महेन्द्र तिवारी
स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। स्वतंत्रता का सबसे गहरा अर्थ मनुष्य की चेतना की स्वतंत्रता है। एक स्वतंत्र नागरिक वह है जो अपने विवेक से सोच सके, प्रश्न पूछ सके, किसी विचार को केवल इसलिए स्वीकार न करे कि उसे किसी प्रभावशाली व्यक्ति, संगठन या भीड़ ने सही बताया है और आवश्यकता पड़ने पर अपने प्रिय विचार की भी आलोचना कर सके। इसलिए 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रयुक्त “दिमागी नक्सल” शब्द को केवल राजनीतिक आरोप या राजनीतिक विवाद के रूप में देखना इस पूरे प्रसंग को बहुत छोटा कर देना होगा। इसके भीतर एक बड़ा और अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न छिपा है: क्या आज का युवा वास्तव में स्वयं सोच रहा है या किसी राजनीतिक, सामाजिक अथवा आभासी समूह द्वारा तैयार की गई प्रतिक्रिया को अपनी स्वतंत्र चेतना समझ रहा है?
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि हथियारी नक्सलवाद की चुनौती काफी हद तक समाप्त हो चुकी है, लेकिन “दिमागी नक्सल” अवसर की तलाश में हैं और समाज को हिंसा तथा अराजकता की ओर ले जाने के रास्ते खोजते हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने तथा युवा पीढ़ी को विकसित राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही। यह वक्तव्य स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस का विषय बना है। सत्ता पक्ष ने इसे वैचारिक नक्सलवाद के विरुद्ध चेतावनी माना, जबकि विपक्ष के कुछ नेताओं ने इसे सरकार के आलोचकों को निशाना बनाने वाली भाषा बताया।
लेकिन लोकतांत्रिक समाज के लिए इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि विचारों पर किसी एक पक्ष का अधिकार कैसे स्थापित होता है। यदि कोई व्यक्ति सरकार की प्रत्येक बात को बिना जांचे स्वीकार करता है, तो वह स्वतंत्र चिंतक नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सरकार की प्रत्येक बात का केवल इसलिए विरोध करता है क्योंकि वह सरकार का विरोधी है, तब भी उसकी चेतना स्वतंत्र नहीं कही जा सकती। समर्थन और विरोध दोनों के पीछे यदि विवेक के स्थान पर पूर्वनिर्धारित प्रतिक्रिया काम कर रही है, तो दोनों स्थितियों में व्यक्ति किसी न किसी तैयार वैचारिक पटकथा का पात्र बन जाता है।
आज के समय में यह समस्या और जटिल हो गई है। पहले विचारों को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक सभाएं, समाचार पत्र, पुस्तकें और संगठन प्रमुख माध्यम हुआ करते थे। अब मनुष्य के हाथ में ऐसा उपकरण है जो चौबीसों घंटे उसके सामने विचार, समाचार, चित्र और प्रतिक्रियाएं प्रस्तुत करता रहता है। सामाजिक माध्यमों की आभासी दुनिया में एक ही विचार बार बार दिखाई देने लगता है तो व्यक्ति को लगने लगता है कि यही सर्वमान्य सत्य है। किसी घटना की पूरी जानकारी प्राप्त करने के बजाय उसके कुछ क्षणों के दृश्य देखकर प्रतिक्रिया देना सामान्य होता जा रहा है। कई बार व्यक्ति समाचार नहीं पढ़ता, केवल उस समाचार पर किसी पसंदीदा व्यक्ति की प्रतिक्रिया पढ़कर अपनी राय बना लेता है।
यहीं स्वतंत्र चिंतन की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। स्वतंत्र चिंतन का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति किसी विचारधारा से जुड़ा ही न हो। विचारधारा मनुष्य को सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों को समझने का ढांचा देती है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब विचारधारा प्रश्न पूछने की क्षमता को ही समाप्त कर देती है। जब व्यक्ति अपने पक्ष की गलती को गलती मानने से इंकार कर दे और दूसरे पक्ष की सही बात को भी केवल इसलिए अस्वीकार कर दे कि वह दूसरे पक्ष से आई है, तब विचार स्वतंत्र नहीं रह जाता।
युवा पीढ़ी के संदर्भ में यह प्रश्न और गंभीर है। युवा ऊर्जा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति हो सकती है, लेकिन वही ऊर्जा गलत दिशा में जाने पर भीड़ की शक्ति बन सकती है। किसी आंदोलन में शामिल होना अपने आप में गलत नहीं है। सत्ता से प्रश्न करना लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना नागरिक कर्तव्य भी हो सकता है। लेकिन किसी भी आंदोलन में शामिल होने से पहले यह पूछना आवश्यक है कि उसका उद्देश्य क्या है, उसके तथ्य क्या हैं, उसके साधन क्या हैं और उसके परिणाम क्या होंगे। केवल इसलिए किसी नारे को अपना लेना कि हजारों लोग उसे दोहरा रहे हैं, स्वतंत्र चेतना का प्रमाण नहीं है।
इसी प्रकार राष्ट्रहित के नाम पर भी विवेक को त्याग देना उचित नहीं है। देशभक्ति का अर्थ यह नहीं कि नागरिक सरकार के हर निर्णय को सही माने। लोकतंत्र में सरकार और राष्ट्र एक ही चीज नहीं हैं। सरकार बदल सकती है, नीतियां बदल सकती हैं, राजनीतिक दल बदल सकते हैं, लेकिन राष्ट्र और संविधान की संस्थाएं बनी रहती हैं। इसलिए सरकार की आलोचना को राष्ट्रविरोध मान लेना भी उतना ही खतरनाक है जितना राष्ट्रहित के नाम पर हिंसा या अराजकता को उचित ठहराना।
प्रधानमंत्री के उसी भाषण का दूसरा पक्ष इसलिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका संबोधन केवल “दिमागी नक्सल” शब्द तक सीमित नहीं था। उसका बड़ा हिस्सा 2047 तक विकसित भारत बनाने के संकल्प और राष्ट्र की विभिन्न शक्तियों को संगठित करने की दृष्टि पर केंद्रित था। उन्होंने “शक्ति की सप्तधारा” के माध्यम से निर्माण शक्ति, कृषि और खाद्य उत्पादन, प्रौद्योगिकी और नवाचार, गति शक्ति, रक्षा शक्ति, हरित और समुद्री अर्थव्यवस्था तथा भारत की सांस्कृतिक और वैश्विक प्रभाव शक्ति को आगे बढ़ाने की बात रखी।
यहां एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। विकसित भारत केवल सरकार की योजनाओं से नहीं बन सकता। वह तभी बनेगा जब देश के नागरिकों में विचार करने, सृजन करने, प्रश्न पूछने और नई राह खोजने की क्षमता होगी। प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने भाषण में कहा कि कई बार संसाधनों की कमी से अधिक बड़ी बाधा सोच की सीमाएं होती हैं। उन्होंने आत्मनिर्भरता, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सोच का विस्तार करने की आवश्यकता पर बल दिया।
इसलिए “दिमागी नक्सल” शब्द की बहस को यदि व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने किसे यह कहा। हमें यह भी पूछना चाहिए कि हमारी युवा पीढ़ी को ऐसी कौन सी शिक्षा और सामाजिक चेतना दी जा रही है जिससे वह किसी भी विचार को आंख बंद करके स्वीकार न करे। उसे यह सिखाना होगा कि प्रश्न करना विद्रोह नहीं है, प्रमाण मांगना अविश्वास नहीं है और असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं है। साथ ही यह भी सिखाना होगा कि हिंसा, अराजकता और विध्वंस को विचार की स्वतंत्रता का नाम नहीं दिया जा सकता।
स्वतंत्र चिंतन की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि व्यक्ति अपने विरोधी की बात सुनने की क्षमता रखता हो। यदि कोई सरकार समर्थक युवक अपने प्रिय नेतृत्व की गलतियों को स्वीकार कर सकता है, तो वह स्वतंत्र चिंतन की दिशा में है। यदि कोई सरकार विरोधी युवक अपने विरोधी पक्ष की अच्छी नीति को स्वीकार करने का साहस रखता है, तो वह भी स्वतंत्र चिंतन की दिशा में है। सत्य किसी राजनीतिक दल का निजी स्वामित्व नहीं है।
आज आवश्यकता ऐसी युवा चेतना की है जो नारों से अधिक तथ्यों को महत्व दे, उत्तेजना से अधिक तर्क को महत्व दे और भीड़ से अधिक विवेक को। जिस युवक को हर विषय पर तुरंत क्रोध आता है, उसे शायद सबसे पहले रुककर सोचना चाहिए कि यह क्रोध उसका अपना है या किसी और ने उसके भीतर पैदा किया है। जिस युवक को हर प्रश्न का उत्तर पहले से मालूम है, उसे कभी कभी स्वयं से यह पूछना चाहिए कि उसने वास्तव में विचार किया है या केवल किसी तैयार उत्तर को स्वीकार किया है।
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए केवल मजबूत कारखाने, तेज सड़कें, आधुनिक रक्षा व्यवस्था, नई ऊर्जा और उन्नत प्रौद्योगिकी पर्याप्त नहीं होंगी। इन सबके पीछे स्वतंत्र मस्तिष्क चाहिए। हमें ऐसे नागरिक चाहिए जो प्रयोग कर सकें, असफल हो सकें, फिर उठ सकें और नई राह बना सकें। हमें ऐसे युवा चाहिए जो अपने समय के प्रश्नों को समझें, लेकिन किसी विचारधारा के बंद कमरे में कैद न हो जाएं।
इस दृष्टि से “दिमागी नक्सल” की बहस का सबसे सार्थक निष्कर्ष किसी व्यक्ति या समूह को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि अपनी चेतना की जांच करना होना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम स्वयं भी किसी तैयार पटकथा के पात्र बन चुके हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जिस विचार को अपना मौलिक विचार समझ रहे हैं, वह लगातार दोहराई गई किसी राजनीतिक या सामाजिक प्रतिक्रिया का परिणाम है?
स्वतंत्र भारत की अगली यात्रा में यही प्रश्न निर्णायक हो सकता है। 2047 का विकसित भारत केवल आर्थिक समृद्धि का लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि विवेकशील नागरिकों का भारत भी होना चाहिए। ऐसा भारत जहां सत्ता से प्रश्न पूछना अपराध न हो, सत्ता का समर्थन करना संदेह की दृष्टि से न देखा जाए, असहमति को सम्मान मिले और हिंसा के लिए विचार का आवरण स्वीकार न किया जाए।
अंततः राष्ट्र को केवल मजबूत हाथों की नहीं, स्वतंत्र मस्तिष्कों की आवश्यकता है। यदि युवा अपने विचार स्वयं गढ़ता है, तथ्यों की जांच करता है, तर्क सुनता है, अपनी गलती स्वीकार करता है और किसी भी राजनीतिक या सामाजिक शक्ति को अपनी बुद्धि का स्वामी नहीं बनने देता, तभी सच्चे अर्थों में स्वतंत्र भारत की चेतना मजबूत होगी। “दिमागी नक्सल” की बहस का सबसे उपयोगी पक्ष शायद यही है कि वह हमें दूसरों के दिमाग की जांच करने से पहले अपने दिमाग की स्वतंत्रता जांचने का अवसर देती है। यही स्वतंत्र चिंतन लोकतंत्र की आत्मा है और यही विकसित भारत की सबसे बड़ी बौद्धिक शक्ति भी बन सकता है।





