गायब हो गए और वहां मौजूद जिम्मेदार लोगों को भनक तक नहीं लगी। सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो उन लोगों पर है जो चौबीसों घंटे ‘राम नाम’ की माला जपते हैं, दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं, पर मौका मिलते ही इस घिनौने खेल में शामिल हो जाते हैं।
जांच में पता चला है कि दान की रकम गिनने वाले कुछ सेवादारों के घरों से लाखों का कैश बरामद हुआ है। जो कर्मचारी कुछ महीने पहले तक बीस-पच्चीस हजार की मामूली नौकरी पर आए थे, वे आज करोड़ों की जमीनों के सौदे कर रहे हैं। इसे ही शायद कलयुग का ‘राम नाम जपना, पराया माल अपना’ वाला चमत्कार कहते हैं। त्रिलोक के स्वामी की आंखों के सामने ऐसा दुस्साहस करने वालों को भगवान का जरा भी डर नहीं रहा। टीवी चैनलों पर चिल्ला-चिल्लाकर बहसें हो रही हैं कि चोर कौन है? लेकिन कोई यह नहीं पूछ रहा कि जिस पावन मंदिर के नाम पर देश के आम नागरिकों की भावनाओं को जोड़ा गया, वहां पैसे गिनने वाले हाथ इतने अपवित्र कैसे हो गए? क्या उन्हें इस बात का बिल्कुल अहसास नहीं था कि वे भगवान के घर में ही सेंध लगा रहे हैं? यह पूरी घटना हमारे समाज के उस पाखंड का सजीव आईना है, जहां हम पत्थरों की भव्यता और सोने की चमक में इतने अंधे हो चुके हैं कि धर्म के नाम पर चलने वाली दुकानों को देखना ही नहीं चाहते। हम वीआईपी पास लेकर गर्व से दर्शन तो करते हैं, लेकिन व्यवस्था के भीतर पनप रहे इस सड़ांध पर आंखें मूंद लेते हैं।अब एसआईटी अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, कुछ मोहरे पकड़े जाएंगे और जेल जाएंगे। लेकिन इस चोरी ने हर उस गरीब और सच्चे भक्त का दिल छलनी कर दिया है, जिसने भूखे पेट रहकर भी अपनी गाढ़ी कमाई का एक-एक रुपया रामलला के चरणों में अर्पित किया था। राम जी तो घट-घट वासी हैं, वे सब देख रहे हैं। वे शायद मन ही मन मुस्कुराते हुए सोच रहे होंगे कि यह इंसान भी कितना अजीब जीव है; मेरे ही नाम पर आलीशान महल बनाता है, पूरी दुनिया से चंदा मांगता है, और फिर मौका मिलते ही मेरी ही जेब काट लेता है।





