डॉ. सत्यवान सौरभ
देश का भविष्य उसके युवा तय करते हैं और युवा शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र हमारे विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय हैं। ऐसे में यदि किसी राज्य से यह समाचार सामने आए कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी एचआईवी (HIV) संक्रमण से प्रभावित पाए गए हैं और सरकार को उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यापक जांच अभियान चलाने का निर्णय लेना पड़ा है, तो यह केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय नहीं रह जाता। यह शिक्षा, समाज, परिवार, नीति-निर्माताओं और पूरे राष्ट्र के लिए गंभीर चेतावनी है। यह समय भय फैलाने का नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशीलता और व्यापक जागरूकता के साथ इस चुनौती का सामना करने का है।
एचआईवी यानी ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर हमला करता है। यदि समय पर जांच और उपचार न मिले तो यह एड्स (AIDS) जैसी गंभीर अवस्था तक पहुंच सकता है। हालांकि चिकित्सा विज्ञान की प्रगति ने इसे अब एक नियंत्रित बीमारी बना दिया है। एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) की सहायता से संक्रमित व्यक्ति सामान्य और लंबा जीवन जी सकता है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण है समय पर पहचान, नियमित उपचार और संक्रमण की रोकथाम।
युवाओं में एचआईवी संक्रमण की खबर कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। क्या हमारे शैक्षणिक संस्थानों में स्वास्थ्य और यौन शिक्षा पर्याप्त है? क्या युवाओं को सुरक्षित व्यवहार, संक्रमण के कारणों और बचाव के उपायों की वैज्ञानिक जानकारी मिल रही है? क्या परिवार और समाज इस विषय पर खुलकर संवाद करने को तैयार हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि समस्या केवल स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच और शिक्षा व्यवस्था की भी है।
भारतीय समाज में आज भी यौन स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना सहज नहीं माना जाता। माता-पिता संकोच करते हैं, शिक्षक कई बार इस विषय से बचते हैं और विद्यार्थी अधूरी या भ्रामक जानकारी इंटरनेट अथवा मित्रों से प्राप्त करते हैं। परिणामस्वरूप मिथक, भ्रांतियां और गलत निर्णय जन्म लेते हैं। जबकि वैज्ञानिक जानकारी ही इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी माध्यम है।
यह समझना भी आवश्यक है कि एचआईवी संक्रमण केवल असुरक्षित यौन संबंधों से ही नहीं, बल्कि संक्रमित रक्त चढ़ाने, संक्रमित सुई के प्रयोग तथा संक्रमित मां से शिशु तक भी फैल सकता है। वहीं हाथ मिलाने, साथ बैठने, भोजन साझा करने, गले मिलने, छींकने या मच्छर के काटने से एचआईवी नहीं फैलता। दुर्भाग्य से आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग इन तथ्यों से अनभिज्ञ है। यही अज्ञानता संक्रमित व्यक्तियों के प्रति भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार को जन्म देती है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में अध्ययनरत युवा जीवन के ऐसे दौर में होते हैं जहां स्वतंत्रता, जिज्ञासा और नए अनुभवों का विस्तार होता है। ऐसे में उन्हें सही दिशा देना केवल परिवार का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों और सरकार की भी जिम्मेदारी है। प्रत्येक कॉलेज और विश्वविद्यालय में स्वास्थ्य परामर्श केंद्र, प्रशिक्षित काउंसलर, गोपनीय जांच सुविधा और नियमित जागरूकता कार्यक्रम होने चाहिए। विद्यार्थियों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि यदि वे किसी स्वास्थ्य संबंधी समस्या के साथ आगे आते हैं, तो उनकी निजता और सम्मान पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
यदि किसी राज्य ने उच्च शिक्षा संस्थानों में एचआईवी जांच अभियान शुरू करने का निर्णय लिया है, तो इसका उद्देश्य केवल संक्रमित व्यक्तियों की पहचान करना नहीं होना चाहिए। इसके साथ परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, उपचार और जागरूकता को समान महत्व देना होगा। जांच तभी सफल होगी जब विद्यार्थी इसे भय या शर्म के बजाय स्वास्थ्य सुरक्षा का सामान्य कदम मानें।
मीडिया की भूमिका भी यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी आंकड़े या घटना को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करने से समाज में भय और भ्रम पैदा होता है। इसके विपरीत यदि मीडिया वैज्ञानिक तथ्यों, विशेषज्ञों की राय और जागरूकता पर आधारित संवाद को बढ़ावा दे, तो समाज अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील बन सकता है। बीमारी को अपराध या चरित्र से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति को समाप्त करना भी आवश्यक है।
आज नशे की बढ़ती प्रवृत्ति भी चिंता का विषय है। मादक पदार्थों के सेवन, विशेषकर संक्रमित सुई के साझा उपयोग से भी एचआईवी संक्रमण का खतरा बढ़ता है। इसलिए नशा मुक्ति अभियान और एचआईवी जागरूकता कार्यक्रमों को एक-दूसरे से जोड़कर चलाने की आवश्यकता है। केवल उपचार से नहीं, बल्कि जोखिमपूर्ण व्यवहार को कम करके ही संक्रमण पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
भारत ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के माध्यम से पिछले वर्षों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। नए संक्रमणों में कमी आई है और लाखों संक्रमित लोगों को उपचार उपलब्ध कराया गया है। फिर भी यदि युवाओं में संक्रमण के मामले चिंता पैदा कर रहे हैं, तो यह संकेत है कि अब जागरूकता के पुराने तरीकों की समीक्षा कर उन्हें अधिक प्रभावी, आधुनिक और युवाओं के अनुकूल बनाना होगा।
परिवार की भूमिका इस पूरे विषय में सबसे महत्वपूर्ण है। बच्चों और किशोरों के साथ विश्वासपूर्ण संवाद, सही जानकारी और भावनात्मक सहयोग उन्हें जोखिमपूर्ण परिस्थितियों से बचा सकता है। यदि परिवार ही इस विषय को वर्जित बना देगा, तो युवा गलत स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने को मजबूर होंगे। मौन कभी समाधान नहीं होता; सही समय पर सही संवाद ही सुरक्षा का आधार बनता है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति हमारी तरह ही एक सामान्य नागरिक है। उसे तिरस्कार नहीं, बल्कि उपचार, सम्मान और सहयोग की आवश्यकता है। समाज जितना अधिक संवेदनशील होगा, उतने ही अधिक लोग बिना भय के जांच और इलाज के लिए आगे आएंगे। यही संक्रमण रोकने का सबसे प्रभावी तरीका भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि उच्च शिक्षा परिसरों को केवल ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, जागरूकता और जीवन कौशल के केंद्र भी बनाया जाए। वैज्ञानिक सोच, जिम्मेदार व्यवहार, नियमित स्वास्थ्य जांच और संवेदनशील सामाजिक वातावरण मिलकर ही इस चुनौती का समाधान कर सकते हैं।
अंततः एचआईवी की चुनौती हमें यह संदेश देती है कि आधुनिक शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं हो सकती। जीवन की रक्षा करने वाला ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है। यदि हम आज चुप्पी तोड़कर जागरूकता, संवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाते हैं, तो न केवल संक्रमण की रोकथाम संभव होगी, बल्कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण भी कर सकेंगे जहां बीमारी नहीं, बल्कि इंसान को देखा जाएगा। यही समय की मांग है और यही एक स्वस्थ, सुरक्षित और संवेदनशील भारत की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम भी।





