जर्सी का रंग बदलने से बदलेगी भारतीय हॉकी की तस्वीर?

Will changing the jersey color transform the face of Indian hockey?

भारतीय हॉकी टीम की नीली जर्सी को केसरिया रंग में बदलने के फैसले ने खेल से अधिक राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कोई इसे तकनीकी आवश्यकता बता रहा है तो कोई खेलों के भगवाकरण का आरोप लगा रहा है। लेकिन असली सवाल जर्सी का रंग नहीं, विश्व कप में भारत का प्रदर्शन है क्योंकि इतिहास जर्सी के रंगों से नहीं, मैदान पर अर्जित उपलब्धियों और तिरंगे की ऊंची उड़ान से लिखा जाता है।

योगेश कुमार गोयल

भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीम की पारंपरिक नीली जर्सी को बदलकर 15 अगस्त से शुरू हो रहे एफआईएच हॉकी विश्व कप 2026 में केसरिया रंग की मुख्य जर्सी पहनाने के निर्णय ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। यह बहस केवल खेल तक सीमित नहीं रही है बल्कि राजनीति, संस्कृति, राष्ट्रीय पहचान और खेल परंपरा तक पहुंच गई है। एक पक्ष इसे खिलाड़ियों की सुविधा और तकनीकी आवश्यकता से जुड़ा निर्णय बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे भारतीय खेलों के कथित ‘भगवाकरण’ के रूप में देख रहा है। सवाल यह है कि क्या वास्तव में जर्सी का रंग बदलना इतना बड़ा मुद्दा है या यह विवाद मूल प्रश्नों से ध्यान भटका रहा है? सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि हॉकी इंडिया ने जर्सी का रंग बदलने का निर्णय किन आधारों पर लिया। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और भारतीय हॉकी के महान खिलाड़ी रहे दिलीप तिर्की के अनुसार, आज अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मुकाबले नीले सिंथेटिक एस्ट्रो टर्फ पर खेले जाते हैं। ऐसे में नीली जर्सी कई बार मैदान की पृष्ठभूमि में घुल-मिल जाती है, जिससे तेज गति वाले खेल में खिलाड़ियों को अपने साथी खिलाड़ियों की पहचान करने में कठिनाई होती है। आधुनिक हॉकी में खेल की गति अत्यंत तेज हो चुकी है, जहां एक सैकेंड का निर्णय मैच का परिणाम बदल सकता है। पासिंग, पोजिशनिंग और त्वरित निर्णय के लिए खिलाड़ियों की स्पष्ट दृश्यता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण खिलाड़ियों, कप्तानों, कोचों और सहयोगी स्टाफ से विचार-विमर्श के बाद अधिक स्पष्ट दिखाई देने वाले रंग के रूप में केसरिया को चुना गया।

यदि यही वास्तविक कारण है तो इसे केवल तकनीकी दृष्टि से देखने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। विश्व खेलों में जर्सी के रंग समय-समय पर बदले जाते रहे हैं। फुटबॉल, रग्बी, क्रिकेट, बास्केटबॉल और हॉकी जैसी लगभग सभी खेल प्रतियोगिताओं में टीमें प्रतियोगिता, दृश्यता, प्रायोजकों, प्रसारण गुणवत्ता और तकनीकी आवश्यकताओं के अनुसार अपनी जर्सियों में परिवर्तन करती रहती हैं। भारतीय हॉकी टीम इससे पहले 2014 विश्व कप में पीली तथा 2018 में हल्के नीले रंग की जर्सी पहन चुकी है। इसलिए रंग परिवर्तन स्वयं में कोई असाधारण घटना नहीं है। विवाद इसलिए बढ़ा है क्योंकि भारतीय हॉकी की पहचान पिछले कई दशकों से नीली जर्सी के साथ जुड़ चुकी है। जैसे ब्राजील की फुटबॉल टीम पीली जर्सी, अर्जेंटीना आसमानी-सफेद धारियों, न्यूजीलैंड ‘ऑल ब्लैक्स’ और ऑस्ट्रेलिया हरे-पीले रंग से पहचाने जाते हैं, उसी प्रकार भारतीय हॉकी की पहचान भी नीली जर्सी रही है। ओलंपिक स्वर्णिम इतिहास, विश्व कप की उपलब्धियां और अनेक ऐतिहासिक मुकाबलों की स्मृतियां इसी नीली जर्सी से जुड़ी रही हैं। यही कारण है कि पूर्व कप्तान धनराज पिल्लै, परगट सिंह और वीरेन रासकिन्हा जैसे खिलाड़ियों ने चिंता व्यक्त की कि कहीं यह परिवर्तन भारतीय हॉकी की स्थापित पहचान को कमजोर न कर दे।

पूर्व दिग्गज हॉकी खिलाड़ियों की चिंता को भी खारिज नहीं किया जा सकता। खेल केवल तकनीक नहीं, भावनाओं और विरासत का भी विषय होता है। जर्सी केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं बल्कि करोड़ों प्रशंसकों की स्मृतियों, खिलाड़ियों के गौरव और राष्ट्रीय खेल संस्कृति का प्रतीक होती है। इसलिए ऐसे किसी भी बड़े परिवर्तन से पहले व्यापक संवाद और पारदर्शिता अपेक्षित थी। यदि हॉकी इंडिया खिलाड़ियों और विशेषज्ञों के साथ-साथ पूर्व खिलाड़ियों तथा खेल समुदाय को भी इस निर्णय प्रक्रिया से जोड़ती तो शायद विवाद की तीव्रता कम होती। दूसरी ओर इस पूरे विवाद का राजनीतिक स्वरूप भी कम चिंताजनक नहीं है। विपक्षी दलों ने इसे ‘खेलों का भगवाकरण’ करार दिया है जबकि कई समर्थकों ने इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बताया। वस्तुतः दोनों अतिवादी दृष्टिकोण खेल भावना के अनुकूल नहीं हैं। किसी भी रंग का अपना कोई धर्म नहीं होता। रंग प्रतीकों का अर्थ समय, संस्कृति और संदर्भ के अनुसार बदलता रहता है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग त्याग, साहस और समर्पण का प्रतीक है। भारतीय सेना, राष्ट्रीय ध्वज, अनेक विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक परंपराओं तथा आध्यात्मिक जीवन में भी केसरिया का सम्मानजनक स्थान है। वहीं इस्लामी परंपराओं, सूफी परंपरा और अनेक एशियाई संस्कृतियों में भी यह रंग विभिन्न रूपों में प्रयुक्त होता रहा है। इसलिए किसी रंग को किसी एक धर्म या विचारधारा का स्थायी प्रतीक मान लेना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि वर्तमान राजनीतिक वातावरण में रंगों के प्रतीकात्मक अर्थ अत्यधिक संवेदनशील हो चुके हैं। इसलिए जब किसी राष्ट्रीय टीम की दशकों पुरानी पहचान बदली जाती है तो राजनीतिक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं। ऐसी परिस्थितियों में खेल संस्थाओं का दायित्व और बढ़ जाता है कि वे अपने निर्णयों के पीछे के सभी तथ्य, वैज्ञानिक अध्ययन और खिलाड़ियों की राय सार्वजनिक करें ताकि अनावश्यक विवाद की गुंजाइश कम हो। इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि क्या वास्तव में नीली जर्सी खिलाड़ियों के प्रदर्शन में बाधा बन रही थी? कुछ पूर्व खिलाड़ियों ने इस तकनीकी तर्क पर प्रश्न उठाए हैं। उनका कहना है कि कई वर्षों से नीले एस्ट्रो टर्फ पर प्रतियोगिताएं हो रही हैं और कभी ऐसी गंभीर समस्या सामने नहीं आई। यदि वास्तव में दृश्यता का प्रश्न था तो क्या इस संबंध में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी महासंघ का कोई वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है? यदि हॉकी इंडिया इस विषय में विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक करे तो बहस अधिक तथ्यपरक हो सकती है।

हालांकि आधुनिक खेल विज्ञान यह स्वीकार करता है कि रंगों का खिलाड़ियों की दृश्य पहचान, प्रतिक्रिया समय और निर्णय क्षमता पर प्रभाव पड़ सकता है। कई खेलों में उच्च कंट्रास्ट वाले रंगों का चयन इसी कारण किया जाता है। प्रसारण तकनीक, कैमरा एंगल और दर्शकों की दृश्य सुविधा भी अब जर्सी डिजाइन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए तकनीकी आधार को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। पूरे विवाद का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि चर्चा खिलाड़ियों की तैयारी, रणनीति और पदक की संभावनाओं से हटकर जर्सी के रंग तक सीमित हो गई है। भारत की पुरुष और महिला दोनों हॉकी टीमें पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार कर चुकी हैं। टोक्यो ओलंपिक में पुरुष टीम ने कांस्य पदक जीतकर चार दशक का सूखा समाप्त किया जबकि महिला टीम ने भी शानदार प्रदर्शन कर विश्व का ध्यान आकर्षित किया। अब जब विश्व कप जैसे महत्वपूर्ण टूर्नामेंट सामने हैं, तब खिलाड़ियों का ध्यान केवल अपने प्रदर्शन पर केंद्रित रहना चाहिए, किसी भी प्रकार का राजनीतिक या वैचारिक विवाद खिलाड़ियों पर अनावश्यक मानसिक दबाव डाल सकता है।

बहरहाल, वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि नीली हो या केसरिया बल्कि यह है कि क्या भारतीय हॉकी विश्व विजेता बनने की तैयारी कर रही है? क्या हमारे खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण, फिटनेस सुविधाएं, खेल विज्ञान, मनोवैज्ञानिक सहयोग, आधुनिक विश्लेषण तकनीक और मजबूत घरेलू प्रतियोगिताएं उपलब्ध हैं? क्या जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं? यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक नहीं हैं तो केवल जर्सी बदल देने से भारतीय हॉकी का भविष्य नहीं बदल सकता। इतिहास बताता है कि महान टीमें अपने रंग से नहीं, अपने खेल से अमर होती हैं। खेल में पहचान रंग से नहीं, उपलब्धियों से बनती है। यदि भारतीय टीम केसरिया जर्सी पहनकर विश्व कप जीतती है तो यही जर्सी नई गौरवगाथा का प्रतीक बन जाएगी। और यदि प्रदर्शन निराशाजनक रहा तो रंग चाहे कोई भी हो, आलोचना फिर भी होगी। खेल का सबसे बड़ा धर्म राष्ट्र का सम्मान है। मैदान पर खिलाड़ी न किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं और न किसी दल का; वे केवल भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए जर्सी का रंग चाहे नीला हो, केसरिया हो या कोई और, देश की अपेक्षा केवल यही है कि भारतीय तिरंगा विश्व हॉकी के सर्वोच्च मंच पर सबसे ऊंचा लहराना चाहिए। वही किसी भी रंग की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।