अशोक भाटिया
भारतीय जनमानस के खान-पान में दूध और उससे बने उत्पादों का स्थान केवल पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और दैनिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। विशेष रूप से शाकाहारी आबादी के लिए पनीर प्रोटीन और कैल्शियम का सबसे विश्वसनीय और सुलभ स्रोत माना जाता रहा है। त्योहारों का उल्लास हो, घर में मेहमानों का आगमन या फिर किसी रेस्टोरेंट का मेन्यू, पनीर की मौजूदगी अनिवार्य सी होती है। लेकिन पिछले कुछ समय से हमारी थाली में परोसे जा रहे इस पारंपरिक उत्पाद के पीछे ‘एनालॉग पनीर’ यानी कृत्रिम पनीर का एक ऐसा घालमेल पैठ बना चुका है, जिसने न केवल उपभोक्ताओं के विश्वास को तोड़ा है, बल्कि जनस्वास्थ्य के सामने भी एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
महाराष्ट्र सरकार द्वारा इस कृत्रिम विकल्प के निर्माण, भंडारण और बिक्री पर कड़े प्रतिबंध लगाने के बाद, अब गुजरात सरकार ने भी इस विषय पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। गुजरात, जो देश में श्वेत क्रांति का अगुआ और डेयरी उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र रहा है, वहाँ इस प्रकार के नकली पनीर का बड़े पैमाने पर पकड़ा जाना और उस पर प्रतिबंध का फैसला होना यह साबित करता है कि समस्या कितनी गहरी और व्यापक हो चुकी है। यह कदम केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह देश के खाद्य सुरक्षा तंत्र, उपभोक्ता अधिकारों और पारंपरिक डेयरी उद्योग को बचाने के लिए एक आवश्यक शल्य-क्रिया (सर्जरी) की तरह है।
आम उपभोक्ता के लिए ‘एनालॉग’ शब्द तकनीकी लग सकता है, लेकिन इसका सीधा और सरल अर्थ है—एक ऐसा छलावा जो दिखता असली पनीर जैसा है, लेकिन जिसका दूध से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता। असली पनीर का निर्माण पूरी तरह से शुद्ध दूध को फाड़कर किया जाता है, जिसमें दूध का गाढ़ा प्रोटीन और वसा शामिल होते हैं। इसके विपरीत, एनालॉग पनीर एक पूर्णतः औद्योगिक और रासायनिक प्रक्रिया का परिणाम है। इसमें दूध के बहुमूल्य फैट को निकालकर उसके स्थान पर सस्ते और रिफाइंड पाम ऑयल या अन्य वनस्पति तेलों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, इसकी बनावट और बनावटी कड़ेपन को असली पनीर जैसा दिखाने के लिए भारी मात्रा में स्टार्च, रासायनिक इमल्सीफायर्स, और कृत्रिम रंगों व सुगंधों का मिश्रण किया जाता है।
व्यवसाय जगत और मुनाफाखोरों के लिए यह उत्पाद किसी वरदान से कम नहीं था। जहाँ असली पनीर को बनाने में भारी मात्रा में शुद्ध दूध की आवश्यकता होती है और उसकी उत्पादन लागत स्वाभाविक रूप से अधिक होती है, वहीं एनालॉग पनीर चंद रसायनों और सस्ते आयातित पाम ऑयल की मदद से बेहद कम लागत में तैयार हो जाता है। बाजार के गणित को समझें, तो असली पनीर की तुलना में यह कृत्रिम पनीर लगभग आधी या उससे भी कम कीमत पर बनकर तैयार हो जाता है। इसी भारी मुनाफे के लालच ने इसे देश भर के होटलों, ढाबों, स्ट्रीट फूड वेंडरों और पिज्जा-बर्गर चेन तक पहुँचा दिया। उपभोक्ता अनजाने में जिसे एक पौष्टिक आहार समझकर खा रहा था, वह वास्तव में रसायनों और सस्ते तेल का एक खतरनाक कोलाज था।
एनालॉग पनीर का सबसे चिंताजनक पहलू इसका मानवीय स्वास्थ्य पर पड़ने वाला दीर्घकालिक और विनाशकारी प्रभाव है। चिकित्सा विज्ञान और पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, पाम ऑयल और रिफाइंड वनस्पति तेलों को जब उच्च तापमान पर बार-बार संसाधित किया जाता है, तो वे ट्रांस-फैट और सैचुरेटेड फैट में बदल जाते हैं। यह वसा हमारे शरीर के लिए एक धीमे जहर की तरह काम करती है। इसका नियमित सेवन रक्त में खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को तेजी से बढ़ाता है, जिससे धमनियों में रुकावट पैदा होती है और कम उम्र में ही हृदय रोग व पल्स स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
इसके अतिरिक्त, इस कृत्रिम पनीर को लंबे समय तक खराब होने से बचाने और उसकी बनावट को बनाए रखने के लिए जिन रासायनिक प्रिजर्वेटिव्स और इमल्सीफायर्स का उपयोग किया जाता है, वे हमारे पाचन तंत्र, लीवर और किडनी पर सीधा प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। बच्चों और युवाओं में बढ़ती मोटापे की समस्या, फैटी लीवर और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) से जुड़ी बीमारियों के पीछे इस तरह के छिपे हुए कृत्रिम खाद्य पदार्थों की एक बड़ी भूमिका है। असली पनीर जहाँ शरीर को आवश्यक अमीनो एसिड, कैल्शियम और विटामिन प्रदान करता है, वहीं यह एनालॉग पनीर शरीर को केवल खाली कैलोरी और हानिकारक वसा देता है। यह स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब कुपोषण से लड़ रहे बच्चों या प्रोटीन की कमी से जूझ रहे मरीजों को अनजाने में यह नकली उत्पाद परोस दिया जाता है, जिससे उनके शरीर को आवश्यक पोषण मिलने के बजाय नई बीमारियाँ उपहार में मिल जाती हैं।
खाद्य सुरक्षा के नियमों के अनुसार, किसी भी उत्पाद को बेचते समय उसके पैकेट पर स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए कि वह क्या है। यदि कोई उत्पाद ‘एनालॉग’ या नॉन-डेयरी है, तो उसे ‘पनीर’ के नाम से नहीं बेचा जा सकता। उसे ‘वेजिटेबल फैट ब्लेंड’ या ऐसा ही कोई तकनीकी नाम देना अनिवार्य है। लेकिन भारतीय खाद्य बाजार की जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल जुदा रही है। मुनाफाखोरी के इस पूरे खेल में पारदर्शिता को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया। थोक बाजारों से लेकर खुदरा दुकानों और रेस्टोरेंट के किचन तक, इस उत्पाद को सरेआम ‘सस्ता पनीर’ या ‘स्पेशल पनीर’ बताकर खपाया गया।
यह सीधे तौर पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत दिए गए ‘जानने के अधिकार’ और ‘भ्रामक विज्ञापनों व प्रथाओं के खिलाफ अधिकार’ का घोर उल्लंघन है। जब एक ग्राहक किसी रेस्टोरेंट में पनीर की सब्जी या पिज्जा के लिए भारी-भरकम भुगतान करता है, तो वह यह उम्मीद करता है कि उसे शुद्ध और पौष्टिक डेयरी उत्पाद दिया जा रहा है। उसे यह कभी नहीं बताया जाता कि उसकी थाली में जो तैर रहा है, वह दूध से नहीं बल्कि पाम ऑयल और स्टार्च से बनी एक कतरन है। यह आर्थिक धोखाधड़ी तो है ही, साथ ही यह जन-विश्वास के साथ किया गया एक अक्षम्य अपराध भी है।
महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में इस प्रतिबंध का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक आयाम है—हमारी डेयरी अर्थव्यवस्था की सुरक्षा। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक पशुपालन और डेयरी उद्योग पर टिकी हुई है। करोड़ों छोटे और सीमांत किसान दूध बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं। जब बाजार में दूध से बनने वाले असली उत्पादों के स्थान पर रसायनों और आयातित पाम ऑयल से बने सस्ते विकल्प अवैध रूप से हावी होने लगते हैं, तो इसका सीधा असर दूध की मांग और उसकी कीमतों पर पड़ता है।
यदि सिंथेटिक और एनालॉग पनीर इसी तरह बाजार पर कब्जा जमाए रखते, तो डेयरी सहकारी समितियों और निजी डेयरियों के लिए किसानों से सही कीमत पर दूध खरीदना नामुमकिन हो जाता। यह स्थिति अंततः हमारे ग्रामीण अर्थतंत्र को पंगु बना देती। गुजरात जैसे राज्य में, जहाँ अमूल जैसी सहकारिता की विशाल संरचना ने किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है, वहाँ एनालॉग पनीर का प्रसार इस पूरी श्वेत क्रांति के मूल सिद्धांतों पर एक सीधा प्रहार था। इसलिए, गुजरात सरकार का यह प्रतिबंध केवल स्वास्थ्य की रक्षा नहीं है, बल्कि यह देश के अन्नदाताओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक बड़े संकट से बचाने का एक सुरक्षा कवच भी है।
निश्चित रूप से, महाराष्ट्र और गुजरात सरकारों द्वारा उठाए गए ये कदम अत्यधिक सराहनीय और स्वागत योग्य हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि केवल कागजी कानूनों या तात्कालिक प्रतिबंधों से मिलावटखोरी और कालाबाजारी के संगठित नेटवर्क को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता। जैसे ही प्रशासनिक मुस्तैदी थोड़ी कम होती है, ये तत्व नए रास्तों और नए नामों से बाजार में दोबारा सक्रिय हो जाते हैं। इसलिए, इस प्रतिबंध को पूरी तरह से प्रभावी बनाने के लिए एक बहुआयामी और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है।
सबसे पहले, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण और राज्य के खाद्य एवं औषधि प्रशासन के प्रवर्तन तंत्र को और अधिक मजबूत, आधुनिक और पारदर्शी बनाना होगा। प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ानी होगी और औचक निरीक्षण (सरप्राइज रेड्स) की प्रक्रिया को नियमित करना होगा, विशेषकर त्योहारों के सीजन में और थोक मंडियों में। इसके साथ ही, नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भारी जुर्माने और गैर-जमानती जेल जैसी सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान जमीनी स्तर पर कड़ाई से लागू होना चाहिए, ताकि कानून का खौफ मिलावटखोरों के मन में बैठ सके।
दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है—उपभोक्ता जागरूकता। जब तक देश का आम नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं होगा, तब तक कोई भी कानून पूर्णतः सफल नहीं हो सकता। उपभोक्ताओं को जागरूक किया जाना चाहिए कि वे पैकेज्ड पनीर खरीदते समय लेबल को ध्यान से पढ़ें और ‘वेजिटेबल फैट’ या ‘एनालॉग’ जैसे शब्दों के प्रति सतर्क रहें। स्कूलों, कॉलेजों और सोशल मीडिया के माध्यम से असली और नकली पनीर की पहचान करने के सरल घरेलू तरीकों (जैसे आयोडीन टेस्ट या हाथ से मसलकर देखना) का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए।
अंततः, यह लड़ाई केवल एक खाद्य उत्पाद के प्रतिबंध की नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के स्वास्थ्य, हमारे बच्चों के भविष्य और हमारी आर्थिक ईमानदारी की रक्षा की लड़ाई है। महाराष्ट्र और गुजरात ने राह दिखाई है, अब देश के अन्य राज्यों को भी बिना किसी देरी के इस दिशा में कड़े कदम उठाने चाहिए। एक स्वस्थ और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण तभी संभव है जब हमारी थाली में परोसा जाने वाला हर निवाला शुद्ध, सुरक्षित और धोखे से मुक्त हो।





