जब नारों में गालियाँ उतर आएँ

When slogans descend into abuse

डॉ. प्रियंका सौरभ

लोकतंत्र की सबसे सुंदर पहचान यह है कि यहाँ असहमति को अपराध नहीं माना जाता। यहाँ प्रश्न पूछना विद्रोह नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक होने का प्रमाण है। सड़कों पर उतरकर अपनी बात कहना, सत्ता से जवाब माँगना और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन वही आत्मा तब घायल होने लगती है जब नारों में विचारों की जगह गालियाँ उतर आती हैं, जब विरोध का स्वर मर्यादा छोड़कर अपमान का रूप धारण कर लेता है और जब क्रांति की भाषा सभ्यता से विमुख होकर कटुता की भाषा बन जाती है।

नारा केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं होता। वह किसी आंदोलन का चेहरा होता है, उसकी आत्मा का स्वर होता है। आने वाली पीढ़ियाँ आंदोलनों को उनके नारों से याद करती हैं। “इंकलाब ज़िंदाबाद”, “करो या मरो”, “जय जवान, जय किसान” जैसे नारे इसलिए अमर हुए क्योंकि उनमें किसी व्यक्ति का अपमान नहीं था, बल्कि एक विचार, एक संकल्प और एक युग की पुकार थी। शब्द जब उद्देश्य से जुड़ते हैं तो इतिहास बनते हैं, और जब वे केवल अपमान का माध्यम बन जाते हैं तो क्षणिक शोर से अधिक कुछ नहीं रह जाते।

आज का समय शोर का समय है। सोशल मीडिया ने हर आवाज़ को मंच दिया है, लेकिन साथ ही हर उत्तेजना को भी विस्तार दिया है। अब जो सबसे अधिक तीखा बोलता है, वही सबसे अधिक सुना जाता है। संयम को कमजोरी और शालीनता को निष्क्रियता समझने की भूल बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि कई आंदोलनों में तर्कों की जगह ताने, संवाद की जगह व्यंग्य और विरोध की जगह गालियाँ सुनाई देने लगी हैं। यह केवल भाषा का पतन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कारों का क्षरण है।

गाली कभी भी विचार का विकल्प नहीं हो सकती। जिसके पास तर्क समाप्त हो जाते हैं, वह अक्सर अपशब्दों का सहारा लेता है। विचारों की लड़ाई में भाषा जितनी ऊँची होगी, आंदोलन उतना ही ऊँचा उठेगा। लेकिन यदि भाषा ही गिर जाए तो सबसे बड़ा उद्देश्य भी अपनी गरिमा खो देता है। किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति उसके नारों की ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसकी भाषा की गरिमा से मापी जाती है।

भारतीय सभ्यता ने वाणी को तप कहा है। हमारे ऋषियों ने कहा कि शब्द बाण भी बन सकते हैं और मरहम भी। वे समाज को जोड़ भी सकते हैं और तोड़ भी सकते हैं। इसलिए वाणी पर संयम को चरित्र का आभूषण माना गया। राजनीति यदि समाज का दर्पण है तो आंदोलनों की भाषा उस दर्पण का प्रतिबिंब है। यदि प्रतिबिंब में केवल कटुता दिखाई दे रही है, तो यह केवल आंदोलन की नहीं, पूरे समाज की चिंता है।

यह भी सत्य है कि हर आंदोलन में हजारों-लाखों लोग होते हैं। कुछ व्यक्तियों के अनुचित व्यवहार से पूरे आंदोलन का मूल्यांकन उचित नहीं होगा। किंतु नेतृत्व की परीक्षा भी ऐसे ही क्षणों में होती है। भीड़ को दिशा देना केवल मंच से भाषण देने का कार्य नहीं, बल्कि उसकी भाषा को मर्यादित रखना भी नेतृत्व की जिम्मेदारी है। जो नेतृत्व अपमानजनक नारों पर मौन रहता है, वह अनजाने में उन्हें स्वीकार भी कर लेता है।

इतिहास बताता है कि सबसे प्रभावशाली आंदोलनों ने अपने विरोधियों को भी गरिमा से संबोधित किया। महात्मा गांधी का संघर्ष ब्रिटिश शासन के विरुद्ध था, ब्रिटिश जनता के विरुद्ध नहीं। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने तीखे मतभेदों के बावजूद संवैधानिक भाषा नहीं छोड़ी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने व्यवस्था परिवर्तन की बात की, व्यक्तियों के अपमान की नहीं। यही कारण है कि उनके आंदोलनों की स्मृति सम्मान के साथ जीवित है।

आज आवश्यकता केवल सरकारों को बदलने की नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद की भाषा को बचाने की है। लोकतंत्र संसद में जितना जीवित रहता है, उतना ही सड़कों पर भी साँस लेता है। यदि सड़क पर संवाद मर जाएगा, तो संसद की बहसें भी खोखली हो जाएँगी। यदि विरोध का अर्थ केवल अपमान रह जाएगा, तो सहमति की कोई संभावना नहीं बचेगी। लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूँजी संवाद है, और संवाद की पहली शर्त है—सम्मान।

हमें यह भी समझना होगा कि बच्चे और युवा केवल पुस्तकों से नहीं, समाज से भी सीखते हैं। जब वे टीवी और मोबाइल की स्क्रीन पर आंदोलनों में गालियाँ सुनते हैं, तो उनके मन में यह धारणा बनती है कि शायद यही संघर्ष की भाषा है। यह लोकतंत्र की अगली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यदि हम उन्हें विचारों की संस्कृति नहीं देंगे, तो वे शोर की संस्कृति को ही सामान्य मान बैठेंगे।

लोकतंत्र किसी की जीत और किसी की हार का नाम नहीं है। यह मतभेदों के बीच सह-अस्तित्व की कला है। यहाँ विरोधी शत्रु नहीं होता, केवल वैचारिक प्रतिद्वंद्वी होता है। इसलिए शब्दों की मर्यादा केवल भाषाई शिष्टाचार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण है।

समय आ गया है कि हम अपने आंदोलनों को फिर से उनकी मूल आत्मा लौटाएँ। नारे ऐसे हों जिनमें विचार की चमक हो, आक्रोश हो तो भी संयम के साथ हो, असहमति हो तो भी सम्मान के साथ हो। क्योंकि इतिहास यह नहीं याद रखता कि किसने सबसे ऊँची आवाज़ में गाली दी थी; इतिहास उसे याद रखता है जिसने सबसे कठिन समय में भी अपनी भाषा की गरिमा बचाए रखी।

लोकतंत्र तलवार की धार पर नहीं, शब्दों की विश्वसनीयता पर चलता है। यदि शब्द घायल हो जाएँ, तो संस्थाएँ भी देर तक सुरक्षित नहीं रह सकतीं। इसलिए जब अगली बार कोई आंदोलन सड़क पर उतरे, तो उसके हाथों में तख्तियाँ हों, आँखों में उम्मीद हो, आवाज़ में दृढ़ता हो—पर शब्दों में मर्यादा अवश्य हो। क्योंकि विचारों की विजय अपमान से नहीं, संवाद से होती है; और लोकतंत्र की सबसे ऊँची आवाज़ वही है जिसमें असहमति तो हो, लेकिन अमर्यादा न हो।