वरिष्ठ नागरिक किसी परिवार की जिम्मेदारी भर नहीं, उसकी जीवंत विरासत होते हैं। उनके अनुभव, संघर्ष और जीवन-मूल्य नई पीढ़ी को दिशा देते हैं। 21 अगस्त का ‘विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस’ हमें स्मरण कराता है कि बुजुर्गों को केवल सम्मान के शब्द नहीं बल्कि सुरक्षा, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता, अपनापन और निर्णयों में सहभागिता चाहिए। उनकी गरिमा की रक्षा करना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है।
योगेश कुमार गोयल
किसी भी परिवार की वास्तविक समृद्धि केवल उसकी आर्थिक संपन्नता से नहीं बल्कि उसके बुजुर्गों की मौजूदगी, अनुभव और आशीर्वाद से मापी जाती है। उम्र के साथ शरीर भले ही कमजोर हो जाए लेकिन जीवन के दशकों से अर्जित अनुभव, धैर्य, दूरदृष्टि और रिश्तों को संभालने की क्षमता किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं होती। वरिष्ठ नागरिक केवल परिवार के अतीत के साक्षी नहीं बल्कि वर्तमान के मार्गदर्शक और भविष्य के लिए अनुभव की जीवंत पाठशाला होते हैं। इसी भाव को केंद्र में रखकर 21 अगस्त को विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस के रूप में बुजुर्गों के सम्मान, उनकी समस्याओं और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता का अवसर माना जाता है। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने 19 अगस्त 1988 को एक घोषणा पर हस्ताक्षर कर 21 अगस्त को वरिष्ठ नागरिक दिवस के रूप में मान्यता दी थी।
वृद्धावस्था जीवन का वह पड़ाव है, जिसमें व्यक्ति को सबसे अधिक जरूरत होती है सम्मान की, अपनत्व की, सुरक्षा की और यह महसूस करने की कि समाज में उसकी उपयोगिता अभी समाप्त नहीं हुई है। आधुनिक जीवनशैली, तेजी से बढ़ता शहरीकरण, रोजगार के लिए पलायन और संयुक्त परिवारों के कमजोर पड़ते ढ़ांचे ने बुजुर्गों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। कई वरिष्ठ नागरिकों को शारीरिक बीमारियों के साथ अकेलेपन, आर्थिक असुरक्षा, डिजिटल दुनिया से दूरी, सामाजिक अलगाव और भावनात्मक उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र भी बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, आवास, परिवहन, परिवार और सामाजिक संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों को महत्वपूर्ण वैश्विक चुनौती मानता है। दुनिया में 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या 1980 के लगभग 26 करोड़ से बढ़कर 2021 में 76.1 करोड़ हो गई थी और 2050 तक वैश्विक आबादी में उनका हिस्सा लगभग 17 प्रतिशत पहुंचने का अनुमान है।
भारत के संदर्भ में यह चुनौती और अधिक महत्वपूर्ण है। देश में जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है और वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में वृद्धावस्था को बोझ की तरह देखने के बजाय इसे जीवन के सक्रिय, सम्मानजनक और उत्पादक चरण के रूप में स्वीकार करना होगा। केंद्र सरकार की अटल वयो अभ्युदय योजना का उद्देश्य भी वरिष्ठ नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है, जिसके अंतर्गत वरिष्ठ नागरिकों के लिए आवास एवं देखभाल सेवाएं, राज्य कार्ययोजनाएं, सहायक उपकरण तथा सक्रिय एवं स्वस्थ वृद्धावस्था से जुड़े विभिन्न घटक शामिल हैं। भारत में 2026 तक 60 वर्ष से अधिक आयु की आबादी लगभग 17.3 करोड़ पहुंचने का अनुमान लगाया है। वरिष्ठ नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। वृद्धावस्था में नियमित आय का स्रोत समाप्त होने अथवा कम होने से जीवनयापन कठिन हो सकता है। विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं महत्वपूर्ण सहारा बनती हैं। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत वृद्धावस्था पेंशन जैसी व्यवस्थाएं जरूरतमंद वरिष्ठ नागरिकों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास करती हैं। इसके साथ ही बैंकिंग और पेंशन व्यवस्था तक आसान पहुंच, वित्तीय साक्षरता तथा डिजिटल लेन-देन में सुरक्षित प्रशिक्षण भी आज की आवश्यकता है क्योंकि साइबर धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों में वरिष्ठ नागरिक विशेष रूप से संवेदनशील हो सकते हैं।
स्वास्थ्य वरिष्ठ नागरिकों की सबसे बड़ी जरूरतों में शामिल है। उम्र बढ़ने के साथ मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गठिया, दृष्टि संबंधी समस्याएं, सुनने की क्षमता में कमी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों का जोखिम बढ़ सकता है। भारत सरकार का ‘नेशनल प्रोग्राम फॉर हैल्थ केयर ऑफ द एल्डरली’ वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुलभ, किफायती और समग्र स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। इसके अंतर्गत स्वास्थ्य संवर्धन, रोकथाम, रोगों का निदान एवं उपचार, पुनर्वास, डे-केयर तथा जरूरत के अनुसार घर पर देखभाल जैसी सेवाओं की परिकल्पना की गई है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए केवल चिकित्सा सुविधा पर्याप्त नहीं है, उन्हें सामाजिक और भावनात्मक सुरक्षा भी चाहिए। बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार, उपेक्षा, आर्थिक शोषण और अकेलापन ऐसी समस्याएं हैं, जिन पर परिवार और समाज दोनों को गंभीरता से विचार करना होगा। किसी बुजुर्ग की बात को इसलिए खारिज कर देना कि वे पुराने विचारों के हैं, उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाता है। नई पीढ़ी और वरिष्ठ पीढ़ी के बीच संवाद की कमी अनेक पारिवारिक तनावों को जन्म देती है। आवश्यकता इस बात की है कि घरों में बुजुर्गों को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए, उनकी राय सुनी जाए और उनके अनुभवों को सम्मान दिया जाए।
डिजिटल युग में वरिष्ठ नागरिकों को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना भी जरूरी है। मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन स्वास्थ्य सेवाएं, सरकारी पोर्टल और वीडियो कॉल जैसी सुविधाएं उनके जीवन को आसान बना सकती हैं लेकिन डिजिटल जानकारी के अभाव में वे ठगी का शिकार भी हो सकते हैं। इसलिए परिवार के युवा सदस्यों को चाहिए कि वे बुजुर्गों को तकनीक से दूर रखने के बजाय उन्हें सुरक्षित डिजिटल व्यवहार सिखाएं, जैसे ओटीपी साझा न करना, अनजान लिंक पर क्लिक न करना, बैंक संबंधी जानकारी किसी को न देना और संदिग्ध कॉल की सूचना तुरंत संबंधित संस्था को देना। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बुजुर्गों की देखभाल को केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं बनाया जा सकता। सरकार सामाजिक सुरक्षा दे सकती है, स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित कर सकती है और कानून बना सकती है लेकिन बुजुर्गों को वास्तविक अपनापन परिवार ही दे सकता है। दिन में कुछ मिनट उनके साथ बैठना, उनकी बातें सुनना, उनके साथ भोजन करना, उन्हें बाहर घुमाना, उनकी दवाओं और स्वास्थ्य जांच का ध्यान रखना तथा उनकी पसंद-नापसंद का सम्मान करना किसी महंगी सुविधा से अधिक मूल्यवान हो सकता है।
आज जरूरत ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाने की है, जहां वृद्धावस्था को निर्भरता का पर्याय न माना जाए। जिन लोगों ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में लगाए हैं, उन्हें जीवन के अंतिम पड़ाव में सम्मान, सुरक्षा और सहभागिता मिलना उनका अधिकार है, उपकार नहीं। विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि बुजुर्गों को केवल एक दिन सम्मानित करने से हमारी जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। उनके प्रति सम्मान हमारे व्यवहार, पारिवारिक संस्कार और सामाजिक नीतियों का स्थायी हिस्सा बनना चाहिए। जिस घर में बुजुर्ग मुस्कुराते हैं, वहां पीढ़ियों के बीच अनुभव और ऊर्जा का सुंदर संवाद बना रहता है। उनकी झुर्रियों में जीवन की कहानी, उनकी चुप्पी में अनुभव की गहराई और उनके आशीर्वाद में आने वाली पीढ़ियों की शक्ति छिपी होती है। इसलिए आज संकल्प केवल इतना न हो कि हम बुजुर्गों का सम्मान करेंगे बल्कि यह हो कि हम ऐसा समाज बनाएंगे, जहां कोई वरिष्ठ नागरिक अकेला, असुरक्षित, उपेक्षित या निरर्थक महसूस न करे। किसी समाज की सभ्यता का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं कि वह अपने युवाओं के लिए कितने अवसर पैदा करता है बल्कि यह भी है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मानजनक व्यवहार करता है।





