पश्चिम बंगाल में बदलाव का दौर

A Phase of Change in West Bengal

महेन्द्र तिवारी

पश्चिम बंगाल की राजनीति और वहां की प्रशासनिक व्यवस्था में हाल ही में एक ऐसा निर्णायक मोड़ आया है जो राज्य के भविष्य की दिशा तय करेगा। राज्य की विधानसभा ने एक ही दिन में कई ऐसे ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाले विधेयकों को पारित किया है जिनका सीधा असर समाज के हर वर्ग पर पड़ना तय है। इन निर्णयों ने न केवल कानूनी ढांचे को बदला है बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सत्ताधारी दल आने वाले समय में सामाजिक न्याय, सार्वजनिक सुरक्षा और पारिवारिक कानूनों के मोर्चे पर बेहद कड़े और सुधारात्मक कदम उठाने के लिए पूरी तरह से तैयार है। इस विधायी प्रक्रिया में सबसे अधिक ध्यान अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में किए गए आमूल-चूल बदलावों, सार्वजनिक संपत्ति और नागरिकों की सुरक्षा के लिए लाए गए अत्यंत कठोर कानून और समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में उठाए गए शुरुआती कदमों ने आकर्षित किया है। इन फैसलों ने स्पष्ट कर दिया है कि पुरानी व्यवस्थाओं को सुधारने और न्यायिक आदेशों का पालन करने के लिए सरकार किसी भी बड़े बदलाव से पीछे नहीं हटने वाली है।

आरक्षण की राजनीति और नीतियों के संदर्भ में राज्य सरकार का फैसला सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। विधानसभा में पारित किए गए दो संशोधन विधेयकों के माध्यम से राज्य की आरक्षण प्रणाली को पूरी तरह से नया रूप दे दिया गया है। नई व्यवस्था के अंतर्गत अब राज्य में केवल 66 विशेष समुदायों को ही अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का लाभ प्राप्त होगा। इन चयनित समुदायों के लिए राज्य की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 7 प्रतिशत का आरक्षण कोटा तय किया गया है। गौरतलब है कि इससे पहले राज्य में यह आरक्षण सीमा 17 प्रतिशत तक निर्धारित थी जिसे अब घटाकर नया स्वरूप दिया गया है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा कदम यह रहा है कि उन 113 समुदायों को आरक्षण की सूची से पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है जिन्हें पहले बिना किसी ठोस वैज्ञानिक और सामाजिक अध्ययन के इस सूची में शामिल कर लिया गया था। सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी भी प्रकार की राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित नहीं है बल्कि यह न्यायपालिका के आदेशों का पूरी तरह से पालन करने की एक अनिवार्य प्रक्रिया है।

इस व्यापक बदलाव की जड़ें मई 2024 में कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में खोजी जा सकती हैं। न्यायालय ने अपने विस्तृत निर्णय में उन तमाम समुदायों के अन्य पिछड़ा वर्ग के दर्जे को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया था जिन्हें साल 2010 से लेकर साल 2012 के मध्य इस सूची में जोड़ा गया था। न्यायालय का स्पष्ट मानना था कि किसी भी समुदाय को केवल राजनीतिक या प्रशासनिक आदेश के आधार पर पिछड़ा घोषित नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उस समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का जमीनी स्तर पर व्यापक और वैज्ञानिक सर्वेक्षण होना नितांत आवश्यक है। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया था कि बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए सूची में समुदायों को जोड़ना संविधान की मूल भावना और समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। हालांकि न्यायालय ने उन लोगों को राहत दी थी जो पहले ही इस कोटे के तहत सरकारी नौकरियां प्राप्त कर चुके थे ताकि राज्य के प्रशासनिक कामकाज में कोई अचानक बाधा उत्पन्न न हो।

न्यायालय के इसी आदेश के बाद राज्य सरकार ने नए कानून के जरिए पिछड़ा वर्ग आयोग को अभूतपूर्व शक्तियां प्रदान की हैं। अब यदि कोई भी समुदाय खुद को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ मानता है तो उसे सीधे आयोग के समक्ष अपना दावा प्रस्तुत करना होगा। इसके बाद यह आयोग उस समुदाय की वर्तमान सामाजिक स्थिति, शिक्षा के स्तर, आर्थिक पिछड़ेपन और अन्य प्रासंगिक पहलुओं का बहुत ही गहराई से अध्ययन करेगा। केवल उसी स्थिति में जब आयोग पूरी तरह से संतुष्ट हो जाएगा तब वह अपनी सकारात्मक सिफारिश राज्य सरकार को भेजेगा। इस नई प्रक्रिया को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में किसी भी समुदाय को गलत तरीके से सूची में शामिल करने या बाहर रखने की शिकायतों का निवारण पूरी तरह से पारदर्शी और संस्थागत तरीके से हो सकेगा। इसके साथ ही नए कानून में यह भी सुनिश्चित किया गया है कि राज्य में सभी प्रकार का कुल आरक्षण किसी भी परिस्थिति में 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा को पार नहीं करेगा। यह प्रावधान सीधे तौर पर देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय समय पर दिए गए दिशा निर्देशों के अनुरूप है।

आरक्षण के मोर्चे पर उठाए गए इन कदमों के साथ ही विधानसभा ने सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर एक ऐसा कानून पारित किया है जिसने राज्य के राजनीतिक माहौल में खासी गर्मी पैदा कर दी है। इस नए और सख्त कानून का मुख्य उद्देश्य राज्य के भीतर संगठित अपराधों, हिंसक गतिविधियों, दंगों और सार्वजनिक संपत्तियों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने वाले असामाजिक तत्वों पर नकेल कसना है। इस कानून के तहत राज्य की पुलिस और प्रशासन को असाधारण शक्तियां सौंपी गई हैं। सबसे विवादास्पद और चर्चा का विषय बना प्रावधान यह है कि विशेष और गंभीर परिस्थितियों में पुलिस किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए 12 महीने तक निवारक निरोध के तहत हिरासत में रख सकती है। इसके अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति या समूह किसी भी हिंसक प्रदर्शन या दंगे के दौरान सरकारी अथवा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है तो उस नुकसान की पूरी भरपाई और क्षतिपूर्ति उसी व्यक्ति से वसूलने का कड़ा प्रावधान भी इस कानून में जोड़ा गया है।

सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि आम जनता में सुरक्षा की भावना पैदा करने और राज्य की कानून व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए ऐसे कठोर प्रावधान समय की सबसे बड़ी मांग थे। गंभीर अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती श्रेणी में डालकर पुलिस को तत्काल कार्रवाई करने, तलाशी लेने और जब्ती करने के व्यापक अधिकार दिए गए हैं। वहीं विपक्षी दलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कानून के संभावित दुरुपयोग को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि 12 महीने तक बिना मुकदमे के जेल में रखने का अधिकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक संकेत हो सकता है और इसका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों की आवाज को दबाने के लिए किया जा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि न्यायालयों में इस कानून को किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

इन दो बड़े फैसलों के बीच राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में भी अपना पहला बड़ा और औपचारिक कदम उठा लिया है। मुख्यमंत्री ने विधानसभा के पटल पर यह महत्वपूर्ण घोषणा की कि इस जटिल और संवेदनशील विषय पर विचार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया गया है। इस विशेष समिति को केवल 4 सप्ताह का समय दिया गया है ताकि वह अपनी विस्तृत रिपोर्ट और सिफारिशें राज्य सरकार को सौंप सके। इस प्रस्तावित संहिता का मुख्य उद्देश्य राज्य के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति के उत्तराधिकार, बच्चों को गोद लेने और भरण पोषण जैसे पारिवारिक मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है जो किसी भी धर्म या आस्था से परे हो।

यह विषय पूरे देश में लंबे समय से एक गहन राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र रहा है। हालांकि संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में इसका स्पष्ट उल्लेख है लेकिन इसकी जटिलताओं के कारण इसे लागू करना हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है। राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस समान कानून को बनाते समय आदिवासी और अन्य मान्यता प्राप्त स्वदेशी समुदायों की प्राचीन परंपराओं और उनके विशेष अधिकारों को पूरी तरह से संरक्षित रखा जाएगा और उन्हें आवश्यक छूट प्रदान की जाएगी। यदि यह समिति 4 सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट देती है और इसके आधार पर विधानसभा में विधेयक पारित हो जाता है तो यह राज्य के सामाजिक ढांचे में अब तक का सबसे बड़ा परिवर्तन होगा।

निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि विधानसभा का यह सत्र कई मायनों में राज्य के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। एक तरफ जहां आरक्षण की नई नीति से सामाजिक न्याय की दिशा में पारदर्शिता आएगी और न्यायिक विवादों का अंत होगा वहीं दूसरी तरफ सार्वजनिक सुरक्षा कानून से अपराध नियंत्रण में मदद मिलेगी। इसके अलावा पारिवारिक कानूनों में एकरूपता लाने का प्रयास समाज को आधुनिक और समानता आधारित दिशा में ले जाएगा। आने वाले समय में इन तीनों महत्वपूर्ण कानूनों का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन और इनका व्यापक सामाजिक प्रभाव इस बात की परीक्षा लेगा कि राज्य सरकार अपने सुधारात्मक उद्देश्यों में किस हद तक सफल हो पाती है। देश भर के राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब इसी बात पर टिकी है कि ये बदलाव राज्य की राजनीति को किस नई दिशा में लेकर जाते हैं।