कृति आरके जैन
जीवन जब मृत्यु की चौखट पर डगमगाने लगता है, तब उम्मीद किसी दवा में नहीं, एक चिकित्सक की आँखों में दिखाई देती है। किसी माँ का विश्वास इसलिए नहीं टूटता कि उसे पता है—अस्पताल के भीतर कोई उसके बच्चे की हर साँस के लिए लड़ रहा है। किसी वृद्ध पिता की प्रार्थना इसलिए जीवित रहती है कि सफेद कोट पहने कोई हाथ अभी हार मानने को तैयार नहीं। उस क्षण मशीनों की आवाज़ें, दवाइयों की शीशियाँ और रिश्तों की भीड़ सब धुंधली पड़ जाती हैं; केवल एक चेहरा दिखाई देता है—चिकित्सक का। उसके लिए बिस्तर पर लेटा व्यक्ति केवल मरीज नहीं, किसी परिवार की पूरी दुनिया होता है। इसलिए वह समय, थकान और अपने सुख-दुख से ऊपर उठकर जीवन बचाने की अंतिम लड़ाई लड़ता है। शायद इसी निस्वार्थ तप ने चिकित्सक को पेशेवर नहीं, मानवता का मौन प्रहरी बनाया है। एक जुलाई का राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस इसी अनकहे समर्पण के प्रति समाज की विनम्र कृतज्ञता का दिवस है।
हर पेशे की अपनी विरासत होती है, लेकिन चिकित्सा की विरासत सेवा और समर्पण से लिखी जाती है। भारत में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस भारत रत्न डॉ. बिधान चंद्र रॉय की स्मृति को समर्पित है, जिनका जन्म और महाप्रयाण दोनों एक जुलाई को हुआ। उन्होंने सिद्ध किया कि चिकित्सा केवल रोगों का उपचार नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का सशक्त माध्यम है। चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य संस्थानों और जनस्वास्थ्य को नई दिशा देकर उन्होंने भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूत नींव रखी। उनका विश्वास था कि एक चिकित्सक केवल शरीर ही नहीं, व्यवस्था की कमजोरियों का भी उपचार कर सकता है। यही कारण है कि आज भी उनका आदर्श हर उस डॉक्टर के लिए प्रेरणास्रोत है, जो मरीज की मुस्कान को अपनी सबसे बड़ी सफलता मानता है।
भारत में डॉक्टर होना केवल पेशा नहीं, हर दिन एक नई चुनौती से मुकाबला करना है। विशाल आबादी, सीमित संसाधन और असमान स्वास्थ्य ढाँचे के बीच लाखों मरीज प्रतिदिन चिकित्सकों पर भरोसा करते हैं। डॉक्टरों की संख्या बढ़ी है, फिर भी ग्रामीण भारत आज भी गंभीर कमी से जूझ रहा है। अनेक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र संसाधनों, आधुनिक उपकरणों और पर्याप्त स्टाफ के अभाव में संचालित हो रहे हैं। ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी चिकित्सक अपने ज्ञान, अनुभव और संवेदना के बल पर अनगिनत जिंदगियों को नया जीवन दे रहे हैं। यही निस्वार्थ समर्पण उन्हें केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज का सच्चा जीवन-प्रहरी बनाता है।
इतिहास गवाह है—जब पूरी दुनिया ठहर जाती है, तब चिकित्सक कदम पीछे नहीं, आगे बढ़ाते हैं। कोविड-19 महामारी इसका सबसे बड़ा प्रमाण बनी। जब लोग संक्रमण के भय से घरों में कैद थे, तब डॉक्टर अस्पतालों में हर जीवन के लिए मोर्चा संभाले खड़े थे। उन्होंने परिवार, त्योहार और अपनी सुरक्षा तक की परवाह नहीं की। भारतीय चिकित्सा संघ के अनुसार, सेवा करते हुए अनेक चिकित्सकों ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। वे ऐसे अनाम नायक हैं, जिनके नाम भले स्मारकों पर न लिखे जाएँ, लेकिन जिनके त्याग से लाखों घर आज भी आबाद हैं। महामारी ने सिद्ध कर दिया कि चिकित्सक केवल इलाज नहीं करते, वे निराशा के सबसे घने अंधकार में भी उम्मीद की लौ जलाए रखते हैं।
तकनीक चिकित्सा की रफ्तार बढ़ा सकती है, लेकिन उपचार की आत्मा आज भी इंसानियत में बसती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक सर्जरी, जीन थेरेपी और टेलीमेडिसिन ने स्वास्थ्य सेवाओं को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। भारत में करोड़ों लोग डिजिटल माध्यम से चिकित्सा परामर्श ले रहे हैं और अस्पताल आधुनिक तकनीकों से सुसज्जित हो रहे हैं। फिर भी सबसे भरोसेमंद औज़ार आज भी चिकित्सक की संवेदना है। मशीनें रिपोर्ट पढ़ सकती हैं, दर्द नहीं; कृत्रिम बुद्धिमत्ता बीमारी पहचान सकती है, लेकिन आँखों में छिपा भय नहीं। कई बार डॉक्टर का आश्वस्त स्पर्श और भरोसे से भरे दो शब्द उन दवाओं से अधिक प्रभाव छोड़ जाते हैं, जिन्हें विज्ञान ने वर्षों की साधना से विकसित किया है।
सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जो जीवन बचाता है, वही कई बार असुरक्षित खड़ा दिखाई देता है। जिस चिकित्सक से समाज हर संकट में चमत्कार की उम्मीद करता है, उसे अक्सर अविश्वास, दुर्व्यवहार और हिंसा सहनी पड़ती है। भारतीय चिकित्सा संघ के सर्वेक्षण इस कड़वी सच्चाई की पुष्टि करते हैं। लंबी ड्यूटी, मानसिक दबाव और जीवन-मृत्यु के कठिन निर्णयों के बीच काम करने वाला डॉक्टर भी आखिर एक संवेदनशील इंसान है। उसके भी अपने परिवार, भावनाएँ और सीमाएँ हैं। यदि स्वस्थ भारत का सपना साकार करना है, तो चिकित्सकों की सुरक्षा, सम्मान और गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। क्योंकि जितना सुरक्षित और सम्मानित चिकित्सक होगा, उतनी ही मजबूत देश की स्वास्थ्य व्यवस्था होगी।
राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि समाज के अंतर्मन को झकझोरने वाला आत्ममंथन है। यह हमें याद दिलाता है कि अस्पताल केवल ईंट-पत्थरों से नहीं, चिकित्सकों के त्याग, धैर्य और करुणा से जीवित रहते हैं। उनके बिना आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी निष्प्राण है। इसलिए इस एक जुलाई को केवल शुभकामनाओं तक सीमित न रहें। अपने विश्वास, सम्मान और संवेदनशील व्यवहार से उन हाथों को संबल दें, जो हर दिन अनगिनत अनजान जिंदगियों के लिए ईश्वर का दायित्व निभाते हैं। क्योंकि जब हर उम्मीद टूटने लगती है, तब भी एक चिकित्सक की आँखों में विश्वास की लौ जलती रहती है। और जब तक यह लौ प्रज्वलित है, तब तक मानवता सुरक्षित है।





