राम मंदिर में चोरी और विपक्ष का ‘चुनिंदा शोर’: आस्था पर कालिख पोतने का कुत्सित प्रयास

Theft at the Ram Temple and the Opposition's 'Selective Outcry': A Vile Attempt to Tarnish Faith

एडवोकेट जयदेव राठी

अयोध्या की पावन धरती पर विराजमान श्री राम जन्मभूमि मंदिर, जो करोड़ों भारतीयों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र है, हाल ही में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना का शिकार हुआ। मंदिर परिसर में हुई चोरी की घटना ने न केवल श्रद्धालुओं के मन को व्यथित किया है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है। इस घटना के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और गिरफ्तारी के बाद जांच शुरू हो चुकी है। यह बिल्कुल सही और आवश्यक कदम है। कानून को अपना काम करना चाहिए, निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी चाहे कोई भी हो, उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। अपराध अपराध होता है, और मंदिर जैसी पवित्र जगह पर हाथ डालना किसी भी सभ्य समाज में क्षम्य नहीं किया जा सकता। लेकिन, इस घटना से कहीं ज्यादा चिंताजनक और विचारणीय वह ‘शोर’ है, जिसे देश का तथाकथित विपक्ष इस मुद्दे पर शोर मचा रहा है।

सवाल यह उठता है कि क्या अपराध की जो यह घटना हुई है इसको लेकर देश में सड़क तक हंगामा किया जाए, या फिर इस शोर के पीछे कोई गहरा सियासी एजेंडा काम कर रहा है? अगर हम ईमानदारी से इस स्थिति का विश्लेषण करें, तो विपक्ष का यह अचानक जागा ‘संवेदनशील’ चेहरा साफ दिखाई देता है। देशभर के कोने-कोने में स्थित मंदिरों में अतीत में भी चोरियां हुई हैं। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध और समृद्ध मंदिरों से लेकर उत्तर और पश्चिम के अनेक प्राचीन मंदिरों तक, चोरियों की घटनाएं समय-समय पर प्रकाश में आती रही हैं। उन घटनाओं पर क्या विपक्ष ने कभी यह हंगामा मचाया था? क्या तब विपक्ष के नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके धर्म और आस्था की दुहाई दी थी? क्या उस समय उन्होंने में सवाल उठाया था? जवाब है, नहीं। अन्य मंदिरों की चोरी पर विपक्ष की जो ‘गहरी खामोशी’ रही, उसकी तुलना में राम मंदिर की चोरी पर किया गया यह ‘अति-उत्साह’ और शोर, उनकी नियत पर सवाल खड़ा करता है।

यह चुनिंदा शोर इसलिए नहीं है कि राम मंदिर में चोरी हुई है, बल्कि इसलिए है क्योंकि यह राम मंदिर वहां बना है, जहां इसे लेकर दशकों से चली आ रही आस्था की लहर की जीत हुई है। विपक्ष यह भूल गया है कि आज जिस राम मंदिर की सुरक्षा और पवित्रता का उन्हें अचानक रोना आ रहा है, उसी मंदिर के निर्माण के खिलाफ वे कभी सबसे आगे खड़े थे। इतिहास इतना भी पुराना नहीं है कि विपक्षी दलों और उनके नेताओं के बयानों को भुलाया जा सके। वे लोग, जो कभी भगवान राम को ‘काल्पनिक’ बताते थे, जो राम मंदिर निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए थे, और जिन्होंने मंदिर निर्माण रोकने के लिए हर संभव कानूनी और राजनीतिक दांवपेंच खेले थे, आज अचानक राम मंदिर के सबसे बड़े रक्षक कैसे बन गए? जो लोग कभी मंदिर के अस्तित्व को ही मानने को तैयार नहीं थे, आज मंदिर में चोरी होने पर आस्था के सौदागर बनकर देश को ज्ञान दे रहे हैं। यह दोहरा चरित्र और राजनीतिक पाखंड अपने आप में बेनकाब हो चुका है। विपक्ष का यह कुत्सित प्रयास दरअसल प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और भारतीय जनता पार्टी को घेरने की एक नाकाम कोशिश है। राम मंदिर का भूमि पूजन और शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के करकमलों द्वारा हुआ, जिसने एक नए भारत के निर्माण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नींव रखी। विपक्ष इस बात को पचा नहीं पा रहा है कि भाजपा के शासनकाल में, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक ऐसा ऐतिहासिक कार्य पूरा हुआ, जिसने भारत की सभ्यता को नई पहचान दी है। चूंकि विपक्ष के पास न तो कोई विकास का एजेंडा है और न ही जनता के बीच कोई स्वीकार्य चेहरा, इसलिए वे हर उस मुद्दे को भगवान बनाकर राजनीति करते हैं, जहां भाजपा की छवि को धूमिल किया जा सके।

अयोध्या राम मंदिर आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह देश-दुनिया में भारतीय आस्था और संस्कृति की पहचान बन चुका है। आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना रहा है। बड़ी संख्या में विदेशी श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं।
विपक्ष जानबूझकर इस चोरी की घटना को इतना तूल दे रहा है ताकि देश और दुनिया के सामने राम मंदिर की छवि को धूमिल किया जा सके। वे चाहते हैं कि श्रद्धालुओं के मन में मंदिर प्रशासन और वर्तमान सरकार के प्रति संदेह की भावना पैदा हो।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ऐसी जगह, जो आज वैश्विक पटल पर भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और आस्था का प्रतीक है, उसे राजनीतिक रोटी सेंकने का जरिया बनाया जा रहा है। विपक्ष की यह मानसिकता दर्शाती है कि उनके लिए आस्था कोई मायने नहीं रखती, उनका एकमात्र लक्ष्य सत्ता पक्ष को बदनाम करना है। वे राम को नहीं, बल्कि राम के माध्यम से नरेंद्र मोदी को निशाना बना रहे हैं। लेकिन विपक्ष को यह समझना होगा कि राम किसी एक पार्टी या विचारधारा के मोहताज नहीं हैं। राम करोड़ों भारतीयों के हृदय में बसते हैं, और जनता इस क्षुद्र राजनीति को अच्छी तरह से समझ रही है।

चोरी के आरोपियों को कानून सजा देगा, इसमें कोई दोराय नहीं है। मंदिर ट्रस्ट और प्रशासन को भी चाहिए कि वे सुरक्षा व्यवस्था में चूक को सुधारें ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। लेकिन जिस विपक्ष ने आज मंदिर की चोरी पर इतना हल्ला बोला है, उसे सबसे पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। उन्हें याद करना चाहिए कि जब मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशे जा रहे थे, तब उनकी सोच कहां थी? जब श्रद्धालुओं ने दशकों तक संघर्ष किया, तब उनका साथ कौन दे रहा था? आज वही लोग, जो कभी राम मंदिर आंदोलन को सांप्रदायिक रंग देते थे, आज मंदिर की पवित्रता की दुहाई दे रहे हैं। यह नैतिकता का कितना बड़ा पतन है, इसका अंदाजा आम नागरिक आसानी से लगा सकता है।

अंततः, सत्य और आस्था की जीत हमेशा होती है। राम मंदिर अपनी गरिमा और भव्यता के साथ खड़ा है और खड़ा रहेगा। चोरी की यह घटना एक आपराधिक घटना है, जिसे कानून सुलझा लेगा। लेकिन विपक्ष जिस राजनीतिक कालिख को आस्था के इस दीपक पर पोतने का प्रयास कर रहा है, वह उसकी अपनी राजनीतिक छवि को हमेशा के लिए दागदार कर देगी। विपक्ष को समझना होगा कि आस्था का अपमान और धर्म का सियासीकरण देश कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। राम मंदिर की छवि धूमिल करने का यह कुत्सित प्रयास उल्टा विपक्ष के अपने चेहरे पर लगी कालिख को ही उजागर कर रहा है। समय आ गया है कि विपक्ष अपने इस दोहरे चरित्र और गिरी हुई राजनीति से बाहर निकले, अन्यथा इतिहास उन्हें उसी जगह याद रखेगा, जहां वे कभी राम को ‘काल्पनिक’ बताकर खड़े थे। कानून दोषियों को दंड देगा, लेकिन जनता का न्यायालय विपक्ष की इस गिरी हुई मानसिकता को पहले ही दंडित कर चुका है।