प्रकृति की रक्षा को धर्म मानने वाले समुदायों का विश्व आदिवासी दिवस

World Tribal Day for communities that regard the protection of nature as a sacred duty

कृति आरके जैन

मानव सभ्यता की प्रथम चेतना से आधुनिक युग तक, कुछ समुदायों ने प्रकृति पर अधिकार नहीं, बल्कि उसके साथ आत्मीय सह-अस्तित्व का मार्ग चुना। आदिवासी समाज उसी प्राचीन जीवन-दृष्टि का प्रतीक है, जिसने जंगलों में केवल संपदा नहीं, जीवन की धड़कन; नदियों में केवल प्रवाह नहीं, माँ का स्नेह और पर्वतों में केवल शिलाखंड नहीं, आस्था व अस्तित्व की ऊँचाई देखी। इस समाज ने धरती की रक्षा को धर्म और संस्कृति की विरासत को दायित्व माना। इसी कारण आदिवासी समुदाय धरती के सच्चे प्रहरी और मानव संस्कृति के अनमोल संरक्षक कहलाते हैं। 9 अगस्त का विश्व आदिवासी दिवस उनकी मौन आवाजों, समृद्ध विरासत, अधिकारों और संघर्षों को सम्मान देने का अवसर है। यह दिवस स्मरण कराता है कि प्रकृति के साथ संतुलित और सामंजस्यपूर्ण जीवन का अमूल्य ज्ञान, जिसे विश्व आज पुनः खोज रहा है, आदिवासी समाज ने सदियों से अपनी परंपराओं में सहेज रखा है।

विश्व आदिवासी दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकारों और अस्मिता की वैश्विक पहचान का प्रतीक है। संयुक्त राष्ट्र के स्वदेशी आबादी कार्य समूह की 1982 में हुई पहली बैठक ने मूलनिवासी समुदायों के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच दिया, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1994 में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित किया। आज विश्वभर में लगभग 37.6 से 50 करोड़ आदिवासी लोग लगभग 90 देशों में रहते हैं। वे करीब 5000 संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और विश्व की लगभग 7000 भाषाओं में से अधिकांश बोलते हैं। वैश्विक आबादी में लगभग 5-6 प्रतिशत होने के बावजूद जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण संतुलन में उनका योगदान असाधारण है। उनका जीवन सिखाता है कि प्रकृति की रक्षा केवल विज्ञान नहीं, बल्कि संवेदना, संस्कार और जीवन मूल्यों का संकल्प है।

भारत की सांस्कृतिक आत्मा में आदिवासी समाज का योगदान गौरव, गरिमा और परंपरा की अमिट छाप है। देश में लगभग 10.45 करोड़ आदिवासी नागरिक निवास करते हैं (जनगणना 2011), जो कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत हैं। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पूर्वोत्तर राज्यों में बसे ये समुदाय भारत की विविधता को विशिष्ट पहचान देते हैं। राजस्थान के बांसवाड़ा में 76.38 प्रतिशत, डूंगरपुर में 70.82 प्रतिशत और प्रतापगढ़ में 63.42 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदायों की है (जनगणना 2011), जिन्होंने इन क्षेत्रों की सांस्कृतिक चेतना को जीवंत रखा है। सरहुल, कर्मा और भगोरिया जैसे पर्व प्रकृति और मानव जीवन के आत्मीय संबंधों की अभिव्यक्ति हैं। गोंड-भील नृत्य, वारली चित्रकला और हस्तकलाएँ भारतीय संस्कृति के वे अनमोल रत्न हैं, जिनकी चमक विश्व मंच पर प्रतिष्ठित हो चुकी है।

प्रकृति के प्रति आदिवासी समाज का समर्पण उनकी जीवन-दृष्टि की सबसे बड़ी पहचान है। उनके लिए पर्यावरण संरक्षण कोई अभियान नहीं, बल्कि जीवन का सहज संस्कार है। वे वृक्षों में जीवन की चेतना, नदियों में माँ का स्नेह और पर्वतों में आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य रिपोर्टों के अनुसार आदिवासी समुदाय विश्व की लगभग 22–25 प्रतिशत भूमि की रक्षा/प्रबंधन करते हैं (कुछ अनुमानों में 25% या उससे अधिक), जो जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उनकी पारंपरिक समझ सिखाती है कि विकास केवल आर्थिक विस्तार नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और भविष्य के बीच संतुलन का नाम है। आज जलवायु संकट से जूझती दुनिया के लिए आदिवासी जीवन-पद्धति संतुलित सह-अस्तित्व का प्रेरणादायी प्रकाश बन रही है।

समय की कठिन परीक्षाओं के बावजूद आदिवासी समुदायों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान की अमूल्य धरोहर सुरक्षित रखी है। सीमित शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों की चुनौतियों के बीच भी उन्होंने अपनी भाषाओं, लोककथाओं और परंपराओं की जीवनधारा को बनाए रखा है। भिली, गोंडी और संथाली जैसी भाषाएँ केवल अभिव्यक्ति के साधन नहीं, बल्कि उनमें पीढ़ियों का अनुभव, प्रकृति का ज्ञान और समाज की स्मृतियाँ जीवित हैं। विश्व की लगभग 7000 आदिवासी भाषाओं का संरक्षण मानव सभ्यता की सांस्कृतिक विविधता को बचाने का प्रयास है। आज नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़कर इन परंपराओं को नई चेतना और ऊर्जा के साथ आगे बढ़ा रही है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में भी आदिवासी समुदायों के लिए नए अवसरों के द्वार खुल रहे हैं। वर्ष 2026 की थीम “आदिवासी दाईयों का सम्मान: जीवन और कल्याण की रक्षा” यह स्पष्ट करती है कि आधुनिक तकनीक उनके पारंपरिक ज्ञान, स्वास्थ्य संबंधी प्रथाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का प्रभावी माध्यम बन सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से आदिवासी दाईयों के ज्ञान का डिजिटल संरक्षण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य संबंधी पारंपरिक समझ का दस्तावेजीकरण और उनकी जीवन-रक्षा संबंधी कला को वैश्विक मंच तक पहुँचाना संभव है। तकनीक उनकी पहचान बदलने का नहीं, बल्कि उसे सशक्त बनाने का माध्यम बननी चाहिए। परंपरा और आधुनिकता का संतुलन उनके उज्ज्वल भविष्य की मजबूत आधारशिला बन सकता है।

सदियों से संजोई गई आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक एवं वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। भारत के संविधान का अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों को विशेष संरक्षण प्रदान करता है, वहीं 13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाई गई आदिवासी अधिकार घोषणा ने उनकी संस्कृति, भाषा और भूमि संबंधी अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय मजबूती दी। वारली चित्रकला, मधुबनी कला, मांदर की गूंज और छऊ नृत्य जैसी लोककलाएँ भारत की सांस्कृतिक चेतना को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करती हैं। आदिवासी समुदायों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का अर्थ उनकी मौलिक पहचान को बदलना नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के समान अवसरों से सशक्त बनाना है। उनकी भूमि, भाषा और संस्कृति केवल उनकी निजी धरोहर नहीं, बल्कि समूची मानवता की साझा विरासत है। विश्व आदिवासी दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम उनकी आवाज को सम्मान, अधिकारों को संरक्षण और योगदान को सदैव गौरव प्रदान करेंगे।