स्वतन्त्र भारत की वो पहली सुबह

That first morning of independent India

डॉ रघुवीर चारण   

आज हम स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ मना रहे हैं इसी दिन के लिए माँ भारती के उन लाखों वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहुतियाँ दीं आज उनके शौर्य की अमर गाथा और बलिदान का दिवस है।वर्ष 2026 का स्वाधीनता दिवस विकसित भारत के लिए युवा शक्ति और ऐतिहासिक राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने की उपलब्धि पर मनाया जा रहा है आज़ादी के अमृत काल में हमारा राष्ट्र नित नए आयाम स्थापित कर रहा है।हर वर्ष की भांति इस बार भी गाँव चौपाल से लाल क़िले तक तिरंगें की आन बान और शान झलकेगी ।

ठीक आज से 79 साल पहले ब्रिटिश हुकूमत का अंत और स्वतंत्र भारत का वो ऐतिहासिक दिन जो हमारे लिए गर्व और गौरव का क्षण था उसी दिन नींव रखी गई उस राष्ट्र की जो मज़बूत लोकतंत्र का प्रतीक है।19वीं सदी से शुरू हुई विकास की यात्रा वर्तमान भारत की प्रगति और उत्थान को दिखाती है। वर्तमान में भारत विश्व की प्रमुख आर्थिक एवं प्रौद्योगिकीय शक्तियों में से एक है, लेकिन यह यात्रा आसान नहीं थी।स्वतंत्रता के बाद भारत ने एक ऐसे लोकतांत्रिक देश का निर्माण किया जो अपने नागरिकों को समान अवसर और अधिकार प्रदान करता है।
आज़ादी से पहले देश के इतिहास पर एक नज़र डालें तो भारत का अतीत विदेशी शक्तियों के निरंतर आगमन का केंद्र रहा। जिसमें मुगल साम्राज्य के पतन के बाद कई क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरी उसके उपरांत ब्रिटिश शासन का उदय हुआ फिर करीबन 200 सालों तक अंग्रेजों का शासन रहा इस दौरान भारतीय लोगों को कई दमनकारी नीतियों का सामना करना पड़ा।इन नीतियों से पीड़ित और शोषित जनता ने 1857 में आज़ादी की जंग छेड़ी और ये पहला स्वतंत्रता संग्राम था फिर क्रमशः जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड,ख़िलाफ़त आन्दोलन,असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं भारत छोड़ो आंदोलन तक आज़ादी की राह में हज़ारो स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना बलिदान दिया।

14 अगस्त 1947 की वो शाम जहाँ एक तरफ़ विभाजन विभीषिका का दंश झेल रही जनता वहीं दूसरी तरफ़ ग़ुलामी के डूबते सूरज और आज़ादी उदय के लिए आशावान थी।उसी शाम 17 यॉर्क रोड़ स्थित नेहरू जी के आवास पर आज़ादी की गुफ़्तगू होने लगी तभी लाहौर से आए एक फ़ोन कॉल ने नेहरूजी को भावुक कर दिया। क्योंकि लाहौर के नए प्रशासक ने हिंदू और सिख इलाकों की जलापूर्ति को बाधित कर दिया तथा प्यास से कराहती जनता का नरसंहार किया जा रहा था।नेहरूजी अपने आज़ादी के ऐतिहासिक उद्बोधन में ख़ुशी के साथ साथ अंतर्मन से बहुत दुःखी थे ।
संसद के सेंट्रल हॉल में ठीक रात 11 बजे 20वीं सदी की वो महान आवाज़ गूँजी “नियति से वादा” जिसको सुनने के लिए भारतीय कई वर्षों से आतुर थे उस भाषण के कुछ अंश इस प्रकार थे- कई सालों पहले, हमने नियति के साथ एक वादा किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा निभायें, पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक तो निभायें। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग जाएगा। ऐसा क्षण आता है, मगर इतिहास में विरले ही आता है,जैसे ही रात के 12 बजे आज़ादी का शंखनाद हुआ सेंट्रल हॉल महात्मा गांधी जी के नारों से गूँज उठा और वहाँ खड़े हर शख़्स की आँखे भर आई।फिर सुचेता कृपलानी ने सारे जहाँ से अच्छा और वंदे मातरम् गाकर आज़ादी का उद्घोष किया ।

स्वतंत्रता की उसी रात्रि वेला में नेहरूजी और डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लॉर्ड माउंटबेटन को भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बनने का न्यौता दिया।और माउंटबेटन ने इसे सहर्ष स्वीकार भी किया।15 अगस्त 1947 की पहली सुबह आज़ादी की किरणों ने राष्ट्र के लोगों में नई ऊर्जा का संचार किया हर कोई भारतीय तिरंगे को सलामी देने के लिए आतुर था। आज़ादी के पहले दिन दिल्ली के प्रिंसेज पार्क में लाखों की भीड़ उमड़ी गाँव देहात से दिल्ली तक लोगों का हुजूम उमड़ा जैसे ही माउंटबेटन ने भारतीय तिरंगे को सलामी दी वैसे ही दिल्ली का वो उद्यान भारत माता और जय हिन्द के नारों से गूँज उठा।ये उमंग और उल्लास था उसी ख़ूनी दास्ताँ के अंत और नए भारत के राष्ट्रवाद के उदय का ।

आज़ादी के बाद भी देश ने कई बाधाओं का सामना किया आधुनिक भारत दुनिया की उभरती वैश्विक शक्ति है। बीती सदियों में भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में अपार प्रगति की इसके साथ ही अपनी विरासत का सरंक्षण भी किया आगामी वर्षों में भारत अपने आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है ।आज देश का युवा प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नवाचार के साथ वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है।।