अशोक भाटिया
सभ्यता के विकास के साथ ही भारत में मंदिर, चेतना और आध्यात्मिक शांति के सर्वोच्च केंद्र रहे हैं। जब एक आम श्रद्धालु अपने घर से किसी भी तीर्थस्थल की ओर कदम बढ़ाता है, तो उसके मन में केवल अगाध श्रद्धा, आत्मिक संतोष और ईश्वर के दर्शन की लालसा होती है। लेकिन क्या वजह है कि हाल के वर्षों में भारत के, और विशेषकर बिहार के पवित्र धार्मिक परिसर अचानक ‘मौत के कुएँ’ में तब्दील हो जाते हैं? क्यों आस्था के जयकारों के बीच अचानक चीखें, रुदन और अपनों को खोने का हाहाकार गूंजने लगता है? बिहार के लखीसराय स्थित अशोकधाम मंदिर में सावन के पावन महीने में घटित हुई ताज़ा विभीषिका ने एक बार फिर हमारी व्यवस्था के खोखलेपन, प्रशासनिक ढुलमुल रवैये और आपदा प्रबंधन के दावों की धंज्जियाँ उड़ाकर रख दी हैं। एक ऐसे समय में जब विज्ञान और तकनीकी प्रबंधन के जरिए दुनिया लाखों-करोड़ों की भीड़ को उंगली पर नचा सकती है, हमारे यहाँ त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर उमड़ने वाली भीड़ को भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। यह हादसा कोई पहला नहीं है और न ही अप्रत्याशित है; यह उन दर्जनों चेतावनियों की कड़वी कड़ी है जिन्हें नजरअंदाज करने की हमें आत्मघाती आदत हो चुकी है।
सावन मास के तीसरे सोमवार की सुबह, जब पूरा देश सूर्योदय के साथ महादेव के जलाभिषेक की तैयारी कर रहा था, लखीसराय का इंद्रदमनेश्वर महादेव (अशोकधाम) मंदिर परिसर चीखों से दहल उठा। सावन के इस पवित्र सोमवार पर बाबा भोलेनाथ पर जल चढ़ाने के लिए करीब 50,000 श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी हुई थी। मंदिर परिसर खचाखच भरा हुआ था, कतारें किलोमीटर लंबी थीं और प्रशासनिक चौकसी सिर्फ कागजों तक सीमित थी। सुबह करीब 6:30 से 6:45 के बीच जब यह हादसा हुआ, तो इसके कारणों को लेकर प्रशासन और ज़मीनी हकीकत यानी चश्मदीदों के बयानों में एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिला।
लखीसराय के जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार और पुलिस प्रशासन का तर्क है कि सुबह के समय दो स्थानीय रेलगाड़ियों के अशोकधाम हॉल्ट पर पहुँचने से श्रद्धालुओं का दबाव अचानक अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया था। प्रशासन के अनुसार, पुरुषों की कतार के दाहिनी ओर स्थित एक बिजली का खंभा अचानक गिर गया, जिससे भीड़ में यह अफवाह फैल गई कि कतार पर बिजली का चालू तार गिर गया है, जबकि वह केवल एक केबल वायर था। इसी अफवाह के बीच कुछ युवकों ने जबरन आगे बढ़ने की कोशिश में बैरिकेडिंग तोड़ दी, जिससे कतार में खड़ी महिलाएं एक-दूसरे के ऊपर गिर गईं और भगदड़ मच गई। इस भीषण कुप्रबंधन और हादसे में 8 श्रद्धालुओं की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई, जबकि 12 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। मारे गए लोगों में महिलाओं की संख्या अधिक थी, जो कतारों में खड़ी थीं। इस पूरी घटना ने यह साफ कर दिया कि जब बुनियादी बिजली सुरक्षा, बैरिकेडिंग की मजबूती और भीड़ नियंत्रण जैसे प्राथमिक इंतजाम ही दुरुस्त न हों, तो प्रशासनिक दावों की पोल खुलने में चंद सेकंड ही लगते हैं।
लखीसराय की यह त्रासदी कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि बिहार में पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा के मोर्चे पर हुई आपराधिक लापरवाहियों का एक लंबा और खूनी इतिहास रहा है। यदि हम अतीत के पन्नों को पलटें, तो पाएंगे कि हर हादसे का ढर्रा बिल्कुल एक जैसा रहा है—भीड़ का अत्यधिक जुटना, किसी अफवाह या दुर्घटना का होना, और अंततः प्रशासन का लाचार होकर हाथ खड़े कर देना। उदाहरण के लिए, 12 अगस्त 2024 को जहानाबाद जिले के मखदूमपुर में स्थित बराबर पहाड़ी पर बने प्राचीन बाबा सिद्धनाथ मंदिर में ऐसी ही एक भयावह भगदड़ मची थी। सावन के सोमवार के अवसर पर ही आधी रात के बाद करीब 1:00 से 1:30 बजे के बीच यह हादसा हुआ था। पहाड़ी की संकरी सीढ़ियों और रास्तों पर हज़ारों श्रद्धालु जल चढ़ाने के लिए ऊपर चढ़ रहे थे, जबकि दर्शन कर चुके सैकड़ों लोग नीचे उतर रहे थे। आने और जाने का रास्ता एक होने और बेहद संकरा होने के कारण दबाव पहले से ही चरम पर था। इसी बीच स्थानीय फूल विक्रेताओं के बीच किसी बात को लेकर लाठी-डंडों से मारपीट हो गई, जिसे भीड़ ने पुलिस का लाठीचार्ज समझ लिया। इस एक अफवाह ने पहाड़ी पर मौत का तांडव शुरू कर दिया और लोग अंधेरे में संकरी सीढ़ियों पर एक-दूसरे को कुचलते हुए भागने लगे, जिससे 7 निर्दोष श्रद्धालुओं की जान चली गई थी।
इसी तरह, चैत्र मास के आखिरी मंगलवार यानी 31 मार्च 2026 को नालंदा जिले के बिहार शरीफ के मघरा इलाके में स्थित माँ शीतला माता मंदिर में एक और हृदयविदारक घटना घटी थी। शीतला अष्टमी के पावन अवसर पर सुबह-सुबह भारी संख्या में महिलाएं पूजा-अर्चना के लिए जुटी थीं। भोर से ही मंदिर प्रांगण में महिलाओं की कतारें लगी थीं और अचानक अत्यधिक भीड़ व कुप्रबंधन की वजह से अफरा-तफरी मच गई। सैकड़ों लोग एक क्षण में नियंत्रण खो बैठे और देखते ही देखते भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। चश्मदीदों ने यहाँ भी प्रशासन की विफलता और पुलिस बल की भारी कमी को हादसे का ज़िम्मेदार ठहराया था, जिसके कारण 8 महिलाओं की कुचलने और दम घुटने से मौत हो गई थी। सुरक्षा में चूक और भीड़ नियंत्रण के अभाव का एक और वीभत्स उदाहरण अक्टूबर 2023 में महा नवमी की रात को गोपालगंज में देखने को मिला था। वहाँ के प्रसिद्ध राजा दल दुर्गा पूजा पंडाल में भारी संख्या में दर्शनार्थी उमड़े थे। पंडाल के मुख्य द्वार पर अत्यधिक भीड़ हो जाने और प्रवेश व निकास की सही व्यवस्था न होने के कारण अचानक भगदड़ मच गई थी। पुलिस की प्राथमिक जाँच में स्पष्ट हुआ था कि उस विशाल और संवेदनशील पंडाल के गेट पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस कर्मियों की तैनाती नहीं की गई थी, जिसके चलते दो महिलाओं और एक मासूम बच्चे की कुचलकर मौत हो गई थी।
इन सभी पुरानी और नई घटनाओं का बारीकी से विश्लेषण करने पर कुछ ऐसे साझा और गंभीर कारण उभरकर सामने आते हैं, जो यह साबित करते हैं कि ये मौतें प्राकृतिक आपदाएं नहीं, बल्कि प्रशासनिक और ढांचागत विफलताओं के कारण हुए ‘मानव-निर्मित अपराध’ हैं।
इसके अलावा, किसी भी भीड़भाड़ वाले स्थान पर एक छोटी सी अफवाह बारूद में चिंगारी का काम करती है। जब अफवाह फैलती है, तो लोगों में जान बचाने के लिए भागने की स्थिति बन जाती है। ऐसे समय में भीड़ को शांत करने के लिए मंदिरों में न तो कोई प्रभावी लाउडस्पीकर सिस्टम होता है और ना ही प्रशासन तुरंत घोषणाएं करके स्थिति को संभालता है। साथ ही, बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड और स्थानीय जिला प्रशासन के बीच अक्सर जिम्मेदारी को लेकर खींचतान चलती रहती है। मंदिर समितियां अपनी कमाई और चढ़ावे पर तो पूरा नियंत्रण रखती हैं, लेकिन जब बात बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था या सीसीटीवी कैमरे लगाने की आती है, तो वे सारा जिम्मा पुलिस-प्रशासन पर मढ़ देती हैं।
धार्मिक स्थलों पर हादसों का एक और छिपा हुआ लेकिन कड़वा सच ‘वीआईपी संस्कृति’ है। जब आम श्रद्धालु घंटों भूखे-प्यासे कतारों में खड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे होते हैं, तब प्रशासनिक अमला और मंदिर के रसूखदार लोग वीआईपी दर्शन कराने में व्यस्त होते हैं। इस चक्कर में आम कतारों को रोक दिया जाता है, जिससे पीछे से आ रही भीड़ का दबाव आगे की कतारों पर असहनीय हो जाता है।
यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि भविष्य में कोई भी मंदिर, पंडाल या तीर्थस्थल ‘मौत का कुआँ’ न बने, तो हमें तात्कालिक लीपापोती से ऊपर उठकर कड़े और ठोस संरचनात्मक सुधार करने होंगे। इसके लिए सबसे पहले अनिवार्य डिजिटल पास और रियल-टाइम हेड-काउंट सिस्टम लागू करना होगा। जैसे अमरनाथ यात्रा या तिरुपति बालाजी में दर्शन की एक निश्चित संख्या तय होती है, वैसे ही बिहार के बड़े मंदिरों में भी प्रतिदिन दर्शनार्थियों की अधिकतम सीमा तय होनी चाहिए। रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों के समय के साथ समन्वय बिठाकर भीड़ के आगमन का सटीक आकलन किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, प्रत्येक बड़े धार्मिक आयोजन से कम से कम एक महीने पहले जिला प्रशासन, विद्युत विभाग और अग्निशमन विभाग द्वारा पूरे परिसर का सेफ्टी ऑडिट अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। कतारों वाले रास्तों से बिजली के तारों को पूरी तरह अंडरग्राउंड किया जाना चाहिए ताकि करंट लगने जैसी घटनाएं दोबारा न हों।
आस्था इंसान को जीवन जीने का संबल देती है, वह जान लेने की वजह नहीं बननी चाहिए। जब तक देश का नागरिक, समाज और प्रशासनिक तंत्र इस कड़वी हकीकत को स्वीकार नहीं करेंगे कि कुप्रबंधन ही असली हत्यारा है, तब तक प्रार्थनाओं के स्वर ऐसे ही असमय चीखों में बदलते रहेंगे। लखीसराय, जहानाबाद और नालंदा की त्रासदियां हमारे सामूहिक विवेक पर एक गहरा दाग हैं। अब समय आ गया है कि हम आस्था के इन पावन आलों को प्रशासनिक सतर्कता और सख्त नियमों से सुरक्षित करें, ताकि कोई भी माँ, बहन या भाई ईश्वर के दर से कफ़न में लिपटकर वापस न लौटे। व्यवस्था को अपनी नींद से जागना ही होगा, वरना इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।





