“केंद्रीय मंत्रिमंडल के दो महत्वपूर्ण निर्णयों से औद्योगिक विकास,रोजगार, निवेश और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया आधार
विनोद सिंह ‘तकियावाला‘‘
किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल उसकी आर्थिक वृद्धि दर से नहीं आँकी जाती,बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने भविष्य के लिए कितनी दूरदृष्टि के साथ आधारभूत संरचना का निर्माण कर रहा है।आधुनिक रेल नेटवर्क, सुदृढ़ औद्योगिक व्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधान,उन्नत विनिर्माण क्षमता और निवेश के अनुकूल वातावरण किसी भी विकसित राष्ट्र की पहचान होते हैं।भारत आज इसी दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है।पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने जिन क्षेत्रों को सर्वाधिक प्राथमिकता दी है,उनमें रेल, सड़क,ऊर्जा, डिजिटल अवसंरचना और विनिर्माण प्रमुख हैं।इन क्षेत्रों में हो रहा निवेश केवल वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर रहा, बल्कि विकसित भारत- 2047 की आधारशिला भी रख रहा है।इसी सोच के अनुरूप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।पहला निर्णय कर्नाटक के बल्लारी– गुंटकल रेलखंड पर तीसरी और चौथी रेल लाइन के निर्माण का है,जबकि दूसरा निर्णय देश के रसायन उद्योग को नई दिशा देने वाली ‘भव्य रसायन योजना’ को स्वीकृति प्रदान करने का है। इन दोनों परियोजनाओं पर कुल 4,294 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा।इनमें 1,264 करोड़ रुपये रेल परियोजना तथा 3,030 करोड़ रुपये रसायन क्षेत्र के विकास के लिए निर्धारित किए गए हैं।दोनों निर्णय अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े अवश्य हैं,किंतु उनका उद्देश्य एक ही है—भारत की उत्पादन क्षमता बढ़ाना, उद्योगों को गति देना,रोजगार के अवसरों का विस्तार करना और देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक सक्षम बनाना।आज भारतीय रेल विश्व के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है। प्रतिदिन करोड़ों यात्री और विशाल मात्रा में माल भारतीय रेल के माध्यम से अपने गंतव्य तक पहुँचता है।देश की अर्थव्यवस्था में रेलवे की भूमिका केवल परिवहन तक सीमित नहीं है कृषि,खनन,इस्पात,ऊर्जा, विनिर्माण और निर्यात जैसे लगभग सभी प्रमुख क्षेत्र रेलवे पर निर्भर हैं।इसलिए जहाँ भी रेल नेटवर्क पर क्षमता से अधिक दबाव दिखाई देता है,वहाँ उसका विस्तार राष्ट्रीय आवश्यकता बन जाता है।बल्लारी–गुंटकल रेलखंड दक्षिण भारत के सबसे व्यस्त रेल मार्गों में शामिल है।कर्नाटक का बल्लारी क्षेत्र लौह अयस्क,इस्पात उद्योग और खनिज संपदा के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। दूसरी ओर गुंटकल भारतीय रेल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण जंक्शन है,जहाँ से दक्षिण,पश्चिम और मध्य भारत को जोड़ने वाले अनेक रेल मार्ग गुजरते हैं। यही कारण है कि इस रेलखंड पर मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों का दबाव लगातार बढ़ता गया है।कई बार ट्रेनों को क्रॉसिंग या सिग्नल की प्रतीक्षा में रुकना पड़ता है, जिससे समय और संसाधनों दोनों की हानि होती है।ऐसी स्थिति में तीसरी और चौथी रेल लाइन के निर्माण का निर्णय दूरगामी महत्व रखता है। अतिरिक्त लाइनों के निर्माण से इस मार्ग की वहन क्षमता बढ़ेगी। मालगाड़ियों की आवाजाही तेज होगी,उद्योगों को समय पर कच्चा माल और तैयार उत्पादों के परिवहन की सुविधा मिलेगी तथा यात्री ट्रेनों का संचालन भी अधिक सुचारु और समयबद्ध हो सकेगा।इससे रेलवे की परिचालन क्षमता में वृद्धि होगी और लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आएगी।रेलवे का विस्तार केवल पटरियाँ बिछाने का कार्य नहीं होता।इसके साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था भी गति पकड़ती है। निर्माण कार्यों में बड़ी संख्या में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं।सीमेंट, इस्पात, विद्युत उपकरण, मशीनरी और निर्माण सामग्री से जुड़े अनेक उद्योगों को भी लाभ मिलता है। परियोजना पूरी होने के बाद व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं,निवेश आकर्षित होता है और क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलती है। यही कारण है कि रेल अवसंरचना में किया गया निवेश कई गुना आर्थिक लाभ उत्पन्न करने वाला माना जाता है।बल्लारी क्षेत्र का महत्व केवल खनिज संपदा तक सीमित नहीं है।यह भारत के इस्पात उद्योग का एक प्रमुख आधार भी है। यहाँ उत्पादित लौह अयस्क और इस्पात देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ निर्यात के लिए भी भेजे जाते हैं।यदि परिवहन व्यवस्था अधिक सक्षम होगी तो उद्योगों की उत्पादन लागत कम होगी,प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकेंगे।यही कारण है कि सरकार रेल अवसंरचना को औद्योगिक विकास का सबसे महत्वपूर्ण आधार मानते हुए निरंतर निवेश बढ़ा रही है।
यह परियोजना प्रधानमंत्री गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान की अवधारणा को भी मजबूती प्रदान करती है।इस योजना का उद्देश्य देश के विभिन्न परिवहन माध्यमों को एकीकृत कर ऐसा आधुनिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार करना है, जिससे उद्योगों और व्यापार को तेज,सुरक्षित तथा किफायती परिवहन सुविधा उपलब्ध हो सके। जब रेल,सड़क,बंदरगाह और औद्योगिक गलियारे एक-दूसरे से बेहतर ढंग से जुड़ेंगे, तब भारत की आर्थिक क्षमता स्वतः कई गुना बढ़ जाएगी।रेल अवसंरचना के विस्तार का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण संरक्षण भी है।सड़क मार्ग की अपेक्षा रेल परिवहन अधिक ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण अनुकूल माना जाता है।माल परिवहन का बड़ा हिस्सा यदि रेल के माध्यम से होगा तो भारी वाहनों की संख्या कम होगी,ईंधन की बचत होगी और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी। जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती के बीच यह निर्णय भारत की हरित विकास नीति के अनुरूप भी माना जा सकता है।केंद्रीय मंत्रिमंडल का दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय ‘भव्य रसायन योजना’ को स्वीकृति देना है। यद्यपि इस योजना का विस्तृत स्वरूप आने वाले समय में और स्पष्ट होगा, फिर भी इतना निश्चित है कि 3,030 करोड़ रुपये का यह निवेश भारत के रसायन M उद्योग को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।रसायन उद्योग किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था का आधार माना जाता है,क्योंकि कृषि से लेकर औषधि,वस्त्र,रक्षा, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा तक लगभग प्रत्येक क्षेत्र किसी न किसी रूप में इस उद्योग पर निर्भर है।रसायन उद्योग को किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। कृषि के लिए उर्वरक, स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए औषधियाँ, वस्त्र उद्योग के लिए कृत्रिम रेशे, ऑटोमोबाइल के लिए विशेष रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए उच्च गुणवत्ता वाले केमिकल, रक्षा उत्पादन, निर्माण कार्य, खाद्य प्रसंस्करण तथा ऊर्जा क्षेत्र—शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से रसायन उद्योग पर निर्भर न हो। यही कारण है कि विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ इस क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और निवेश को सर्वोच्च प्राथमिकता देती हैं। भारत भी अब इसी दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत ‘भव्य रसायन योजना’ इसी व्यापक दृष्टिकोण का परिणाम है। लगभग 3,030 करोड़ रुपये की इस योजना का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि देश में उच्च गुणवत्ता वाले रसायनों के निर्माण, अनुसंधान, आधुनिक प्रौद्योगिकी के विकास और वैश्विक निवेश को आकर्षित करने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना है। पिछले कुछ वर्षों में भारत का रसायन उद्योग तेज़ी से विकसित हुआ है, किंतु अभी भी अनेक विशेष रसायनों और उच्च तकनीक वाले रासायनिक उत्पादों के लिए देश को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इस योजना से उस निर्भरता को कम करने में सहायता मिलेगी और घरेलू उद्योगों को नई प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति प्राप्त होगी।विश्व की बदलती आर्थिक परिस्थितियों में वैश्विक कंपनियाँ अपनी आपूर्ति श्रृंखला का विस्तार कर रही हैं। भारत को एक विश्वसनीय विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने का यह सबसे उपयुक्त समय है। राजनीतिक स्थिरता, विशाल उपभोक्ता बाजार, कुशल मानव संसाधन और निरंतर बेहतर होती आधारभूत संरचना भारत की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। ऐसे समय में रसायन क्षेत्र में यह निवेश विदेशी कंपनियों के लिए भी सकारात्मक संदेश माना जाएगा। इससे देश में नई औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित होंगी, प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण होगा और निर्यात की संभावनाएँ भी बढ़ेंगी।
इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव रोजगार के क्षेत्र में दिखाई देगा। रसायन उद्योग श्रम-प्रधान होने के साथ-साथ तकनीक आधारित भी है। नई परियोजनाओं के प्रारंभ होने से वैज्ञानिकों, अभियंताओं, तकनीशियनों, कुशल श्रमिकों तथा सहायक सेवाओं से जुड़े लाखों लोगों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे। इसके साथ-साथ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को भी नए व्यापारिक अवसर प्राप्त होंगे। किसी बड़े उद्योग की स्थापना केवल एक कारखाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसके साथ परिवहन, पैकेजिंग, मशीन निर्माण, रखरखाव, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र की अनेक गतिविधियाँ भी विकसित होती हैं।यदि रेल परियोजना और रसायन योजना को एक साथ देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि दोनों निर्णय एक-दूसरे के पूरक हैं। उद्योगों को विकसित करने के लिए आधुनिक उत्पादन व्यवस्था जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक तेज़ और किफायती परिवहन व्यवस्था भी है। यदि कारखानों में उत्पादन बढ़े और उसे समय पर बाजार तक पहुँचाने की व्यवस्था न हो, तो औद्योगिक विकास की गति स्वतः धीमी पड़ जाती है। इसी प्रकार यदि परिवहन व्यवस्था आधुनिक हो लेकिन उद्योगों का विस्तार न हो, तब भी आर्थिक गतिविधियाँ अपेक्षित गति नहीं पकड़ पातीं। केंद्रीय मंत्रिमंडल के ये दोनों निर्णय इसी संतुलित विकास दृष्टि का परिचायक हैं।
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने अवसंरचना विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। रेलवे के आधुनिकीकरण, समर्पित माल गलियारों, वंदे भारत ट्रेनों, अमृत भारत स्टेशन योजना, गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान, औद्योगिक कॉरिडोर और विनिर्माण क्षेत्र में लगातार हो रहे निवेश ने भारत की विकास यात्रा को नई दिशा दी है। अब रसायन क्षेत्र में यह पहल उस श्रृंखला की एक और महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आई है।इन निर्णयों का प्रभाव केवल संबंधित क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा। बेहतर रेल संपर्क से कृषि उत्पादों, खनिजों, इस्पात और अन्य औद्योगिक वस्तुओं का परिवहन अधिक तेज़ और कम लागत पर होगा। दूसरी ओर रसायन उद्योग की मजबूती से दवा उद्योग, कृषि, वस्त्र, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उत्पादन जैसे अनेक क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। इसका सकारात्मक प्रभाव अंततः देश की समग्र अर्थव्यवस्था और आम नागरिक के जीवन पर भी दिखाई देगा।
आज विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ केवल प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर नहीं,बल्कि मजबूत अवसंरचना, आधुनिक तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाले विनिर्माण के बल पर आगे बढ़ रही हैं। भारत भी उसी दिशा में अपने कदम तेज़ कर चुका है। सरकार का प्रयास है कि देश केवल उपभोक्ता बाजार बनकर न रह जाए, बल्कि वैश्विक उत्पादन और नवाचार का प्रमुख केंद्र बने। रेल और रसायन क्षेत्र में लिए गए ये निर्णय इसी दूरदर्शी सोच को प्रतिबिंबित करते हैं।
विकसित भारत का सपना केवल सरकारी योजनाओं से साकार नहीं होगा। इसके लिए मजबूत आधारभूत संरचना, आत्मनिर्भर उद्योग, आधुनिक तकनीक, कुशल मानव संसाधन और निवेश-अनुकूल वातावरण का समन्वय आवश्यक है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के ये दोनों निर्णय इसी व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि के महत्वपूर्ण अंग हैं। यदि इन परियोजनाओं का क्रियान्वयन निर्धारित समय-सीमा में गुणवत्ता के साथ पूरा होता है, तो आने वाले वर्षों में इनके परिणाम केवल संबंधित राज्यों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा प्रदान करेंगे।स्पष्ट है कि 4,294 करोड़ रुपये के इन दोनों निर्णयों का महत्व केवल दो परियोजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृति तक सीमित नहीं है। यह भारत की उस विकास यात्रा का सशक्त अध्याय है, जिसमें आधुनिक रेल नेटवर्क, सुदृढ़ औद्योगिक आधार, आत्मनिर्भर विनिर्माण, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और समावेशी आर्थिक विकास एक साथ आगे बढ़ते दिखाई देते हैं। विकसित भारत-2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए ऐसे निर्णय न केवल देश की आर्थिक क्षमता को नई ऊँचाइयों तक ले जाएंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत, सक्षम और आत्मनिर्भर भारत की नींव भी सुदृढ़ करेंगे।





