राम मंदिर में चढ़ावे की गिनती के लिए सांवलिया सेठ मंदिर जैसी व्यवस्था समय की आवश्यकता

A system similar to that of the Sanwalia Seth Temple is the need of the hour for counting offerings at the Ram Mandir

एन जी भट्ट

अयोध्या स्थित भगवान श्रीराम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां नकद राशि, स्वर्ण, रजत, आभूषण और अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ चढ़ावे के रूप में अर्पित करते हैं। लेकिन हाल ही में चढ़ावे की कथित हेराफेरी और अनियमितताओं से जुड़े मामले सामने आने के बाद मंदिर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की प्रारंभिक जांच के आधार पर कई लोगों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई है तथा नकदी, आभूषण और चढ़ावे के प्रबंधन में कथित खामियों की जांच जारी है। जांच में नकदी की गिनती, निगरानी, सीसीटीवी व्यवस्था और बैंक में जमा करने की प्रक्रिया में कमियों की ओर भी संकेत किया गया है।

ऐसे समय में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले स्थित प्रसिद्ध श्री सांवलिया सेठ मंदिर की पारदर्शी और सुव्यवस्थित व्यवस्था देश के अन्य बड़े मंदिरों, विशेषकर राम मंदिर के लिए अनुकरणीय मॉडल बन सकती है। सांवलिया सेठ मंदिर में चढ़ावे की गणना पूरी तरह निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होती है। दानपात्र खोलने से लेकर नकदी की गिनती, आभूषणों के वर्गीकरण और बैंक में जमा कराने तक प्रत्येक चरण की निगरानी की जाती है। नोट गिनने की आधुनिक मशीनों का उपयोग किया जाता है। प्रशासन, बैंक अधिकारी, मंदिर मंडल और सुरक्षा एजेंसियों की उपस्थिति में पूरी प्रक्रिया संपन्न होती है। संपूर्ण कार्यवाही सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होती है तथा विस्तृत अभिलेख तैयार किए जाते हैं। यही कारण है कि इतने बड़े स्तर पर चढ़ावा आने के बावजूद वहां विवाद या अविश्वास की स्थिति बहुत कम देखने को मिलती है।

इसके विपरीत, राम मंदिर में सामने आए ताजा घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल धार्मिक आस्था पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उसके अनुरूप मजबूत संस्थागत व्यवस्था भी आवश्यक है। एसआईटी की जांच में नकदी के प्रबंधन, कर्मचारियों के सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी और चढ़ावे को बैंक तक पहुँचाने की प्रक्रिया में कथित कमियों का उल्लेख किया गया है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष न्यायिक और जांच प्रक्रिया के बाद ही सामने आएंगे, इसलिए फिलहाल जल्दबाजी में किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी मान लेना उचित नहीं होगा।

राम मंदिर प्रबंधन यदि सांवलिया सेठ मॉडल को अपनाए तो अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। सबसे पहले, नकदी की गिनती पूरी तरह मशीन आधारित होनी चाहिए। दूसरी बात, गिनती के समय बहुस्तरीय निगरानी व्यवस्था हो, जिसमें बैंक प्रतिनिधि, स्वतंत्र लेखा परीक्षक, प्रशासनिक अधिकारी तथा ट्रस्ट के सदस्य एक साथ उपस्थित रहें। तीसरी आवश्यकता यह है कि पूरी प्रक्रिया की डिजिटल रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाए तथा समय-समय पर उसका ऑडिट कराया जाए।

इसके अतिरिक्त, दानपात्रों को सुरक्षित सील करने, उनके परिवहन और बैंक तक पहुँचाने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की जानी चाहिए। कर्मचारियों का नियमित सत्यापन, कार्यों का रोटेशन तथा संवेदनशील पदों पर सीमित अवधि की नियुक्ति भी भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम कर सकती है।

आज देश के अनेक प्रमुख मंदिर आधुनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली अपना चुके हैं। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन दान, रसीद आधारित व्यवस्था तथा नियमित ऑडिट से नकदी पर निर्भरता कम होती है और पारदर्शिता बढ़ती है। राम मंदिर में भी यूपीआई, नेट बैंकिंग और अन्य डिजिटल माध्यमों को और अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे नकदी के भौतिक प्रबंधन की जटिलता कम होगी।

धार्मिक संस्थानों की सबसे बड़ी पूंजी श्रद्धालुओं का विश्वास होता है। यदि चढ़ावे के प्रबंधन पर संदेह उत्पन्न होता है तो उसका प्रभाव केवल प्रशासन पर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं पर भी पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी प्रकार की जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और शीघ्र पूरी हो तथा यदि कहीं व्यवस्थागत कमियां हैं तो उन्हें तत्काल दूर किया जाए।

अयोध्या का राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय आस्था का प्रतीक है। ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान में वित्तीय प्रबंधन भी सर्वोच्च मानकों के अनुरूप होना चाहिए। राजस्थान के सांवलिया सेठ मंदिर की वैज्ञानिक, पारदर्शी और तकनीक आधारित व्यवस्था इस दिशा में एक सफल उदाहरण है। यदि राम मंदिर प्रबंधन इस मॉडल के प्रमुख तत्वों को अपनाता है तो भविष्य में चढ़ावे की सुरक्षा, पारदर्शिता और श्रद्धालुओं के विश्वास—तीनों को और अधिक मजबूती मिलेगी। यही किसी भी महान धार्मिक संस्थान की सबसे बड़ी पहचान होनी चाहिए।