पेट्रोल, इथेनॉल और चीनी: सब गड़बड़झाला है भाई!

Petrol, ethanol, and sugar: it’s all a big mess, man!

जब गाड़ी भी गन्ने पर दौड़े और रसोई की मिठास भी महँगी हो जाए

सत्य भूषण शर्मा

देश में इन दिनों दो चीज़ें आम आदमी को बराबर चुभ रही हैं—पेट्रोल की कीमत और चीनी की मिठास। फर्क सिर्फ इतना है कि पेट्रोल पहले से जेब जलाता था, अब चीनी भी जेब काटने लगी है। ऐसे में आम नागरिक के मन से सहज ही निकल पड़ता है—“पेट्रोल, इथेनॉल और चीनी… सब गड़बड़झाला है भाई!”

कुछ वर्षों पहले तक भारत दुनिया के बड़े चीनी निर्यातकों में गिना जाता था। आज स्थिति यह है कि करीब दस वर्षों बाद सरकार को 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति देनी पड़ी है, ताकि घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाई जा सके।

गन्ना आखिर जाए तो जाए कहाँ?

यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।

एक ही गन्ना तीन दिशाओं में खड़ा दिखाई देता है—किसान के खेत में, चीनी मिल में और पेट्रोल पंप पर। पहले गन्ने से मुख्यतः चीनी बनती थी, लेकिन अब उसी गन्ने का बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में भी जा रहा है ताकि पेट्रोल में उसका मिश्रण बढ़ाकर विदेशी तेल पर निर्भरता कम की जा सके।

नीति का उद्देश्य निस्संदेह अच्छा है—ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण। लेकिन जब बाजार में चीनी महँगी होती है, तब लोगों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कहीं पेट्रोल की टंकी भरने के लिए रसोई की मिठास तो कम नहीं हो रही?

चीनी क्यों हुई कड़वी?

पिछले महीनों में चीनी के दाम तेजी से बढ़े हैं। बाजार में रिकॉर्ड स्तर तक पहुँची कीमतों को देखते हुए सरकार को आयात की अनुमति देने के साथ-साथ स्टॉक सीमा जैसी व्यवस्थाएँ भी लागू करनी पड़ीं।

हालाँकि सरकार का कहना है कि इस महँगाई का मुख्य कारण कम उत्पादन, मौसम की मार, त्योहारी मांग और आपूर्ति का दबाव है, न कि इथेनॉल के लिए गन्ने का उपयोग।

लेकिन दूसरी ओर अनेक उद्योग विशेषज्ञ यह तर्क दे रहे हैं कि जब लाखों टन चीनी-समतुल्य गन्ना एथेनॉल निर्माण में जाता है, तो घरेलू उपलब्धता पर उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि सरकार स्वयं आगामी सीज़न में गन्ने के रस और बी-हेवी शीरे से इथेनॉल उत्पादन सीमित करने तथा सी-हेवी शीरे को प्राथमिकता देने जैसे विकल्पों पर विचार कर चुकी है, ताकि अधिक चीनी बाजार में उपलब्ध हो सके।

आम आदमी का सीधा सवाल

आम उपभोक्ता अर्थशास्त्र की जटिल बहस नहीं पूछता। उसका सवाल बहुत सीधा है—

यदि पेट्रोल में इथेनॉल मिल रहा है, तो पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं हुआ?
यदि किसानों को लाभ मिल रहा है, तो उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं मिली?
यदि चीनी की कमी नहीं थी, तो आयात की नौबत क्यों आई?
यही वे प्रश्न हैं जिनका स्पष्ट उत्तर जनता चाहती है।

संतुलन ही असली समाधान

भारत को ऊर्जा सुरक्षा भी चाहिए और खाद्य सुरक्षा भी। किसानों की समृद्धि भी जरूरी है और उपभोक्ता की रसोई भी।

इसलिए आवश्यकता ऐसी संतुलित नीति की है जिसमें—

इथेनॉल उत्पादन का विस्तार वैज्ञानिक आधार पर हो।
जल-संकट वाले क्षेत्रों में गन्ने पर अत्यधिक निर्भरता कम हो।
वैकल्पिक स्रोतों—मक्का और अन्य फसलों—से एथेनॉल को बढ़ावा मिले।
चीनी की उपलब्धता और मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता बनी रहे।
किसान, उद्योग और उपभोक्ता—तीनों के हितों का संतुलन साधा जाए।
आखिरकार, विकास तभी सार्थक है जब पेट्रोल की टंकी भी भरे, किसान का खेत भी लहलहाए और आम आदमी की चाय में चीनी फिर से मीठी लगे।

अन्यथा जनता मुस्कुराकर यही कहेगी—“पेट्रोल, इथेनॉल और चीनी… सब गड़बड़झाला है भाई!”