एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया -वैश्विक स्तरपर भारत में स्वास्थ्य सेवा कासवाल अब केवल डॉक्टर,अस्पताल,दवा और इलाज तक सीमित नहीं रह गया है। यह तेजी से परिवार की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक न्याय और नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार से जुड़ता जा रहा है। किसी परिवार में गंभीर बीमारी आ जाए तो बीमारी से लड़ने के साथ- साथ उसे अस्पताल का बिल,जांचों का खर्च,दवाइयों की कीमत,कमरे का किराया और बीमा के दावों की जटिलताओं से भी लड़ना पड़ता है। इसी व्यापक चिंता को संसद की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति की 176वीं रिपोर्ट- ऑफॉर्डएबिलिटी एंड एक्सेससिबिलिटी ऑफ़ हेअल्थकेयर फेसिलिटीज इन पब्लिक एंड प्राइवेट सेक्टर ने सामने रखा है।यह रिपोर्ट 7 अगस्त 2026 को संसद में पेश की गई और इसमें कुल 368 सिफारिशें की गई हैं। आधिकारिक पीआईबी के अनुसार इनमें निजी अस्पतालों में आवश्यक उपचार, जांच और सामान्य प्रक्रियाओं की लागत को मानकीकृत और सीमित करने की व्यवस्था बनाने से लेकर सस्ती स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था तथा स्वास्थ्य क्षेत्र के ज़ीएसटी ढांचे की समीक्षा तक कई सारे महत्वपूर्ण सुझाव शामिल हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि, इलाज महंगा होना अब सिर्फ स्वास्थ्य समस्या नहीं, आर्थिक संकट भी है, कल्पना कीजिए कि एक निम्न- मध्यमवर्गीय परिवार का कमाने वाला सदस्य अचानक हृदय रोग, कैंसर,किडनी की बीमारी या किसी गंभीर संक्रमण की चपेट में आ जाता है। परिवार पहले सरकारी अस्पताल में इलाज की संभावना तलाशता है,लेकिन यदि वहां बेड,विशेषज्ञ डॉक्टर, जांच या तत्काल उपचार उपलब्ध नहीं होता तो उसे मजबूरी में निजी अस्पताल का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। यहीं से चिकित्सा खर्च का दूसरा संकट शुरू होता है।अस्पताल में भर्ती होने के बाद कमरे का किराया, डॉक्टर की फीस, जांच,दवाइयां,उपकरण,प्रक्रिया शुल्क और अन्य खर्च मिलकर ऐसा बिल बना सकते हैं जिसे परिवार की वर्षों की बचत भी पूरा न कर पाए। संसदीय समिति ने इसी आर्थिक दबाव को गंभीरता से रेखांकित किया है और निजी अस्पतालों में आवश्यक उपचार तथा जांचों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था बनाने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में 368 सिफारिशें की गई है,अब असली परीक्षा क्रियान्वयन की है।176वीं रिपोर्ट की सबसे बड़ी विशेषता केवल इसकी 368 सिफारिशें नहीं बल्कि यह है कि संसद की समिति ने स्वास्थ्य व्यवस्था की समस्या को सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के संदर्भ में एक साथ देखा है।अब असली प्रश्न यह है कि इन सिफारिशों का कितना हिस्सा नीति, कानून और जमीन पर लागू होता है। किसी भी संसदीय समिति की रिपोर्ट तभी जनता के जीवन में परिवर्तन ला सकती है जब सरकार, राज्य सरकारें, नियामक संस्थाएं, बीमा कंपनियां और अस्पताल उसके सुझावों को क्रियान्वयन में बदलें। निजी अस्पतालों में कुछ बातें और देखने को मिलती है कि उनकी निजी फार्मेसी होना, प्रिस्क्रिप्शन में वही दवाइयां लिखना जो बाहर नहीं मिलती उस फार्मेसी में ही मिलती है, ज़ो कंज्यूमर प्रोटक्शन एक्ट 2019 में आता है।मरीज को तुरंत ही आईसीयू या वेंटिलेटर पर लगा देना जैसी अनेक बातें मरीजों द्वारा बताई जाती है। जिस पर नियमावक बनाने की जरूरत है।
साथियों, बात अगर हम 176 वीं रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश,निजी अस्पतालों की कीमतों में पारदर्शिता को समझने की करें तो,गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए इस रिपोर्ट का सबसे सीधा अर्थ यह है कि इलाज की कीमत मरीज को पहले से पता होनी चाहिए और समान प्रकार के उपचार के लिए कीमतों में अत्यधिक अंतर नहीं होना चाहिए। समिति ने सभी निजी अस्पतालों में आवश्यक उपचार, डायग्नोस्टिक सेवाओं और सामान्य प्रक्रियाओं की लागत को मानकीकृत करने तथा उन पर सीमा तय करने की व्यवस्था बनाने की बात कही है। यह सुझाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चिकित्सा क्षेत्र में मरीज अक्सर ऐसी स्थिति में होता है जहां वह कीमत पर बातचीत नहीं कर सकता। वह डॉक्टर से यह नहीं कह सकता कि यह जांच महंगी है,दूसरी जगह करा लूंगा, क्योंकि गंभीर बीमारी में समय भी महत्वपूर्ण होता है।इसलिए मरीज कोउपभोक्ता की तरह केवल बिल थमाने के बजाय उपचार से पहले अनुमानित खर्च, उपचार के विकल्प और पैकेज की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। यही पारदर्शिता भविष्य में अनावश्यक आर्थिक शोषण को रोकने की दिशा में बड़ा कदम हो सकती है।
साथियों, बात अगर हम 176 वीं रिपोर्ट का एक और पहलू अस्पताल का कमरा इलाज से महंगा न बन जाए इसको समझने की करें तो, समिति की सिफारिशों में अस्पताल के कमरे के किराये और उपचार की लागत से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। कई बार मरीज को लगता है कि उसका मुख्य खर्च ऑपरेशन या इलाज पर होगा, लेकिन अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद पता चलता है कि कमरे, नर्सिंग, जांच, दवाइयों और अन्य सेवाओं के अलग-अलग शुल्क ने बिल को कई गुना बढ़ा दिया। संसदीय समिति ने निजी अस्पतालों द्वारा विशेष रूप से महानगरों में अस्पताल में रहने के लिए बड़ी रकम वसूलने की समस्या को रेखांकित किया है।इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें मरीज को भर्ती करने से पहले कमरे का किराया, डॉक्टर शुल्क, संभावित जांच, प्रक्रिया शुल्क और अनुमानित कुल खर्च स्पष्ट रूप से बताया जाए। आपातकालीन परिस्थितियों को छोड़कर उपचार के बीच अचानक नए और बड़े खर्च सामने आने की स्थिति पर भी नियमन होना चाहिए।स्वास्थ्य बीमा है, फिर भी परिवार क्यों परेशान होता है? एक आम मध्यमवर्गीय परिवार यह सोचकर स्वास्थ्य बीमा खरीदता है कि बीमारी आने पर उसका आर्थिक संकट कम हो जाएगा। लेकिन वास्तविकता में कई परिवारों को बीमा होने के बावजूद जेब से बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। कमरे की सीमा, सह-भुगतान, कुछ उपचारों का बाहर होना, ओपीडी खर्च,दवाइयों तथा जांचों की सीमाएं और क्लेम की प्रक्रिया मरीज के लिए परेशानी बन सकती हैं।संसदीय समिति ने कम लागत वाली स्वास्थ्य बीमा व्यवस्था, विशेषकर उस वर्ग के लिए जो न तो पूरी तरह सरकारी स्वास्थ्य सुरक्षा में आता है और न ही महंगे निजी बीमा को आसानी से वहन कर सकता है, की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसे आम भाषा में कहें तो यह उस बीच के वर्ग के लिए सुरक्षा कवच की जरूरत है जो बीमारी आने पर सबसे ज्यादा आर्थिक असुरक्षा सटीकता से महसूस कर सकता है।
साथियों, बात अगर हम 176 वीं रिपोर्ट को और गहराई से समझने की करें तो,बीमा का मतलब सिर्फ कार्ड नहीं, वास्तविक इलाज होना चाहिए कहा गया है,भविष्य की स्वास्थ्य नीति में यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बीमा कार्ड होने का अर्थ केवल कागज पर कवरेज न रह जाए। मरीज को यह पता होना चाहिए कि कौन-सा उपचार कितना कवर होगा, अस्पताल कितना शुल्क ले सकता है,कौन-सी जांच बीमा में शामिल है और किन परिस्थितियों में दावा अस्वीकार हो सकता है। बीमा कंपनियों, अस्पतालों और मरीज के बीच पारदर्शी त्रिकोण बनाना समय की मांग है। समिति ने सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोग से एक वेल – डिज़ाइनड , वॉल्यून्टेरी एंड कंट्रीब्यूटरी इंन्शुरन्स मॉडल पर भी विचार करने की सिफारिश की है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य बीमा को अधिक व्यावहारिक और सटीकता से पहुंच योग्य बनाना है।
साथियों, समिति की रिपोर्ट के अनुसार सरकारी अस्पताल मजबूत होंगे तो निजी अस्पतालों का दबाव भी घटेगा इसको समझने की करें तो,निजी अस्पतालों को नियंत्रित करने की बहस का दूसरा पक्ष सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना है। यदि सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, नर्स, बेड, आधुनिक उपकरण, जांच सुविधाएं और दवाइयां उपलब्ध हों तो मरीज केवल मजबूरी में निजी अस्पताल नहीं जाएगा।संसदीय रिपोर्ट ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की क्षमता और पहुंच को मजबूत करने की आवश्यकता को भी व्यापक रूप से संबोधित किया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार समिति ने सरकारी अस्पतालों में बेड की कमी, मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों को गंभीर मुद्दा माना है।इसलिए समाधान केवल निजी अस्पतालों पर नियंत्रण नहीं बल्कि सरकारी अस्पतालों को इतना सक्षम बनाना भी है कि गरीब व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए अपनी जमीन, घर या जीवनभर की बचत बेचने की नौबत न आए।
साथियों समिति की रिपोर्ट के अनुसारजन औषधि केंद्रों का विस्तार, मरीज के लिए सीधी राहत इसको समझने की करें तो रिपोर्ट की एक व्यावहारिक सिफारिश सभी जिला अस्पतालों सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और सरकारी योजनाओं में सूचीबद्ध बड़े निजी अस्पतालों में जन औषधि केंद्र स्थापित करने की है।इसका महत्व बहुत बड़ा है क्योंकि अस्पताल में इलाज का खर्च केवल ऑपरेशन या बेड तक सीमित नहीं होता। लंबी बीमारी में दवाइयों का खर्च परिवार की आय का बड़ा हिस्सा खा सकता है। यदि गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाइयां कम कीमत पर आसानी से उपलब्ध हों तो मरीज के कुल उपचार खर्च को कम किया जा सकता है। पीआईबी के अनुसार प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के तहत 2025-26 में बिक्री 2,252.19 करोड़ रूपए रही और नागरिकों को लगभग 9,000 करोड़ रूपए की बचत का सटीकता से अनुमान बताया गया है।
साथियों बात अगर हम समिति रिपोर्ट में कही गई यह बात जीएसटी की समीक्षा भी क्यों जरूरी है? इसको समझने की करें तो स्वास्थ्य सेवा के खर्च को केवल अस्पताल के बिल से नहीं देखा जा सकता। दवाइयां, चिकित्सा उपकरण, जांच और विभिन्न स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े करों का अंतिम प्रभाव भी मरीज पर पड़ सकता है। इसलिए समिति ने स्वास्थ्य क्षेत्र पर लागू जीएसटी ढांचे की व्यापक समीक्षा की सिफारिश की है।गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए इसका अर्थ यह है कि सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐसी कर व्यवस्था की दिशा में सोचना चाहिए जिससे आवश्यक चिकित्सा सेवाएं और उपचार सामग्री अनावश्यक रूप से महंगी न हों।
साथियों, इलाज बाजार नहीं,मानवीय अधिकार की भावना से संचालित होना चाहिए इसको समझने की करें तो स्वास्थ्य सेवा में निजी क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। निजी अस्पतालों ने भारत में आधुनिक चिकित्सा, सुपर- स्पेशियलिटी उपचार,तकनीक और आपातकालीन सेवाओं के विस्तार में योगदान दिया है। इसलिए समाधान निजी क्षेत्र को समाप्त करना नहीं हो सकता। समाधान है, निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही उचित मूल्य और मरीजों के अधिकारों का मजबूत संरक्षण।भारत को ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए जिसमें निजी अस्पताल लाभ कमा सकें, लेकिन मरीज की मजबूरी को लाभ काअसीमित अवसर न बनाया जा सके। अस्पताल उद्योग है, लेकिन मरीज केवल ग्राहक नहीं है,वह बीमारी और भय की स्थिति में मदद मांगने वाला नागरिक है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि बीमारी से लड़ाई में परिवार को आर्थिक रूप से न हारना पड़े176वीं संसदीय रिपोर्ट को इसलिए केवल स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए एक दस्तावेज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस करोड़ों आबादी के लिए महत्वपूर्ण संदेश है जो बीमारी के समय सरकारी और निजी स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच रास्ता तलाशती है। निजी अस्पतालों में आवश्यक उपचार और जांच की कीमतों का मानकीकरण, पारदर्शी बिलिंग, सस्ती स्वास्थ्य बीमा, जन औषधि केंद्रों का विस्तार, जीएसटी व्यवस्था की समीक्षा और सरकारी अस्पतालों का सुदृढ़ीकरण,ये सभी कदम मिलकर भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बना सकते हैं।आखिरकार किसी परिवार की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं होनी चाहिए कि उसका सदस्य बीमार पड़ गया; त्रासदी तब और गहरी हो जाती है जब इलाज बचाने के लिए परिवार को अपनी पूरी जीवनभर की कमाई गंवानी पड़े। 176वीं रिपोर्ट की मूल भावना को यदि एक वाक्य में कहा जाए तो वह यही है,भारत में इलाज ऐसा होना चाहिए जो गरीब को गरीबी में और मध्यमवर्ग को कर्ज में धकेलने के बजाय उसे बीमारी से उबरने का अवसर दे। और अब गेंद सरकार तथा संबंधित नियामक संस्थाओं के पाले में है,368 सिफारिशों को रिपोर्ट की फाइलों से निकालकर अस्पताल के बिल, मरीज के अधिकार और आम परिवार की जेब तक राहत में बदलना ही इस रिपोर्ट की वास्तविक सफलता होगी।





