अजय कुमार
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) इन दिनों एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ मैदान के प्रदर्शन से कहीं ज़्यादा चर्चा मैदान के बाहर की जा रही है। प्रशंसकों, पूर्व क्रिकेटरों और खेल विशेषज्ञों के बीच टीम चयन का मुद्दा एक बड़ा सवालिया निशान बन चुका है। क्या भारतीय टीम का चयन वास्तव में योग्यता के आधार पर हो रहा है, या इसके पीछे कोई अन्य समीकरण काम कर रहे हैं? यह बहस केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि अब मुख्यधारा की चर्चाओं में भी जगह बना चुकी है।भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के बीच सबसे बड़ी टीस इस बात की है कि चयन का कोई स्पष्ट पैमाना (क्राइटेरियन) दिखाई नहीं देता। अक्सर देखा जाता है कि खिलाड़ी अपनी फॉर्म के चरम पर होने के बावजूद नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं, जबकि कुछ को उनके खराब दौर में भी निरंतर समर्थन मिलता है। जब टीम मैनेजमेंट और चयनकर्ताओं के बीच मतभेद की खबरें सामने आती हैं, तो यह भ्रम और गहरा हो जाता है।टीम चयन में उपेक्षा के सबसे चर्चित मामलों में कुलदीप यादव का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। एक ऐसे स्पिनर, जिसने अपनी विविधता और विकेट लेने की क्षमता से दुनिया भर में लोहा मनवाया है, उसे अक्सर प्लेइंग इलेवन से बाहर रखा जाना प्रशंसकों के गले नहीं उतरता। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कुलदीप को लगातार मौके नहीं मिलते, तो यह न केवल खिलाड़ी का आत्मविश्वास तोड़ता है, बल्कि टीम को एक मैच-विनर से भी दूर रखता है। बल्लेबाजी की गहराई के नाम पर अक्सर गेंदबाजों के साथ जो तिगड़म बिठाया जाता है, वह खेल की मूल आत्मा के साथ समझौता जैसा लगता है।
हाल के समय में सबसे अधिक चर्चा अनुभवी दिग्गजों, रोहित शर्मा और विराट कोहली, के साथ बोर्ड के व्यवहार को लेकर रही है। चाहे कप्तानी से हटाए जाने का नाटकीय घटनाक्रम हो या फिर संन्यास की खबरों के बीच उनकी भूमिका पर स्पष्टता का अभाव, इन दिग्गज खिलाड़ियों के सम्मान और भविष्य को लेकर बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। बॉलीवुड अभिनेत्री अमीषा पटेल जैसी सार्वजनिक हस्तियों का इस पर खुलकर बोलना यह दर्शाता है कि क्रिकेट अब केवल बोर्ड का निजी मामला नहीं रहा।बोर्ड के भीतर की राजनीति पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। चयन समिति की बैठकों में बोर्ड पदाधिकारियों के कथित हस्तक्षेप की खबरें अक्सर मीडिया की सुर्खियां बनती हैं। जब चयनकर्ताओं को यह हिदायत दी जाती है कि वे खिलाड़ियों के भविष्य या टीम संयोजन से जुड़ी बातें सार्वजनिक न करें, तो यह पारदर्शिता के बजाय रहस्यमयता पैदा करता है। इसके अलावा, संजू सैमसन जैसे खिलाड़ियों का टीम से अंदर-बाहर होना भी चयन समिति की रणनीति पर सवाल उठाता है।एक तरफ युवा खिलाड़ी, जैसे वैभव सूर्यवंशी, को लेकर उम्मीदें हैं, तो दूसरी ओर उनके व्यवहार और प्रदर्शन के बीच संतुलन बनाने में बोर्ड का संघर्ष भी दिख रहा है। ऐसा लगता है कि ‘भारतीय क्रिकेट में सब कुछ ठीक नहीं है’ का अहसास केवल एक अफवाह नहीं, बल्कि चयन में दिख रही निरंतर असंगति का परिणाम है।यदि बीसीसीआई को प्रशंसकों का भरोसा बनाए रखना है और टीम को विश्व स्तर पर एक अविजित इकाई के रूप में स्थापित करना है, तो चयन प्रक्रिया में स्पष्टता और योग्यता को सर्वोपरि रखना होगा। खिलाड़ियों को यह महसूस होना चाहिए कि उनका चयन उनके प्रदर्शन की बदौलत है, न कि किसी के पसंदीदा होने या बोर्ड की अंदरूनी राजनीति के कारण। टीम इंडिया के लिए आगे का रास्ता तभी आसान होगा, जब चयन का पैमाना सिर्फ और सिर्फ ‘मैच जिताने की क्षमता’ हो, न कि कोई और आधार।





