विश्व बदला, परिषद क्यों नहीं?

The world has changed; why hasn't the Council?

डॉ. प्रियंका सौरभ

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना हुई, तब विश्व की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक परिस्थितियाँ आज से बिल्कुल भिन्न थीं। उस समय की वैश्विक शक्ति-संरचना के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का गठन किया गया, जिसमें पाँच देशों—अमेरिका, रूस (तत्कालीन सोवियत संघ), ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—को स्थायी सदस्यता तथा वीटो का विशेषाधिकार प्रदान किया गया। उस दौर में यह व्यवस्था वैश्विक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त मानी गई थी। किंतु लगभग आठ दशक बाद विश्व पूरी तरह बदल चुका है। उपनिवेशवाद का अंत हो चुका है, अनेक नए राष्ट्र अस्तित्व में आ चुके हैं, वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया की ओर स्थानांतरित हो रहा है, और अंतरराष्ट्रीय राजनीति एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय (Multipolar) व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि विश्व बदल चुका है, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना अब भी 1945 की वास्तविकताओं पर क्यों आधारित है?

आज सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग केवल ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का प्रयास नहीं है, बल्कि उसकी वैधता, प्रतिनिधित्व और कार्यात्मक विश्वसनीयता को बनाए रखने की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी वैश्विक चुनौतियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान सुरक्षा परिषद अनेक मामलों में प्रभावी और समयानुकूल निर्णय लेने में असमर्थ दिखाई देती है। ऐसे समय में भारत की स्थायी सदस्यता का प्रश्न केवल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक शासन प्रणाली के लोकतंत्रीकरण और संतुलन का मुद्दा बन गया है।

भारत की दावेदारी अनेक ठोस आधारों पर स्थापित है। विश्व की सबसे बड़ी आबादी और सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला भारत आज वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में इसके शीर्ष तीन अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। डिजिटल नवाचार, अंतरिक्ष विज्ञान, हरित ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवाओं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय-निर्माण में सक्रिय और जिम्मेदार भागीदार के रूप में उभरा है।

संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों में भारत का योगदान उसकी विश्वसनीयता को और मजबूत करता है। भारत दशकों से हजारों सैनिकों, चिकित्सकों और पुलिसकर्मियों को विभिन्न शांति मिशनों में भेजता रहा है। अनेक भारतीय सैनिकों ने विश्व शांति की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया है। यह योगदान केवल सैन्य उपस्थिति नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। विडंबना यह है कि जो देश संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों को सबसे अधिक व्यवहार में लागू करता रहा है, वही आज भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से वंचित है।

भारत की विदेश नीति भी उसकी दावेदारी को सुदृढ़ करती है। “वसुधैव कुटुम्बकम्”, “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” और “वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर” जैसे विचार केवल नारे नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक दृष्टि का प्रतिबिंब हैं। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ को प्रमुखता दी और अफ्रीकी संघ को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कोविड-19 महामारी के दौरान ‘वैक्सीन मैत्री’ कार्यक्रम तथा प्राकृतिक आपदाओं के समय मानवीय सहायता ने भारत की जिम्मेदार वैश्विक शक्ति की छवि को और सुदृढ़ किया।

यद्यपि भारत की दावेदारी अत्यंत मजबूत है, फिर भी सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया कई संरचनात्मक चुनौतियों से घिरी हुई है। सबसे पहली चुनौती संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की है। इसके लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ वर्तमान पाँचों स्थायी सदस्यों की स्वीकृति भी आवश्यक है। अर्थात् जिस व्यवस्था में परिवर्तन होना है, उसी व्यवस्था के लाभार्थियों की सहमति भी अनिवार्य है। यही सुधार प्रक्रिया की सबसे बड़ी विडंबना है।

दूसरी बड़ी चुनौती वीटो व्यवस्था है। यदि नए स्थायी सदस्यों को वीटो अधिकार दिया जाता है, तो निर्णय प्रक्रिया और अधिक जटिल हो सकती है। यदि उन्हें वीटो नहीं दिया जाता, तो स्थायी सदस्यता समान अधिकारों वाली नहीं रह जाएगी। इस दुविधा पर अब तक कोई वैश्विक सहमति नहीं बन सकी है। रूस-यूक्रेन और गाजा जैसे मामलों में वीटो के कारण सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता ने इस व्यवस्था की सीमाओं को उजागर किया है।

क्षेत्रीय राजनीति भी सुधार प्रक्रिया में बाधा बनती है। भारत की दावेदारी का पाकिस्तान विरोध करता है। जापान का चीन और दक्षिण कोरिया विरोध करते हैं, जबकि जर्मनी और ब्राज़ील को भी अपने-अपने क्षेत्रों में विरोध का सामना करना पड़ता है। इसी कारण ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (Uniting for Consensus) समूह स्थायी सदस्यता के विस्तार का विरोध करता है और केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की वकालत करता है। इससे स्पष्ट है कि सुधार का प्रश्न केवल योग्यता का नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी है।

वर्तमान पाँच स्थायी सदस्य भी अपने-अपने रणनीतिक हितों के अनुरूप सुधार का समर्थन करते हैं। कोई भी ऐसा परिवर्तन नहीं चाहता जिससे उसकी शक्ति या प्रभाव कम हो। यही कारण है कि दशकों से सुधार की आवश्यकता स्वीकार किए जाने के बावजूद कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी है। यह स्थिति संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

हालाँकि यह भी समझना होगा कि केवल नए स्थायी सदस्य जोड़ देना पर्याप्त समाधान नहीं होगा। सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व भी आवश्यक हैं। वीटो शक्ति के दुरुपयोग पर नियंत्रण, विकासशील देशों की प्रभावी भागीदारी और निर्णय प्रक्रिया में अधिक संतुलन लाए बिना सुधार अधूरा रहेगा। यदि केवल सदस्य बढ़ा दिए जाएँ और कार्यप्रणाली यथावत बनी रहे, तो सुरक्षा परिषद की मूल समस्याएँ बनी रहेंगी।

आज का विश्व 1945 का विश्व नहीं है। वैश्विक शक्ति का केंद्र बदल चुका है, विकासशील देशों की भूमिका बढ़ चुकी है और वैश्विक दक्षिण अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि नीति-निर्माता बनना चाहता है। भारत इसी परिवर्तन का सबसे सशक्त प्रतिनिधि है। उसकी स्थायी सदस्यता केवल एक देश की आकांक्षा नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था में न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व की मांग है।

अंततः, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार केवल इतिहास की त्रुटियों को सुधारने का प्रयास नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय, समावेशी और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। यदि संयुक्त राष्ट्र समय के साथ स्वयं को बदलने में असफल रहता है, तो उसकी प्रासंगिकता और प्रभावशीलता दोनों पर गंभीर प्रश्न उठेंगे। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद का व्यापक और सार्थक सुधार अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। विश्व बदल चुका है; अब परिषद को भी बदलना ही होगा।