अशोक भाटिया
भाजपा क्षेत्रीय कानपुर-बुंदेलखंड अध्यक्ष प्रकाश पाल ने दावा किया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में बड़ा विभाजन होगा और पार्टी टूट जाएगी। उन्होंने कहा कि देश में परिवारवादी, जातिवादी और भ्रष्टाचारवादी राजनीति करने वाले दल या तो समाप्त हो रहे हैं या फिर टूट रहे हैं। प्रकाश पाल ने कहा कि ईडी (इंडिया) गठबंधन की पिछली बैठक में ही साफ दिख रहा था कि गठबंधन बिखराव की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को ऐसे दलों ने अपने बहकावे में रखा था, वे भी अब उनसे दूर हो रहे हैं। लोकतंत्र में जनता अब ऐसी राजनीति से ऊब चुकी है। उन्होंने कहा कि देश में जिस तरह शिवसेना का विभाजन हुआ, उसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में टूट हुई। बंगाल में भी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से लगातार लोग अलग हो रहे हैं। ये सभी व्यक्तिवादी और परिवारवादी राजनीति करने वाले दल हैं।
प्रकाश पाल ने कहा कि समाजवादी पार्टी भी एक परिवारवादी पार्टी है, जहां सभी बड़े निर्णय एक ही परिवार के लोग कमरे में बैठकर करते हैं। कुछ समय पहले सपा के कई विधायक टूटे थे और उनकी जानकारी के अनुसार आने वाले समय में भी कई विधायक अलग हो सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि चुनाव से पहले सपा के भीतर बड़ा विभाजन होगा।पाल ने कहा कि ऐसे दल अब सिमटते जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि टीएमसी से बड़ी संख्या में विधायक और सांसद अलग हो चुके हैं। इसी तरह 2027 के चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में भी टूट देखने को मिलेगी। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन पर निशाना साधते हुए प्रकाश पाल ने कहा कि कांग्रेस इस गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ दल केवल सत्ता हासिल करने के लिए घुसपैठियों को वोटर बनाना चाहते हैं और इसी कारण विभिन्न व्यवस्थाओं का विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि गठबंधन में शामिल अधिकांश दल ऐसे मुद्दों पर एक-दूसरे का समर्थन करते रहे हैं।
तृणमूल और शिवसेना (यूबीटी) में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी में भी कुछ ऐसी ही कहानी सामने आ सकती है।उत्तर प्रदेश के मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने बुधवार को दावा किया कि समाजवादी पार्टी में बड़ा विभाजन होने की संभावना है और कई सपा नेता भाजपा में शामिल होने के लिए तैयार हैं। हालांकि, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने मंत्री के आरोपों का खंडन करते हुए राजभर के बयानों और इरादों पर सवाल उठाए हैं।X पर एक पोस्ट में, राजभर ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी (एसपी) के नेता राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र सौंपा था, हालांकि उन्होंने कथित संचार का विवरण नहीं दिया।उत्तर प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए सहयोगी एसबीएसपी के प्रमुख राजभर ने अपने पोस्ट में दावा किया, “समाजवादी पार्टी में बड़ा विभाजन होने वाला है। राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र सौंपा है।”
राजभर की आलोचना करते हुए, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, “दाना और गाना कब तक चलेगा ये अफसाना (कब तक उनका ‘फायदा और गाना’ चलेगा)”लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि पार्टी का ध्यान अब गोरखपुर में अपनी संगठनात्मक रणनीति को मजबूत करने पर है। उन्होंने कहा, “इस बार हम गोरखपुर में भाजपा को शून्य पर लाने के लिए काम करेंगे। हमने गोरखपुर में नतीजे बदलने का संकल्प लिया है। बहुत जल्द पार्टी संगठन यह तय करेगा कि यहां पार्टी की बैठक कब आयोजित की जाए।”
पर देखा जय तो सैद्धांतिक और कानूनी रूप से किसी भी राजनीतिक दल का विभाजन संभव है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी (SP) में किसी बड़े विभाजन की हाल फ़िलहाल संभावना बहुत कम लगत्ती है , पर राजनीति में कुछ भी असंम्भव नहीं है । कहा जाता है कि धुवाँ तभी उठता है जब चिंगारी लगी हो ।
भारतीय राजनीति और विशेषकर उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी (सपा) एक अत्यंत महत्वपूर्ण धुरी है। समय-समय पर विपक्षी दलों के बयानों, आंतरिक असंतोष की खबरों और मीडिया बहसों में यह सवाल तैरता रहता है कि “क्या समाजवादी पार्टी का भविष्य में विभाजन हो सकता है?” किसी भी राजनीतिक दल में टूट या विभाजन की संभावना को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि राजनीति संभावनाओं का खेल है। हालांकि, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य, पार्टी की संगठनात्मक संरचना और कानूनी बाध्यताओं को देखते हुए निकट भविष्य में समाजवादी पार्टी के विभाजन की संभावना बेहद क्षीण नजर आती है।
वैसे समाजवादी पार्टी में विभाजन की चर्चाएं नई नहीं हैं। साल 2016-17 के दौरान पार्टी ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा आंतरिक संकट देखा था। वह दौर पार्टी के संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव, उनके भाई शिवपाल सिंह यादव और तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच सत्ता और संगठन पर नियंत्रण के संघर्ष का था।शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच टिकट बंटवारे और संगठन के पदों को लेकर तीखा टकराव हुआ।
जनवरी 2017 में एक विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाकर अखिलेश यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। चुनाव आयोग ने भी अखिलेश यादव के गुट को ही असली ‘समाजवादी पार्टी’ माना और ‘साइकिल’ चुनाव चिह्न उन्हें सौंप दिया।शिवपाल यादव ने बाद में अलग होकर ‘प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया)’ का गठन किया।
यह समाजवादी पार्टी के इतिहास में विभाजन के सबसे करीब का क्षण था। हालांकि, यह पूरी तरह से विभाजन न होकर एक सत्ता परिवर्तन था, जिसमें पार्टी का बड़ा हिस्सा, कैडर और विधायक अखिलेश यादव के साथ बने रहे। वर्तमान में शिवपाल यादव की पार्टी का सपा में विलय हो चुका है और परिवार एकजुट दिख रहा है।
आज के समय में किसी भी राजनीतिक दल का विभाजन केवल नेताओं की इच्छा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इसके लिए सख्त कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत किसी भी पार्टी में वैध विभाजन के लिए कुछ कड़े नियम हैं:यदि किसी दल के निर्वाचित प्रतिनिधियों (विधायकों या सांसदों) का एक समूह अलग होना चाहता है, तो मूल पार्टी की सदस्यता बचाए रखने के लिए उनके पास कुल संख्या का कम से कम दो-तिहाई बहुमत होना अनिवार्य है।यदि दो-तिहाई से कम संख्या में विधायक या सांसद बगावत करते हैं, तो दलबदल कानून के तहत उनकी सदन की सदस्यता तुरंत समाप्त हो जाएगी।
वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा और लोकसभा में समाजवादी पार्टी के पास मजबूत संख्या बल है। इतने बड़े पैमाने पर (दो-तिहाई) विधायकों या सांसदों को तोड़ना किसी भी विरोधी दल या बागी गुट के लिए एक बेहद कठिन और लगभग असंभव कार्य है।
साथ ही २०२४ के लोकसभा चुनावों के परिणाम ने समाजवादी पार्टी की आंतरिक स्थिरता को अभूतपूर्व मजबूती दी है। चुनावों में सपा उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसने ३७ लोकसभा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इस सफलता ने पार्टी के भीतर और बाहर कई समीकरण बदल दिए हैं:इस प्रचंड जीत ने अखिलेश यादव को एक परिपक्व और सफल रणनीतिकार के रूप में स्थापित कर दिया है। अब पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को चुनौती देने वाला कोई बड़ा स्वर मौजूद नहीं है।चुनावी सफलता के बाद पार्टी का काडर और जमीनी कार्यकर्ता बेहद उत्साहित हैं। जब कोई पार्टी सत्ता की दौड़ में मजबूती से आगे बढ़ रही होती है, तो उसके टूटने या बगावत की आशंका न्यूनतम हो जाती है।
उत्तर प्रदेश के सत्तारूढ़ दल (भाजपा) और उसके सहयोगियों (जैसे ओम प्रकाश राजभर या अन्य नेता) द्वारा अक्सर सपा में टूट के दावे किए जाते रहे हैं। राजनीति में ऐसे बयान अक्सर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने और विपक्षी खेमे में भ्रम फैलाने के लिए दिए जाते हैं, जिनमें रणनीतिक गहराई कम और राजनीतिक बयानबाजी अधिक होती है।
सोचने वाली बात यह भी है कि क्या भविष्य में विभाजन के कोई संभावित कारण हो सकते हैं? कहा जा सकता है कि यद्यपि वर्तमान में विभाजन असंभव लगता है, लेकिन दीर्घकालिक राजनीति में कुछ ऐसे कारक हो सकते हैं जो आंतरिक असंतोष को जन्म दे सकते हैं:
जैसे किसी भी बड़े दल में जब नेताओं की संख्या बढ़ती है, तो चुनावी टिकटों के वितरण के समय असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। यदि भविष्य में वरिष्ठ नेताओं या कुछ विशेष क्षेत्रों के कद्दावर नेताओं को यह महसूस होने लगे कि संगठन में उनकी उपेक्षा हो रही है, तो वे अलग रास्ता चुन सकते हैं। हालांकि, यह व्यक्तिगत दलबदल होगा, पार्टी का विभाजन नहीं।
अखिलेश यादव ने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर एक बड़ा सामाजिक गठबंधन तैयार किया है। इस गठबंधन को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। यदि पार्टी के भीतर गैर-यादव ओबीसी, दलित या मुस्लिम नेताओं को यह लगने लगे कि सत्ता और संगठन के शीर्ष पदों पर केवल एक विशेष वर्ग का नियंत्रण है, तो वैचारिक मतभेद उभर सकते हैं।
भविष्य में जब पार्टी की अगली पीढ़ी राजनीति में कदम रखेगी, तब नेतृत्व और विरासत को लेकर आंतरिक खींचतान की संभावनाएं बन सकती हैं। पारिवारिक पार्टियों में अक्सर अगली पीढ़ी के आगमन पर आंतरिक गुटबाजी का खतरा बढ़ जाता है।
फिलहाल यह पूरी बहस बीजेपी गठबंधन के दावों और समाजवादी पार्टी के बचाव के बीच एक गंभीर ‘पॉलिटिकल वॉर’ का रूप ले चुकी है। आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इन अटकलों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का पारा जरूर बढ़ा रखा है।





