छात्र आंदोलन का जंतर मंतर से राष्ट्रव्यापी हो जाना

The student movement expanding from Jantar Mantar to a nationwide scale

नरेंद्र तिवारी

जंतर मंतर से शुरू हुए छात्र आंदोलन का महज 25 दिनों मे राष्ट्रव्यापी हो जाना राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का विषय हो सकता है। अध्ययन के साथ यह सरकार के सोचने का विषय भी है की ज़ब देश मे चारो तरफ गुड़ फील महसूस किया जा रहा है, तो फिर ये अचानक देश की जनता को क्या हुआ जो सरकार के विरोध मे इतने बड़े स्तर पर आंदोलित होने लगी। छात्रों का यह आंदोलन 20 से 25 दिनों मे भारत के आमजन का आंदोलन कैसे बन गया। सोच विचार और अध्ययन का विषय यह भी हो सकता है, ज़ब देश के मिडिया का बड़ा हिस्सा छात्रों के आंदोलन की गतिविधियों को प्रचारित और प्रकाशित करने से गुरेज कर रहा हो, तब इतने अल्प समय मे काकरोच जनता पार्टी का सन्देश गाँव-गांव, घर-घर तक कैसे पहुंचा, छात्र सहित छात्रों के अभिभावको ने इस आंदोलन को अपना समर्थन देने का निर्णय लिया। आखिर कैसे जंतर मंतर पहुंचने के आह्वान पर सम्पूर्ण भारत से लोग बिना किसी प्रबंध के स्वविवेक से निर्भय होकर दिल्ली के आंदोलन मे शामिल होने लगे, जो दिल्ली नहीं जा सके उन्होंने अपने शहर के आंदोलन मे जाना उचित समझा।

आंदोलन किसी निश्चित उद्देश्य या विचार की पूर्ति के लिए लोगो द्वारा किया गया संगठित और सामूहिक प्रयास होता है। इसका मुख्य उद्देश्य अन्याय, शोषण, अव्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करना समाज, राजनीति और अर्थ व्यवस्था मे बदलाव लाना होता है। दिल्ली के जंतर मंतर पर उभरा आंदोलन शिक्षा व्यवस्था मे आमूलचूल परिवर्तन, नीट पेपर लिक मामले मे 22 छात्रों की आत्महत्याएं और लाखों छात्रों के अंधकार मे डूबते भविष्य की जवाबदेही लेते हुए भारत के शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तिफे की मांग को लेकर शुरू हुआ। यह आंदोलन नव गठित काकरोच जनता पार्टी के बैनर तले शुरू हुआ।

जैसा की सत्ता पर काबिज दल की नीति है, अपने खिलाफ उठी आवाज को राष्ट्र विरोधी बताकर भयभीत किया जाता रहा है। अपनी आदत अनुसार विदेशी फंडिंग, डपली वाली गैंग, अर्बन नक्सल, आंदोलन जीवी, आतंकवादी जैसे शब्दों से सम्बोधित किया जाने लगा। अभिजीत दीपके सहित तमाम छात्रों को विदेशी ऐजेंट बताया जाने लगा। ज़ब इस आंदोलन को पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुग ने समर्थन किया, वें अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे तो उन्हें भारत विरोधी चीन का जासूस कहना आरम्भ कर दिया। यह शब्द भारतीय जनमानस को चुभने लगे। तिरंगा हाथ मे उठाकर भारत माता की जय जयकार करने वाले, देशभक्ति के तरानों पर झूमने वाले, अपने हाथों मे भगतसिंह और अम्बेडर की तस्वीर टाँगे युवाओं को सत्ताधारी दल के नेताओं द्वारा लगातार अपमानित करना देश के छात्रों और आमजन को नागवार गुजरा।

सोनम वांगचुग को भूख हड़ताल से जबरदस्ती उठाना भी आग मे घी का काम कर गया। सोश्यल मिडिया जंतर मंतर के वीडियो और संदेशो से भर गया। सरकार का आंदोलन को कुचलने के लिए सबसे बड़ा प्रयास एवं अलोकतान्त्रिक रवैय्या ज़ब सामने आया ज़ब 20 जुलाई को चलो संसद अभियान मे देश भर से शामिल छात्र-छात्राओं और आमजन पर बर्बरता पूर्वक लाठी चार्ज किया गया, अश्रुगैस के गोले छोड़े गए, रबर की गोलियों से हजारों छात्र-छात्राओं को घायल किया गया। दिल्ली पुलिस की इस बर्बरता पूर्ण कार्यवाही के बाद देश भर मे सरकार के प्रति आमजन का गुस्सा फुट पड़ा।

जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन की सबसे बड़ी बात यह रही की यहाँ से वैज्ञानिक सोनम वांगचुग सहित, आंदोलन के कर्ता धर्ताओं ने गांधीगिरी को अपना हथियार बनाया पुलिस की सख़्ती के बावजूद देश की जनता से आंदोलन मे शामिल होने की अपील की जाती रही। जंतर मंतर के आंदोलनकारी देश के सामने सरकार की शिक्षा नीति मे दोष, इसमे परिवर्तन की संभावना, नीट पेपर लिक मामले मे सरकार की विफलता बताने मे कामयाब हुए। सोश्यल मिडिया पर चल रहे इस वैचारिक छात्र आंदोलन को सरकार और गोदी मिडिया लगातार दबाने के प्रयास करता रहा।

इस आंदोलन मे छात्रों की मुखरता, निडरता और प्रतिबद्धता के साथ सरकार के सख्त रुख से टकराने की भावना आमजन मे आंदोलन मे शामिल होने और छात्रों के साथ खडे रहने की भावना पैदा कर गयी। जंतर मंतर के छात्र आंदोलन मे अनेको विरोधी विचारों के बावजूद भी देश प्रथम की भावना देखी गयी। आंदोलन के राष्ट्रव्यापी होने के बहुत से कारणों मे आंदोलनकारियों का प्रजातंत्र के मुख्य अस्त्र हड़ताल, भूख हड़ताल, आमरण अनशन और गांधीगिरी मे प्रबल विश्वास देखा गया। भारतीय संविधान, महापुरुषो और प्रजातात्रिक तौर तरीको ने इस आंदोलन को सरकार की सख़्ती और राष्ट्रीय मिडिया की अनदेखी के बावजूद भी जन आंदोलन मे बदलने मे सफलता मिल पाई है। इसे सफल कहने के पीछे अब आंदोलन के प्रति सरकार का उदार होना देश के प्रधानमंत्री द्वारा संदेश के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था मे सुधार के कदमो का जिक्र करना, सबसे बड़ी बात आंदोलनकारियों से संवाद स्थापित करने के प्रयास करना शामिल है। देश के हुक्मरानो को यह याद रखना चाहिए की सरकार प्रजातंत्र की देन है। प्रजातात्रिक तौर तरीको से ही चलाई जाना चाहिए। ज़ब सरकार मे जवाबदेही की भावना खत्म हो जाती है, तब ऐसे प्रजातांत्रिक आंदोलन जन्म लेते है। इतिहास गवाह है, स्वतंत्र भारत मे सरकार किसी भी दल या विचारों की हो, प्रजातांत्रिक मूल्यों पर कुठराघात देश की जनता सहन नहीं करती है।