महेन्द्र तिवारी
वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अजर अमर और अत्यंत पवित्र स्मृति है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह महान रचना केवल शब्दों और ध्वनियों का साधारण समूह नहीं है, बल्कि यह उस युग की धड़कन है जब लाखों भारतीयों ने परतंत्रता की मजबूत बेड़ियों को तोड़ने का कठोर संकल्प लिया था। इस अद्वितीय रचना ने भारत माता को एक देवी के रूप में स्थापित किया और जनमानस में देशभक्ति की ऐसी प्रचंड ज्वाला प्रज्वलित की जिसने शक्तिशाली विदेशी शासन की नींव तक हिला दी। आनंदमठ नामक प्रसिद्ध उपन्यास से ली गई इस रचना ने अनगिनत युवाओं को हंसते हंसते अपने प्राणों की आहुति देने की प्रेरणा दी थी। परंतु विडंबना यह है कि आज यह पवित्र रचना राजनीतिक आरोप और प्रत्यारोप का मुख्य केंद्र बन गई है।
अगस्त 2026 में जब कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त को यह स्पष्ट किया कि उनके आयोजनों में वंदे मातरम् के केवल पहले 2 पदों का ही गायन किया जाएगा, तो देश के राजनीतिक गलियारों में एक नया और गहरा विवाद उत्पन्न हो गया। इस निर्णय ने संपूर्ण देश में एक बार फिर इस बहस को जन्म दे दिया कि क्या हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों का उपयोग केवल राजनीतिक लाभ और वैचारिक संघर्ष के लिए किया जा रहा है। वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी और उनके समर्थकों का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्रगीत के केवल 2 पद गाना इस महान ऐतिहासिक रचना का घोर अपमान है। उनका सशक्त तर्क है कि जिस रचना ने देश के असंख्य युवाओं को स्वाधीनता के लिए प्रेरित किया, उसके स्वरूप को किसी भी कारण से सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके दृष्टिकोण में पूर्ण राष्ट्रगीत का सम्मान करना हर सच्चे नागरिक का परम कर्तव्य है और इसे खंडित रूप में प्रस्तुत करना राष्ट्रवाद की मूल और अखंड भावना के बिल्कुल विपरीत है।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस दल का तर्क है कि वह वंदे मातरम् का कोई अपमान नहीं कर रही है, बल्कि वह पूर्ण निष्ठा के साथ उस ऐतिहासिक निर्णय का पालन कर रही है जो 1937 में स्वतंत्रता सेनानियों और तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा लिया गया था। कांग्रेस के अनुसार यह निर्णय कोई नया कदम नहीं है, बल्कि यह उस पुरानी समावेशी विचारधारा की निरंतरता है जिसका उद्देश्य सभी समुदायों को एक साथ लेकर चलना था। इस वैचारिक मतभेद को और अधिक गहराई से समझने के लिए 1937 के उस विशिष्ट ऐतिहासिक कालखंड का निष्पक्ष अवलोकन करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। उस समय हमारा देश विदेशी शासन के अधीन था और स्वतंत्रता आंदोलन को सफल बनाने के लिए विभिन्न समुदायों के बीच पूर्ण एकता सबसे बड़ी और अनिवार्य आवश्यकता थी।
वंदे मातरम् के पहले 2 पदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता, उसकी सदानीरा नदियों, मीठे फलों, शस्य श्यामला धरती और शीतल वायु का अत्यंत मनमोहक वर्णन किया गया है। यह एक ऐसा वर्णन है जिसे भारत का हर नागरिक समान रूप से और बिना किसी हिचकिचाहट के स्वीकार कर सकता है। परंतु इस महान रचना के बाद के पदों में देवी दुर्गा और अन्य हिंदू देवी देवताओं का स्पष्ट उल्लेख आता है, जो गहरे धार्मिक प्रतीक हैं। तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम के नेतृत्व के समक्ष यह एक बहुत बड़ी और संवेदनशील चुनौती थी कि सार्वजनिक और राष्ट्रीय आयोजनों में ऐसा क्या गाया जाए जिससे किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत न हों और सभी वर्गों के लोग सहजता से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ सकें।
इसी व्यापक दृष्टिकोण और समावेशी विचारधारा के अंतर्गत 1937 में गंभीर विचार विमर्श के बाद यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया था कि सार्वजनिक तथा राष्ट्रीय आयोजनों में केवल शुरुआती 2 पद ही गाए जाएंगे। इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखना था ताकि कोई भी वर्ग स्वतंत्रता के इस महायज्ञ से स्वयं को अलग महसूस न करे। आज के आधुनिक परिदृश्य में यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि 1937 की परिस्थितियां और 2026 की परिस्थितियां नितांत भिन्न हैं। उस समय का निर्णय एक परतंत्र और संघर्षरत देश में व्यापक जनसमर्थन जुटाने की कूटनीतिक तथा सामाजिक आवश्यकता का परिणाम था। परंतु आज जब भारत एक स्वतंत्र, सशक्त, समृद्ध और परिपक्व लोकतांत्रिक गणराज्य है, तब इस संवेदनशील विषय पर पुनः एक तीखी राजनीतिक बहस होना समाज के लिए चिंतन का विषय है।
क्या किसी राष्ट्रीय प्रतीक का सच्चा सम्मान उसके मूल और संपूर्ण स्वरूप को स्वीकार करने में निहित है, या फिर उस स्वरूप को अपनाने में जिसे ऐतिहासिक रूप से व्यापक सर्वसम्मति प्राप्त हुई थी? यह एक ऐसा जटिल दार्शनिक प्रश्न है जिसका उत्तर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और सामाजिक दृष्टिकोणों के अनुसार बिल्कुल भिन्न हो सकता है। परंतु एक परिपक्व और लोकतांत्रिक समाज में ऐसी बहसों को आरोप और प्रत्यारोप के निचले स्तर से ऊपर उठकर तथ्यों, ऐतिहासिक संदर्भों और राष्ट्रीय हित के आलोक में देखा जाना चाहिए। देशभक्ति कोई ऐसी वस्तु या भावना नहीं है जिसे केवल किसी गीत के 2 पदों या संपूर्ण पदों के गायन की अवधि से मापा जा सके।
यह तथ्य भी विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि भारतीय संविधान और हमारी समृद्ध परंपरा में राष्ट्रगान तथा राष्ट्रगीत का अपना अलग-अलग और अत्यंत उच्च स्थान है। भारत का आधिकारिक राष्ट्रगान जन गण मन है, जबकि वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का गरिमामय दर्जा और बिल्कुल समान सम्मान प्राप्त है। दोनों ही रचनाएं स्वतंत्र भारत के स्वाभिमान और गौरव की सर्वोच्च प्रतीक हैं। किसी एक रचना को राजनीतिक अस्त्र बनाकर दूसरे दल या विचारधारा को नीचा दिखाने का प्रयास करना इन महान प्रतीकों के गरिमामय इतिहास और उनके बलिदानों के विरुद्ध है। हमें यह गहराई से समझना होगा कि देशभक्ति का मापदंड केवल प्रतीकात्मक प्रदर्शन या सार्वजनिक आयोजनों तक सीमित नहीं हो सकता।
देश के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा, अपने नागरिक कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन, समाज के अत्यंत गरीब और वंचित वर्गों के प्रति गहरी संवेदनशीलता तथा राष्ट्र के समग्र विकास में अपना निस्वार्थ योगदान देना भी राष्ट्रवाद के समान रूप से महत्वपूर्ण और मजबूत स्तंभ हैं। जब देशभक्ति को केवल एक विशिष्ट दल की राजनीतिक कसौटी बना दिया जाता है, तो समाज में विभाजन की रेखाएं गहरी होने लगती हैं। किसी व्यक्ति या दल द्वारा वंदे मातरम् के 2 पद गाना अपने आप में उसके राष्ट्रविरोधी होने का कोई प्रमाण नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार, पूरे गीत के प्रति सार्वजनिक सम्मान व्यक्त करना भी किसी एक दल विशेष की राजनीतिक विचारधारा की श्रेष्ठता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
वंदे मातरम् को लेकर उत्पन्न यह वर्तमान विवाद हमें यह सोचने का एक महत्वपूर्ण अवसर देता है कि हम अपने अतीत की अमूल्य विरासतों को किस रूप में ग्रहण करते हैं। इतिहास को वर्तमान राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए विकृत करना या अपनी सुविधा के अनुसार प्रस्तुत करना किसी भी राष्ट्र के भविष्य के लिए उचित नहीं है। जो दल 1937 के निर्णय को अपना आधार बना रहे हैं, उनका यह दायित्व है कि वे उस निर्णय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके पीछे छिपे समावेशी विचारों को आज की युवा पीढ़ी के सामने अत्यंत स्पष्टता और ईमानदारी के साथ रखें। केवल यह कह देना सर्वथा अपर्याप्त है कि हम एक पुराने निर्णय का अंधानुकरण कर रहे हैं। आज का जागरूक युवा यह जानना चाहता है कि उस दौर में ऐसे निर्णय के पीछे क्या सामाजिक और राजनीतिक विवशताएं थीं।
इसी प्रकार, जो लोग संपूर्ण गीत के गायन के पक्षधर हैं, उन्हें भी यह उदारतापूर्वक स्वीकार करना होगा कि तत्कालीन नेताओं ने जो भी निर्णय लिए, वे उस समय की विषम और कठिन परिस्थितियों की अनिवार्य मांग थे। उन पुराने निर्णयों को आज सीधे तौर पर राष्ट्रविरोध के संकीर्ण चश्मे से देखना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और इतिहास के साथ घोर अन्याय होगा। अंततः वंदे मातरम् हमारे विशाल देश की अंतरात्मा की सबसे पवित्र आवाज़ है। यह वह जादुई मंत्र है जिसने हमें सदियों की गुलामी से स्वतंत्रता दिलाई थी। इस पावन मंत्र को आज के समाज को बांटने का साधन बिल्कुल नहीं बनना चाहिए, बल्कि इसे पूरे देश को एकजुट करने का सबसे मजबूत माध्यम बनना चाहिए। राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति हमारा सबसे सच्चा सम्मान इसी बात में निहित है कि हम उन्हें तुच्छ राजनीतिक विवादों से बहुत दूर रखें। हमें उस मूल भावना को आत्मसात करना चाहिए जिसके लिए हमारे महान पूर्वजों ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया था। देशभक्ति को एक अत्यंत उदार, ऐतिहासिक और संतुलित दृष्टिकोण से समझना ही सच्चे राष्ट्रवाद की असली पहचान है और सत्य अर्थों में यही वंदे मातरम् का सबसे बड़ा और वास्तविक सम्मान होगा।





