जगराम गुर्जर
सावन का महीना आते ही देश का वातावरण बदलने लगता है। मंदिरों में घंटियां गूंजती हैं, कांवड़ यात्राएं निकलती हैं, लोक गीतों की स्वर लहरियां हवा में घुल जाती हैं और गांवों से लेकर बड़े शहरों तक मेलों की रौनक छा जाती है। उत्तरी भारत के राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तखरांड समेत देश के अनेक राज्यों में सावन के अवसर पर लगने वाले मेले केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं होते बल्कि वे भारत की लोक संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के जीवंत केंद्र भी हैं।
जब हम किसी मेले में जाते हैं तो हमारी नजर सबसे पहले झूलों, दुकानों, रंग-बिरंगी रोशनी और भीड़ पर पड़ती है लेकिन इन सबके पीछे हजारों-लाखों परिवारों का श्रम, उम्मीद और आजीविका छिपी होती है। मेला समाप्त होने के बाद भी इन्हीं कमाई के सहारे अनेक परिवार कई महीनों तक अपना जीवन चलाते हैं। कोई भी एक मेला अपने भीतर रोजगार की पूरी श्रृंखला समेटे रहता है। विशाल झूले लगाने वाले परिवार, बच्चों के मनोरंजन के साधन संचालित करने वाले लोग, खिलौने बेचने वाले छोटे व्यापारी, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार, लकड़ी और बांस के कारीगर, चूडिय़ां, बिंदी, कपड़े, पूजा सामग्री और घरेलू उपयोग की वस्तुएं बेचने वाले दुकानदार, ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, खाने-पीने की चीजें बेचने वाले परिवार, लोक कलाकार, कठपुतली नचाने वाले, जादूगर, नट, बहरूपिए और हस्तशिल्पी आदि सभी के लिए मेला कमाई का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है।
विशेष रूप से ग्रामीण और कुटीर उद्योगों के लिए मेले किसी बड़े बाजार से कम नहीं हैं। गांवों में तैयार होने वाले हस्तनिर्मित उत्पादों की पहुंच अक्सर बड़े शहरों तक नहीं बन पाती, पर वे मेलों के माध्यम से सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचते हैं। इससे न केवल उत्पादों की बिक्री होती है बल्कि कारीगरों को अपनी कला दिखाने और नए ग्राहक बनाने का अवसर भी मिलता है। इसी कारण अनेक परिवार पूरे वर्ष सावन, नवरात्र, दशहरा, दीपावली आदि पर्वों पर लगने वाले मेलों की तैयारी करते रहते हैं। आज जब ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘स्वदेशी उत्पादों’ को बढ़ावा देने की बात हो रही है, तब मेलों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां खरीदा गया एक हस्तनिर्मित खिलौना, मिट्टी का दीपक, बांस की टोकरी, हाथ से बनी चूडिय़ां या गांव की महिलाओं द्वारा तैयार कोई घरेलू उत्पाद केवल एक वस्तु नहीं होता बल्कि वह किसी परिवार की मेहनत, हुनर और सम्मान का प्रतीक होता है। हमारी छोटी-सी खरीद भी किसी कारीगर के घर में खुशियां ला सकती है। इन मेलों से होने वाला आर्थिक लाभ केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहता। ट्रांसपोर्ट, टेंट, बिजली, सजावट, ध्वनि व्यवस्था, सफाई, स्थानीय मजदूर, होटल, ढाबे, चाय की दुकानें, ऑटो रिक्शा और अन्य अनेक छोटे व्यवसाय भी इससे जुड़े होते हैं। एक बड़ा मेला अपने आसपास के पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति देता है।
दुर्भाग्य से आधुनिक मॉल संस्कृति और ऑनलाइन खरीदारी के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक मेलों से जुड़े अनेक परिवार चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बढ़ती लागत, सीमित सुविधाएं, मौसम की अनिश्चितता और बदलती उपभोक्ता आदतों ने उनकी मुश्किलें बढ़ाई हैं। ऐसे समय में यदि हम लोग इन मेलों को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखे तो यह लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
यहां कहने का अभिप्राय यह नहीं कि लोग केवल सहानुभूति के कारण खरीदारी करें बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि हम यह समझें कि स्थानीय उत्पाद खरीदना, हस्तशिल्प को प्रोत्साहित करना और मेले से जुड़े छोटे कारोबारियों का सम्मान करना हमारी सांस्कृतिक और आर्थिक जिम्मेदारी भी है। इससे गांवों में रोजगार मजबूत होगा, पारंपरिक कौशल सुरक्षित रहेंगे और नई पीढ़ी भी अपने पुश्तैनी हुनर से जुड़ी रहेगी। यह हमारी धरोहर है और इसे कायम रखना हम सबका दायित्व है।
सावन के मेले हमें केवल आस्था, उल्लास और लोक संस्कृति का अनुभव ही नहीं कराते बल्कि यह भी याद दिलाते हैं कि भारत की असली ताकत उसके गांवों, कारीगरों और मेहनतकश लोगों में बसती है। इस सावन जब भी किसी मेले में जाएं, वहां की रौनक का आनंद लें, लोक कलाकारों का उत्साह बढ़ाएं और यदि संभव हो तो स्थानीय कारीगरों व छोटे व्यापारियों से कुछ खरीदकर लौटें। हो सकता है, आपकी एक छोटी-सी खरीद किसी परिवार की बड़ी उम्मीद बन जाए। यही हमारे मेलों की सबसे बड़ी सामाजिक और आर्थिक सार्थकता है। हमारे समाज का इतिहास परस्पर सहयोग पर टिके रहने का है। इस बात को विस्मृत करने की नहीं बल्कि हमेशा याद रखने की जरूरत है।
(लेखक मेला आयोजकों के संगठन भारतीय मेला एसोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)





